अध्याय 2 वल्ली 3 - मन्त्र 6

इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् ।
पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६ ॥

indriyāṇāṃ pṛthagbhāvamudayāstamayau ca yat .
pṛthagutpadyamānānāṃ matvā dhīro na śocati .. 6 ..


[पृथक्-पृथक् भूतों से उत्पन्न होनेवाली] इन्द्रियों के जो विभिन्न भाव तथा उनकी उत्पत्ति और प्रलय हैं उन्हें जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ ६ ॥
अपने-अपने विषय को ग्रहण करनारूप प्रयोजन के कारण अपने कारणरूप आकाशादि भूतों से पृथक्पृथक् उत्पन्न होनेवाली श्रोत्रादि इन्द्रियों का जो अत्यन्त विशुद्धस्वरूप केवल चिन्मात्र आत्मस्वरूप से पृथक्त्व अर्थात् स्वाभाविक विलक्षणरूपता है उसे तथा जाग्रत् और स्वप्न की अपेक्षा से उन इन्द्रियों के उदयास्तमय—उत्पत्ति और प्रलय को जानकर अर्थात् विवेकपूर्वक यह समझकर कि ये इन्द्रियों की ही अवस्थाएँ हैं, आत्मा की नहीं, धीर—बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता, क्योंकि सर्वदा एक स्वभाव में रहनेवाले आत्मा का कभी व्यभिचार न होने के कारण शोक का कोई कारण नहीं ठहरता । जैसा कि “आत्मज्ञानी शोक को पार कर जाता है” ऐसी एक श्रुति भी है ॥ ६ ॥
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इन्द्रियाणां श्रोत्रादीनां स्वस्वविषयग्रहणप्रयोजनेन स्वकारणेभ्य आकाशादिभ्यः पृथग् उत्पद्यमानानामत्यन्तविशुद्धात् केवलाच्चिन्मात्रात्मस्वरूपात्पृथग्भावं स्वभावविलक्षणात्मकतां तथा तेषामेवेन्द्रियाणामुदयास्तमयौ चोत्पत्तिप्रलयौ जाग्रत्स्वापावस्थापेक्षया नात्मन इति मत्वा ज्ञात्वा विवेकतो धीरो धीमान्न शोचति । आत्मनो नित्यैकस्वभावस्य अव्यभिचाराच्छोककारणत्वानुपपत्तेः । तथा च श्रुत्यन्तरं “तरति शोकमात्मवित्” (छा० उ० ७ । १ । ३) इति ॥ ६ ॥

जिस आत्मा से इन्द्रियों का पृथक्त्व दिखलाया गया है वह कहीं बाहर है—ऐसा नहीं समझना चाहिये, क्योंकि वह सभी का अन्तरात्मा है । सो किस प्रकार? इसपर कहते हैं—
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यस्मादात्मन इन्द्रियाणां पृथग्भाव उक्तो नासौ बहिरधिगन्तव्यो यस्मात्प्रत्यगात्मा स सर्वस्य । तत्कथमित्युच्यते—