अध्याय 2 वल्ली 3 - मन्त्र 18

मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् ।
ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥ १८ ॥

mṛtyuproktāṃ naciketo’tha labdhvā vidyāmetāṃ yogavidhiṃ ca kṛtsnam .
brahmaprāpto virajo’bhūdvimṛtyuranyo’pyevaṃ yo vidadhyātmameva .. 18 ..


मृत्यु की कही हुई इस विद्या और सम्पूर्ण योगविधि को पाकर नचिकेता ब्रह्मभाव को प्राप्त, विरज (धर्माधर्मशून्य) और मृत्युहीन हो गया । दूसरा भी जो कोई अध्यात्म-तत्त्व को इस प्रकार जानेगा वह भी वैसा ही हो जायगा ॥ १८ ॥

मृत्यु की कही हुई इस पूर्वोक्त ब्रह्मविद्या और कृत्स्न—सम्पूर्ण योगविधि को, उसके साधन और फल के सहित, वरप्रदान के कारण मृत्यु से प्राप्त कर नचिकेता, क्या हो गया? [इसपर कहते हैं—] ब्रह्मभाव को प्राप्त हो गया, अर्थात् मुक्त हो गया । सो किस प्रकार? [इसपर कहते हैं—] विद्या की प्राप्तिद्वारा पहले विरज—धर्माधर्म से रहित और विमृत्यु—काम और अविद्या से रहित होकर [मुक्त हो गया] ऐसा इसका तात्पर्य है ।

केवल नचिकेता ही नहीं, बल्कि नचिकेता के समान जो दूसरा भी आत्मज्ञानी है अर्थात् जो अपने देहादि के अधिष्ठाता उपचारशून्य प्रत्यक्स्वरूप- को—यही तत्त्व है, अन्य अप्रत्यक्रूप नहीं—ऐसा जानता है, जो उक्त प्रकार से अपने उसी अध्यात्मरूप को जानता है अर्थात् जो उसी प्रकार जाननेवाला है वह भी विरज (धर्माधर्म से रहित) होकर ब्रह्मप्राप्तिद्वारा मृत्युहीन हो जाता है—वह वाक्य शेष है ॥ १८ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

मृत्युप्रोक्तां यथोक्तामेतां ब्रह्मविद्यां योगविधिं च कृत्स्नं समस्तं सोपकरणं सफलमित्येतत्; नचिकेता वरप्रदानाद् मृत्योर्लब्ध्वा प्राप्येत्यर्थः—किम्? ब्रह्मप्राप्तोऽभून्मुक्तोऽभवदित्यर्थः । कथम्? विद्याप्राप्त्या विरजो विगतधर्माधर्मो विमृत्युर्विगतकामाविद्यश्च सन्पूर्वमित्यर्थः ।

न केवलं नचिकेता एव अन्योऽपि नचिकेतोवदात्मविद् अध्यात्ममेव निरुपचरितं प्रत्यक्स्वरूपं प्राप्य तत्त्वमेवेत्यभिप्रायः, नान्यद्रूपमप्रत्यग्रूपम् । तदेवमध्यात्ममेवमुक्तप्रकारेण वेद विजानातीत्येवंवित्सोऽपि विरजः सन्ब्रह्मप्राप्त्या विमृत्युर्भवतीति वाक्यशेषः ॥ १८ ॥


अब शिष्य और आचार्य के प्रमादकृत अन्याय से विद्या के ग्रहण और प्रतिपादन में होनेवाले दोषों की निवृत्ति के लिये यह शान्ति कही जाती है—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
शिष्याचार्ययोः प्रमादकृतान्यायेन विद्याग्रहणप्रतिपादननिमित्तदोषप्रशमनार्थेयं शान्तिरुच्यते—