इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक्शरीरस्य विस्रसः ।
ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥
ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥
iha cedaśakadboddhuṃ prākśarīrasya visrasaḥ .
tataḥ sargeṣu lokeṣu śarīratvāya kalpate .. 4 ..
यदि इस देह में इसके पतन से पूर्व ही [ब्रह्म को] जान सका तो बन्धन से मुक्त होता है यदि नहीं जान पाया तो इन जन्म-मरणशील लोकों में वह शरीरभाव को प्राप्त होने में समर्थ होता है ॥ ४ ॥
यदि इस देह में अर्थात् जीवित रहते हुए ही शरीर का पतन होने से पूर्व साधक पुरुष ने इन सूर्यादि के भय के हेतुभूत ब्रह्म को जान लिया तो वह संसारबन्धन से मुक्त हो जाता है; और यदि उसे न जान सका तो उसका ज्ञान न होने के कारण वह सर्गों में जिनमें स्रष्टव्य प्राणियों की रचना की जाती है उन पृथिवी आदि लोकों में शरीरत्व—शरीरभाव को प्राप्त होने में समर्थ होता है अर्थात् शरीर ग्रहण कर लेता है । अतः शरीरपात से पूर्व ही आत्मज्ञान के लिये यत्न करना चाहिये ॥ ४ ॥
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इह जीवन्नेव चेद्यद्यशकत् शक्नोति शक्तः सञ्जानात्येतद्भयकारणं ब्रह्म बोद्धुमवगन्तुं प्राक्पूर्वं शरीरस्य विस्रसोऽवस्त्रंसनात्पतनात्संसारबन्धनाद्विमुच्यते । न चेदशक्नोद्बोद्धुं ततः अनवबोधात्सर्गेषु सृज्यन्ते येषु स्रष्टव्याः प्राणिन इति सर्गाः पृथिव्यादयो लोकास्तेषु सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय शरीरभावाय कल्पते समर्थो भवति शरीरं गृह्णातीत्यर्थः । तस्माच्छरीरविस्रंसनात्प्रागात्मबोधाय यत्न आस्थेयः ॥ ४ ॥
क्योंकि जिस प्रकार दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब स्पष्ट पड़ता है उसी प्रकार इस (मनुष्यदेह)-में ही आत्मा का स्पष्ट दर्शन हो सकता है । इसमें वह जैसा स्पष्टतया अनुभव होता है वैसा ब्रह्मलोक को छोड़कर और किसी लोक में नहीं होता और उसका प्राप्त होना अत्यन्त कठिन है; सो किस प्रकार? इसपर कहते हैं—
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यस्मादिहैवात्मनो दर्शनम् आदर्शस्थस्येव मुखस्य स्पष्टमुपपद्यते न लोकान्तरेषु ब्रह्मलोकाद् अन्यत्र, स च दुष्प्रापः, कथम्? इत्युच्यते—