भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः ।
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥
bhayādasyāgnistapati bhayāttapati sūryaḥ .
bhayādindraśca vāyuśca mṛtyurdhāvati pañcamaḥ .. 3 ..
इस (परमेश्वर)-के भय से अग्नि तपता है, इसीके भय से सूर्य तपता है तथा इसीके भय से इन्द्र, वायु और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है ॥ ३ ॥
इस परमेश्वर के भय से अग्नि तपता है, इसीके भय से सूर्य तप रहा है तथा इसीके भय से इन्द्र, वायु और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है । यदि सामर्थ्यवान् और ईशनशील लोकपालों का, हाथ में वज्र उठाये रखनेवाले [इन्द्र]-के समान कोई नियन्ता न होता तो स्वामी के भय से प्रवृत्त होनेवाले सेवकों के समान उनकी नियमित प्रवृत्ति नहीं हो सकती थी ॥ ३ ॥
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भयाद्भीत्या परमेश्वरस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यो भयाद् इन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः । न हीश्वराणां लोकपालानां समर्थानां सतां नियन्ता चेद्वज्रोद्यतकरवन्न स्यात्स्वामिभयभीतानामिव भृत्यानां नियता प्रवृत्तिरुपपद्यते ॥ ३ ॥
ईश्वरज्ञान के बिना पुनर्जन्मप्राप्ति
और उस (भय के कारणस्वरूप ब्रह्म)-को—
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तच्च—