अध्याय 2 वल्ली 3 - मन्त्र 14

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥

yadā sarve pramucyante kāmā ye’sya hṛdi śritāḥ .
atha martyo’mṛto bhavatyatra brahma samaśnute .. 14 ..


जिस समय सम्पूर्ण कामनाएँ, जो कि इसके हृदय में आश्रय करके रहती हैं, छूट जाती हैं उस समय वह मर्त्य (मरणधर्मा) अमर हो जाता है और इस शरीर से ही ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है ॥ १४ ॥

जब—जिस समय सम्पूर्ण कामनाएँ कामनायोग्य अन्य पदार्थ का अभाव होने के कारण छूट जाती हैं—छिन्न-भिन्न हो जाती हैं, जो कि बोध होने से पूर्व इस विद्वान् के हृदय—बुद्धि में आश्रित रहती हैं—क्योंकि बुद्धि ही कामनाओं का आश्रय है, आत्मा नहीं; जैसा कि “कामना, संकल्प [और संशय—ये सब मन ही हैं]” इत्यादि एक दूसरी श्रुति से भी सिद्ध होता है ।

तब फिर जो आत्मसाक्षात्कार से पूर्व मरणधर्मा था वह जीव आत्मज्ञान होने के अनन्तर अविद्या, कामना और कर्मरूप मृत्यु का नाश हो जाने से अमर हो जाता है । परलोक में गमन करानेवाले मृत्यु का विनाश हो जाने से वहाँ जाना सम्भव न होने के कारण वह इस लोक में ही दीपनिर्वाण के समान सम्पूर्ण बन्धनों के नष्ट हो जाने से ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है, अर्थात् ब्रह्म ही हो जाता है ॥ १४ ॥

> [ १ ]: ‘यह (स्थूल) नहीं है, यह (सूक्ष्म) नहीं है ।’

> [ २ ]: ‘अस्थूल, असूक्ष्म, अह्रस्व ।’

> [ ३ ]: ‘अदृश्य (इन्द्रियों के अविषय)-में, अनात्म्य (अहंता-ममताहीन)-में, अनिर्वचनीय में अनिलयन (आधाररहित)-में ।’

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यदा यस्मिन्काले सर्वे कामाः कामत्यागेन कामयितव्यस्यान्यस्याअभावात्प्रमुच्यन्ते विशीर्यन्ते येऽस्य प्राक्प्रतिबोधाद्विदुषो हृदि बुद्धौ श्रिता आश्रिताः । बुद्धिर्हि कामानामाश्रयो नात्मा । “कामः संकल्पः” (बृ० उ० १ । ५ । ३) इत्यादिश्रुत्यन्तराच्च ।

अथ तदा मर्त्यः प्राक्प्रबोधाद् आसीत्स प्रबोधोत्तरकालमविद्याकामकर्मलक्षणस्य मृत्योर्विनाशादमृतो भवति । गमनप्रयोजकस्य मृत्योर्विनाशाद्गमनानुपपत्तेरत्रैव प्रदीपनिर्वाणवत्सर्वबन्धनोपशमाद्ब्रह्म समश्नुते ब्रह्मैव भवतीत्यर्थः ॥ १४ ॥


परन्तु कामनाओं का समूल नाश कब होता है? इसपर कहते हैं—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
कदा पुनः कामानां मूलतो विनाश इत्युच्यते—