अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः ।
तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ।
तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥ १७ ॥
तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ।
तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥ १७ ॥
aṅguṣṭhamātraḥ puruṣo’ntarātmā sadā janānāṃ hṛdaye saṃniviṣṭaḥ .
taṃ svāccharīrātpravṛhenmuñjādiveṣīkāṃ dhairyeṇa .
taṃ vidyācchukramamṛtaṃ taṃ vidyācchukramamṛtamiti .. 17 ..
अङ्गुष्ठमात्र पुरुष, जो अन्तरात्मा है सर्वदा जीवों के हृदयदेश में स्थित है । मूँज से सींक के समान उसे धैर्यपूर्वक अपने शरीर से बाहर निकाले [अर्थात् शरीर से पृथक् करके अनुभव करे] । उसे शुक्र (शुद्ध) और अमृतरूप समझे, उसे शुक्र और अमृतरूप समझे ॥ १७ ॥
अङ्गुष्ठमात्र पुरुष, जिसकी व्याख्या पहले (क० उ० २ । १ । १२-१३ में) की जा चुकी है और जो जीवों के हृदय में स्थित उनका अन्तरात्मा है उसे अपने शरीर से बाहर करे—ऊपर नियन्त्रित करे—निकाले अर्थात् शरीर से पृथक् करे । किस प्रकार पृथक् करे? इसपर कहते हैं—धैर्य अर्थात् अप्रमादपूर्वक इस प्रकार अलग करे जैसे मूँज से उसके भीतर रहनेवाली सींक की जाती है । शरीर से पृथक् किये हुए उस (अङ्गुष्ठमात्र पुरुष)-को ही पूर्वोक्त चिन्मात्र विशुद्ध और अमृतमय ब्रह्म जाने । यहाँ ‘तं विद्याच्छुक्रममृतम्’ इस पद की द्विरुक्ति और ‘इति’ शब्द उपनिषद् की समाप्ति के लिये हैं ॥ १७ ॥
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अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां सम्बन्धिनि हृदये संनिविष्टो यथाव्याख्यातः तं स्वादात्मीयाच्छरीरात्प्रवृहेद् उद्यच्छेन्निष्कर्षेत्पृथक्कुर्यादित्यर्थः । किमिवेत्युच्यते मुञ्जादिवेषीकामन्तःस्थां धैर्येणाप्रमादेन । तं शरीरान्निष्कृष्टं चिन्मात्रं विद्याद्विजानीयाच्छुक्रममृतं यथोक्तं ब्रह्मेति । द्विर्वचनमुपनिषत्परिसमाप्त्यर्थमितिशब्दश्च ॥ १७ ॥
अब विद्या की स्तुति के लिये यह आख्यायिका के अर्थ का उपसंहार कहा जाता है—
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विद्यास्तुत्यर्थोऽयमाख्यायिकार्थोपसंहारोऽधुनोच्यते—