अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च ।
यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥
यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥
avyaktāttu paraḥ puruṣo vyāpako’liṅga eva ca .
yaṃ jñātvā mucyate janturamṛtatvaṃ ca gacchati .. 8 ..
अव्यक्त से भी पुरुष श्रेष्ठ है और वह व्यापक तथा अलिङ्ग है; जिसे जानकर मनुष्य मुक्त होता है और अमरत्व को प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥
अव्यक्त से भी पुरुष श्रेष्ठ है । वह आकाशादि सम्पूर्ण व्यापक पदार्थों का भी कारण होने से व्यापक है । और अलिङ्ग है—जिसके द्वारा कोई वस्तु जानी जाती है वह बुद्धि आदि लिङ्ग कहलाते हैं; परन्तु पुरुष में इनका अभाव है इसलिये यह अलिङ्ग अर्थात् सम्पूर्ण संसारधर्मों से रहित ही है । जिसे आचार्य और शास्त्र द्वारा जानकर पुरुष जीवित रहते हुए ही अविद्या आदि हृदय की ग्रन्थियों से मुक्त हो जाता है तथा शरीर का पतन होने पर भी अमरत्व को प्राप्त होता है वह पुरुष अलिङ्ग है और अव्यक्त से भी पर है—इस प्रकार इसका पूर्ववाक्य से सम्बन्ध है ॥ ८ ॥
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अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापको व्यापकस्याप्याकाशादेः सर्वस्य कारणत्वात् । अलिङ्गो लिङ्ग्यते गम्यते येन तल्लिङ्गं बुद्ध्यादि तदविद्यमानमस्येति सोऽयमलिङ्ग एव । सर्वसंसारधर्मवर्जित इत्येतत् । यं ज्ञात्वा आचार्यतः शास्त्रतश्च मुच्यते जन्तुः, अविद्यादि हृदयग्रन्थिभिर्जीवन्नेव पतितेऽपि शरीरेऽमृतत्वं च गच्छति सोऽलिङ्गः परोऽव्यक्तात् पुरुष इति पूर्वेणैव सम्बन्धः ॥ ८ ॥
तो फिर जिसका कोई लिङ्ग (ज्ञापक चिह्न) नहीं है उस [आत्मा] का दर्शन होना किस प्रकार सम्भव है? इसपर कहा जाता है—
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कथं तर्ह्यलिङ्गस्य दर्शनम् उपपद्यत इत्युच्यते—