अध्याय 2 वल्ली 3 - मन्त्र 12

नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा ।
अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १२ ॥

naiva vācā na manasā prāptuṃ śakyo na cakṣuṣā .
astīti bruvato’nyatra kathaṃ tadupalabhyate .. 12 ..


वह आत्मा न तो वाणी से, न मन से और न नेत्र से ही प्राप्त किया जा सकता है; वह ‘है’ ऐसा कहनेवालों से अन्यत्र (भिन्न पुरुषों को) किस प्रकार उपलब्ध हो सकता है ॥ १२ ॥

तात्पर्य यह कि वह ब्रह्म न तो वाणी से, न मन से, न नेत्र से और न अन्य इन्द्रियों से ही प्राप्त किया जा सकता है । तथापि सर्वविशेषरहित होने पर भी ‘वह जगत् का मूल है’ इस प्रकार ज्ञात होने के कारण वह है ही, क्योंकि कार्य का विलय किसी अस्तित्व के आश्रय से ही हो सकता है । इसी प्रकार सूक्ष्मता की तारतम्यपरम्परा से अनुगत होनेवाला यह सम्पूर्ण कार्यवर्ग भी सद्बुद्धिनिष्ठा को ही सूचित करता है । जिस समय विषय का विलय करते हुए बुद्धि का विलय किया जाता है उस समय भी वह सद्वृत्तिगर्भिता हुई ही लीन होती है । तथा सत् और असत् का यथार्थ स्वरूप जानने में तो हमारे लिये बुद्धि ही प्रमाण है ।

यदि जगत् का कोई मूल न होता तो यह सम्पूर्ण कार्यवर्ग असन्मय ही होने के कारण ‘असत् है’ इस प्रकार ग्रहण किया जाता । किन्तु ऐसी बात नहीं है; यह जगत् तो ‘है-है’ इस प्रकार ही ग्रहण किया जाता है, जिस प्रकार कि मृत्तिका आदि के कार्य घट आदि [अपने कारण] मृत्तिका आदि से समन्वित ही गृहीत होते हैं । अतः जगत् का मूल आत्मा ‘है’ इस प्रकार ही उपलब्ध किया जाना चाहिये । क्यों? क्योंकि आत्मा ‘है’ इस प्रकार कहनेवाले शास्त्रार्थानुसारी श्रद्धालु आस्तिक पुरुषों से भिन्न नास्तिक-वादियों को, जो ऐसा मानते हैं कि ‘जगत् का मूल आत्मा नहीं है, जिसका अभाव ही अन्तिम परिणाम है ऐसा यह कार्यवर्ग कारण से अनन्वित हुआ ही लीन हो जाता है’- ऐसे उन विपरीतदर्शियों को वह ब्रह्म किस प्रकार तत्त्वतः उपलब्ध हो सकता है? अर्थात् किसी प्रकार उपलब्ध नहीं हो सकता ॥ १२ ॥

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नैव वाचा न मनसा न चक्षुषा नान्यैरपीन्द्रियैः प्राप्तुं शक्यत इत्यर्थः । तथापि सर्वविशेषरहितोऽपि जगतो मूलम् इत्यवगतत्वादस्त्येव कार्यप्रविलापनस्य अस्तित्वनिष्ठत्वात् । तथा हीदं कार्यं सूक्ष्मतारतम्यपारम्पर्येणानुगम्यमानं सद्बुद्धिनिष्ठामेवावगमयति । यदापि विषयप्रविलापनेन प्रविलाप्यमाना बुद्धिस्तदापि सा सत्प्रत्ययगर्भैव विलीयते । बुद्धिर्हि नः प्रमाणं सदसतोर्याथात्म्यावगमे ।

मूलं चेज्जगतो न स्यादसदन्वितमेवेदं कार्यमसदित्येवं गृह्यते । न त्वेतदस्ति सत्सदित्येव तु गृह्यते; यथा मृदादिकार्यं घटादि मृदाद्यन्वितम् । तस्माज्जगतो मूलमात्मास्तीत्येवोपलब्धव्यः । कस्मात्? अस्तीति ब्रुवतोऽस्तित्ववादिन आगमार्थानुसारिणः श्रद्दधानादन्यत्र नास्तिकवादिनि नास्ति जगतो मूलमात्मा निरन्वयमेवेदं कार्यमभावान्तं प्रविलीयत इति मन्यमाने विपरीतदर्शिनि कथं तद्ब्रह्म तत्त्वत उपलभ्यते न कथञ्चनोपलभ्यत इत्यर्थः ॥ १२ ॥


अतः असद्वादियों के आसुरी पक्ष का निराकरण कर—
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तस्मादपोह्यासद्वादिपक्षम् आसुरम्—