अध्याय 2 वल्ली 3 - मन्त्र 13

अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः ।
अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ १३ ॥

astītyevopalabdhavyastattvabhāvena cobhayoḥ .
astītyevopalabdhasya tattvabhāvaḥ prasīdati .. 13 ..


वह आत्मा ‘है’ इस प्रकार ही उपलब्ध किया जाना चाहिये तथा उसे तत्त्वभाव से भी जानना चाहिये । इन दोनों प्रकार की उपलब्धियों में से जिसे ‘है’ इस प्रकार की उपलब्धि हो गयी है तत्त्वभाव उसके अभिमुख हो जाता है ॥ १३ ॥

बुद्धि आदि जिसकी उपाधि हैं तथा जिसका सत्त्व उसके कार्यवर्ग में अनुगत है उस आत्मा को ‘है’ इस प्रकार ही उपलब्ध करना चाहिये । जिस समय आत्मा उस बुद्धि आदि उपाधि से रहित और निर्विकार जाना जाता है तथा कार्यवर्ग ‘विकार वाणी का विलास और नाममात्र है, केवल मृत्तिका ही सत्य है’ इस श्रुति के अनुसार अपने कारण से भिन्न नहीं है—ऐसा निश्चित होता है उस समय जिस निरुपाधिक अलिङ्ग और सत्-असत् आदि प्रतीति के विषयत्व से रहित आत्मा का तत्त्वभाव होता है उस तत्त्वस्वरूप से ही आत्मा को उपलब्ध करना चाहिये—इस प्रकार यहाँ ‘उपलब्धव्य’ पद की अनुवृत्ति की जाती है ।

सोपाधिक अस्तित्व और निरुपाधिक तत्त्वभाव इन दोनों में से—यहाँ ‘उभयोः’ इस पद में षष्ठी निर्धारण के लिये है—पहले तो ‘है’ इस प्रकार उपलब्ध हुए आत्मा का अर्थात् सत्कार्यरूप उपाधि के किये हुए अस्तित्व-प्रत्यय से उपलब्ध हुए आत्मा का और फिर जिसकी सम्पूर्ण उपाधि निवृत्त हो गयी है और जो ज्ञात एवं अज्ञात से भिन्न अद्वितीयस्वरूप है, उस “नेति-नेति[ १ ]” “अस्थूलमनण्वह्रस्वम्[ २ ]” “अदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयने[ ३ ]” इत्यादि श्रुतियों से निर्दिष्ट आत्मा का तत्त्वभाव ‘प्रसीदति’—अभिमुख होता है अर्थात् जिसे पहले ‘है’ इस प्रकार आत्मा की उपलब्धि हो गयी है उसे अपना स्वरूप प्रकट करने के लिये [वह तत्त्वभाव अभिमुख प्रकाशित होता है] ॥ १३ ॥

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अस्तीत्येवात्मोपलब्धव्यः सत्कार्योबुद्ध्याद्युपाधिः । यदा तु तद्रहितोऽविक्रिय आत्मा कार्यं च कारणव्यतिरेकेण नास्ति “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” (छा० उ० ६ । १ । ४) इति श्रुतेस्तदा यस्य निरुपाधिकस्यालिङ्गस्य सदसदादिप्रत्ययविषयत्ववर्जितस्यात्मनस्तत्त्वभावो भवति तेन च रूपेण आत्मोपलब्धव्य इत्यनुवर्तते ।

तत्राप्युभयोः सोपाधिकनिरुपाधिकयोरस्तित्वतत्त्वभावयोः— निर्धारणार्था षष्ठी—

पूर्वमस्तीत्येवोपलब्धस्यात्मनः सत्कार्योपाधिकृतास्तित्वप्रत्ययेनोपलब्धस्य इत्यर्थः पश्चात्प्रत्यस्तमितसर्वोपाधिरूप आत्मनस्तत्त्वभावो विदिताविदिताभ्यामन्योऽद्वयस्वभावो “नेति नेति” (बृ० उ० २ । ३ । ६, ३ । ९ । २६) इति “अस्थूलमनण्वह्रस्वम्” (बृ० उ० ३ । ८ । ८) “अदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयने” (तै० उ० २ । ७ । १) इत्यादिश्रुतिनिर्दिष्टः प्रसीदत्यभिमुखीभवति आत्मप्रकाशनाय पूर्वमस्तीत्युपलब्धवत इत्येतत् ॥ १३ ॥


अमर कब होता है?

इस प्रकार परमार्थदर्शी की—
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एवं परमार्थदर्शिनोः—