अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम् ॥ १५ ॥
yadā sarve prabhidyante hṛdayasyeha granthayaḥ .
atha martyo’mṛto bhavatyetāvaddhyanuśāsanam .. 15 ..
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जिसमें सम्पूर्ण विशेषणों का अभाव है उस सर्वव्यापक ब्रह्म को ही अपने आत्मस्वरूप से जान लेने के कारण जिसकी अविद्या आदि समस्त ग्रन्थियाँ टूट गयी हैं और जो जीवितावस्था में ही ब्रह्मभाव को प्राप्त हो गया है उस विद्वान् का कहीं गमन नहीं होता—ऐसा पहले कहा गया, क्योंकि [चौदहवें मन्त्र में] ‘इस शरीर में ही ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है’—ऐसा कहा है । “उसके प्राण उत्क्रमण नहीं करते वह ब्रह्मरूप हुआ ही ब्रह्म में लीन हो जाता है” इस एक दूसरी श्रुति से भी यही निश्चय होता है ।
किन्तु जो मन्द ब्रह्मज्ञानी और अन्य विद्या (उपासना)-का परिशीलन करनेवाले ब्रह्मलोकप्राप्ति के अधिकारी हैं अथवा जो उनसे विपरीत [जन्ममरणरूप] संसार को ही प्राप्त होनेवाले हैं, उन्हीं की किसी गति-विशेष का वर्णन यहाँ प्रकरणप्राप्त ब्रह्मविद्या के उत्कृष्ट फल की स्तुति के लिये किया जाता है ।
इसके सिवा नचिकेता के पूछनेपर यमराज ने पहले अग्निविद्या का भी वर्णन किया था; उस अग्निविद्या के फल की प्राप्ति का प्रकार भी बतलाना है ही । इसी अभिप्राय से इस मन्त्र का आरम्भ किया जाता है । वहाँ [कहना यह है कि—]
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निरस्ताशेषविशेषव्यापिब्रह्मात्मप्रतिपत्त्या प्रभिन्नसमस्ताविद्यादिग्रन्थेर्जीवत एव ब्रह्मभूतस्य विदुषो न गतिर्विद्यत इत्युक्तमत्र ब्रह्म समश्नुत इत्युक्तत्वात् । “न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति” (बृ० उ० ४ । ४ । ६) इति श्रुत्यन्तराच्च ।
ये पुनर्मन्दब्रह्मविदो विद्यान्तरशीलिनश्च ब्रह्मलोकभाजो ये च तद्विपरीताः संसारभाजः तेषामेव गतिविशेष उच्यते— प्रकृतोत्कृष्टब्रह्मविद्याफलस्तुतये ।
किं चान्यदग्निविद्या पृष्टा प्रत्युक्ता च । तस्याश्च फलप्राप्तिप्रकारो वक्तव्य इति मन्त्रारम्भः । तत्र—