अध्याय 2 वल्ली 3 - मन्त्र 5

यथादर्शे तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके ।
यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५ ॥

yathādarśe tathātmani yathā svapne tathā pitṛloke .
yathāpsu parīva dadṛśe tathā gandharvaloke chāyātapayoriva brahmaloke .. 5 ..


जिस प्रकार दर्पण में उसी प्रकार निर्मल बुद्धि में आत्मा का [स्पष्ट] दर्शन होता है तथा जैसा स्वप्न में वैसा ही पितृलोक में और जैसा जल में वैसा ही गन्धर्वलोक में उसका [अस्पष्ट] भान होता है; किन्तु ब्रह्मलोक में तो छाया और प्रकाश के समान वह [सर्वथा स्पष्ट] अनुभव होता है ॥ ५ ॥

जिस प्रकार लोक दर्पण में प्रतिबिम्बित हुए अपने-आपको अत्यन्त स्पष्टतया देखता है उसी प्रकार दर्पण के समान निर्मल हुई अपनी बुद्धि में आत्मा का स्पष्ट दर्शन होता है—ऐसा इसका अभिप्राय है ।

जिस प्रकार स्वप्न में जाग्रद्वासनाओं से प्रकट हुआ दर्शन अस्पष्ट होता है उसी प्रकार पितृलोक में भी अस्पष्ट आत्मदर्शन होता है, क्योंकि वहाँ जीव कर्मफल के उपभोग में आसक्त रहता है । तथा जिस प्रकार जल में अपना स्वरूप ऐसा दिखलायी देता है, मानो उसके अवयव विभक्त न हों उसी प्रकार गन्धर्वलोक में भी अस्पष्टरूप से ही आत्मा का दर्शन होता है । अन्य लोकों में भी शास्त्रप्रमाण से ऐसा ही [अर्थात् अस्पष्ट आत्मदर्शन ही] माना जाता है । एकमात्र ब्रह्मलोक में ही छाया और प्रकाश के समान वह आत्मदर्शन अत्यन्त स्पष्टतया होता है । किन्तु अत्यन्त विशिष्ट कर्म और ज्ञान से साध्य होने के कारण वह ब्रह्मलोक बड़ा ही दुष्प्राप्य है । अतः अभिप्राय यह है कि इस मनुष्यलोक में ही आत्मदर्शन के लिये प्रयत्न करना चाहिये ॥ ५ ॥

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यथादर्शे प्रतिबिम्बभूतम् आत्मानं पश्यति लोकोऽत्यन्तविविक्तं तथेहात्मनि स्वबुद्धौ आदर्शवन्निर्मलीभूतायां विविक्तम् आत्मनो दर्शनं भवतीत्यर्थः ।

यथा स्वप्नेऽविविक्तं जाग्रद्वासनोद्भूतं तथा पितृलोकेऽविविक्तम् एव दर्शनमात्मनः कर्मफलोपभोगासक्तत्वात् । यथा चाप्सु अविभक्तावयवमात्मरूपं परीव ददृशे परिदृश्यत इव तथा गन्धर्वलोकेऽविविक्तमेव दर्शनमात्मनः । एवं च लोकान्तरेष्वपि शास्त्रप्रामाण्यादवगम्यते । छायातपयोरिवात्यन्तविविक्तं ब्रह्मलोक एव एकस्मिन् । स च दुष्प्रापोऽत्यन्तविशिष्टकर्मज्ञानसाध्यत्वात् । तस्मादात्मदर्शनायैहैव यत्नः कर्तव्य इत्यभिप्रायः ॥ ५ ॥


उस आत्मा को किस प्रकार जानना चाहिये और उसके जानने में क्या प्रयोजन है? इसपर कहते हैं—
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कथमसौ बोद्धव्यः किं वा तदवबोधे प्रयोजनमित्युच्यते—