तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६ ॥
śataṃ caikā ca hṛdayasya nāḍyastāsāṃ mūrdhānamabhiniḥsṛtaikā .
tayordhvamāyannamṛtatvameti viṣvaṅṅanyā utkramaṇe bhavanti .. 16 ..
पुरुष के हृदय से सौ अन्य और सुषुम्ना नामकी एक—इस प्रकार [एक सौ एक] नाडियाँ—शिराएँ निकली हैं । उनमें सुषुम्ना-नाम्नी नाडी मस्तक का भेदन करके बाहर निकल गयी है । अन्तकाल में उसके द्वारा आत्मा को अपने हृदयदेश में वशीभूत करके समाहित करे ।
उस नाडी के द्वारा ऊर्ध्व—ऊपर की ओर जानेवाला जीव सूर्यमार्ग से अमृतत्व—आपेक्षिक अमरण-धर्मत्व को प्राप्त हो जाता है, जैसा कि “सम्पूर्ण भूतों के क्षयपर्यन्त रहनेवाला स्थान अमृतत्व कहलाता है” इस स्मृति से प्रमाणित होता है । अथवा [यह भी तात्पर्य हो सकता है कि] कालान्तर में ब्रह्मा के साथ ब्रह्मलोक के अनुपम भोगों को भोगकर मुख्य अमृतत्व को प्राप्त करता है । इसके सिवा जिनकी गति विविध भाँति की हैं ऐसी अन्य सब नाडियाँ प्राणप्रयाण की हेतु होती हैं, अर्थात् वे संसारप्राप्ति के लिये ही होती हैं ॥ १६ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
शतं च शतसंख्याका एका च सुषुम्नाभेदेन सुषुम्ना नाम पुरुषस्यअमृतत्वम् हृदयाद्विनिःसृता नाड्यः शिरास्तासां मध्ये मूर्धानं भित्त्वाभिनिःसृता निर्गता सुषुम्ना नाम । तयान्तकाले हृदय आत्मानं वशीकृत्य योजयेत् ।
तया नाड्योर्ध्वमुपर्यायन् गच्छन्नादित्यद्वारेणामृतत्वममरणधर्मत्वमापेक्षिकम् । “आभूतसंप्लवं स्थानममृतत्वं विभाव्यते” (वि० पु० २ । ८ । ९७) इति स्मृतेः । ब्रह्मणा वा सह कालान्तरेण मुख्यममृतत्वमेति भुक्त्वा भोगाननुपमान्ब्रह्मलोकगतान् । विष्वङ्नानाविधगतयः अन्या नाड्य उत्क्रमणे निमित्तं भवन्ति संसारप्रतिपत्त्यर्था एव भवन्तीत्यर्थः ॥ १६ ॥