अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥
yadā sarve pramucyante kāmā ye’sya hṛdi śritāḥ .
atha martyo’mṛto bhavatyatra brahma samaśnute .. 14 ..
जब—जिस समय सम्पूर्ण कामनाएँ कामनायोग्य अन्य पदार्थ का अभाव होने के कारण छूट जाती हैं—छिन्न-भिन्न हो जाती हैं, जो कि बोध होने से पूर्व इस विद्वान् के हृदय—बुद्धि में आश्रित रहती हैं—क्योंकि बुद्धि ही कामनाओं का आश्रय है, आत्मा नहीं; जैसा कि “कामना, संकल्प [और संशय—ये सब मन ही हैं]” इत्यादि एक दूसरी श्रुति से भी सिद्ध होता है ।
तब फिर जो आत्मसाक्षात्कार से पूर्व मरणधर्मा था वह जीव आत्मज्ञान होने के अनन्तर अविद्या, कामना और कर्मरूप मृत्यु का नाश हो जाने से अमर हो जाता है । परलोक में गमन करानेवाले मृत्यु का विनाश हो जाने से वहाँ जाना सम्भव न होने के कारण वह इस लोक में ही दीपनिर्वाण के समान सम्पूर्ण बन्धनों के नष्ट हो जाने से ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है, अर्थात् ब्रह्म ही हो जाता है ॥ १४ ॥
> [ १ ]: ‘यह (स्थूल) नहीं है, यह (सूक्ष्म) नहीं है ।’
> [ २ ]: ‘अस्थूल, असूक्ष्म, अह्रस्व ।’
> [ ३ ]: ‘अदृश्य (इन्द्रियों के अविषय)-में, अनात्म्य (अहंता-ममताहीन)-में, अनिर्वचनीय में अनिलयन (आधाररहित)-में ।’
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यदा यस्मिन्काले सर्वे कामाः कामत्यागेन कामयितव्यस्यान्यस्याअभावात्प्रमुच्यन्ते विशीर्यन्ते येऽस्य प्राक्प्रतिबोधाद्विदुषो हृदि बुद्धौ श्रिता आश्रिताः । बुद्धिर्हि कामानामाश्रयो नात्मा । “कामः संकल्पः” (बृ० उ० १ । ५ । ३) इत्यादिश्रुत्यन्तराच्च ।
अथ तदा मर्त्यः प्राक्प्रबोधाद् आसीत्स प्रबोधोत्तरकालमविद्याकामकर्मलक्षणस्य मृत्योर्विनाशादमृतो भवति । गमनप्रयोजकस्य मृत्योर्विनाशाद्गमनानुपपत्तेरत्रैव प्रदीपनिर्वाणवत्सर्वबन्धनोपशमाद्ब्रह्म समश्नुते ब्रह्मैव भवतीत्यर्थः ॥ १४ ॥