यदिदं किं च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् ।
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥
yadidaṃ kiṃ ca jagatsarvaṃ prāṇa ejati niḥsṛtam .
mahadbhayaṃ vajramudyataṃ ya etadviduramṛtāste bhavanti .. 2 ..
यह जो कुछ सारा जगत् है प्राण—ब्रह्म में, उदित होकर उसी से, चेष्टा कर रहा है । वह ब्रह्म महान् भयरूप और उठे हुए वज्र के समान है । जो इसे जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥ २ ॥
यह जो कुछ है अर्थात् यह जो कुछ जगत् है वह सब प्राण यानी परब्रह्म के होने पर ही उसी से प्रादुर्भूत होकर एजन—कम्पन—गमन अर्थात् नियम से चेष्टा कर रहा है । इस प्रकार जो ब्रह्म जगत् की उत्पत्ति आदि का कारण है वह महान् भयरूप है । यह महान् भयरूप है अर्थात् इससे सब भय मानते हैं, इसलिये यह ‘महद्भय’ है । तथा उठाये हुए वज्र के समान है । कहना यह है कि जिस प्रकार अपने सामने स्वामी को हाथ में वज्र उठाये देखकर सेवकलोग नियमानुसार उसकी आज्ञा में प्रवृत्त होते रहते हैं उसी प्रकार चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र और तारा आदि रूप यह सारा जगत् अपने अधिष्ठाताओं के सहित एक क्षण को भी विश्राम न लेकर नियमानुसार उसकी आज्ञा में बर्तता है । अपने अन्तःकरण की प्रवृत्ति के साक्षीभूत इस एक ब्रह्म को जो लोग जानते हैं वे अमर—अमरणधर्मा हो जाते हैं ॥ २ ॥
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यदिदं किं च यत्किं चेदं जगत्सर्वं प्राणे परस्मिन्ब्रह्मणि सत्येजति कम्पते तत एव निःसृतं निर्गतं सत्प्रचलति नियमेन चेष्टते । यदेवं जगदुत्पत्त्यादिकारणं ब्रह्म तन्महद्भयम् । महच्च तद्भयं च बिभेत्यस्मादिति महद्भयम्; वज्रमुद्यतमुद्यतमिव वज्रम् । यथा वज्रोद्यतकरं स्वामिनमभिमुखीभूतं दृष्ट्वा भृत्या नियमेन तच्छासने वर्तन्ते तथेदं चन्द्रादित्यग्रहनक्षत्रतारकादिलक्षणं जगत्सेश्वरं नियमेन क्षणम् अप्यविश्रान्तं वर्तत इत्युक्तं भवति । य एतद्विदुः स्वात्मप्रवृत्तिसाक्षीभूतमेकं ब्रह्मामृता अमरणधर्माणस्ते भवन्ति ॥ २ ॥
उसके भय से जगत् किस प्रकार व्यापार कर रहा है? सो कहते हैं—
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कथं तद्भयाज्जगद्वर्तत इत्याह—