अध्याय 2 वल्ली 3 - मन्त्र 9

न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् ।
हृदा मनीषा मनसाभिकॢप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥

na saṃdṛśe tiṣṭhati rūpamasya na cakṣuṣā paśyati kaścanainam .
hṛdā manīṣā manasābhikḷpto ya etadviduramṛtāste bhavanti .. 9 ..


इस आत्मा का रूप दृष्टि में नहीं ठहरता । इसे नेत्र से कोई भी नहीं देख सकता । यह आत्मा तो मन का नियमन करनेवाली हृदयस्थिता बुद्धि द्वारा मननरूप सम्यग्दर्शन से प्रकाशित [हुआ ही जाना जा सकता] है । जो इसे [ब्रह्मरूप से] जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥ ९ ॥

इस प्रत्यगात्मा का रूप दृष्टि-विषय में स्थिर नहीं होता । अतः कोई भी पुरुष इस प्रकृत आत्मा को चक्षु से—सम्पूर्ण इन्द्रियों से [अर्थात् समस्त इन्द्रियों में से किसी से] भी नहीं देख सकता अर्थात् उपलब्ध नहीं कर सकता । यहाँ चक्षु का ग्रहण सम्पूर्ण इन्द्रियों का उपलक्षण कराने के लिये है ।

तो फिर उसे किस प्रकार देखे? इसपर कहते हैं—हृदयस्थिता बुद्धि से, जो कि सङ्कल्पादिरूप मन की नियन्त्री होकर ईशन करने के कारण ‘मनीट्’ है उस विकल्पशून्या बुद्धि से मन अर्थात् मननरूप यथार्थदर्शन द्वारा सब प्रकार समर्थित अर्थात् प्रकाशित हुआ वह आत्मा जाना जा सकता है । यहाँ ‘आत्मा जाना जा सकता है’ यह वाक्यशेष है । उस आत्मा को जो लोग ‘यह ब्रह्म है’ ऐसा जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥ ९ ॥

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न संदृशे संदर्शनविषये न तिष्ठति प्रत्यगात्मनोऽस्य रूपम् । अतो न चक्षुषा सर्वेन्द्रियेण, चक्षुर्ग्रहणस्योपलक्षणार्थत्वात्, पश्यति नोपलभते कश्चन कश्चिद् अप्येनं प्रकृतमात्मानम् ।

कथं तर्हि तं पश्येदित्युच्यते । हृदा हृत्स्थया बुद्ध्या । मनीषा मनसः संकल्पादिरूपस्येष्टे नियन्तृत्वेनेति मनीट् तया हृदा मनीषाविकल्पयित्र्या मनसा मननरूपेण सम्यग्दर्शनेन अभिकॢप्तोऽभिसमर्थितोऽभि प्रकाशित इत्येतत् । आत्मा ज्ञातुं शक्यत इति वाक्यशेषः । तम् आत्मानं ब्रह्मैतद्ये विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥


वह हृदयस्थित [सङ्कल्पशून्य] बुद्धि किस प्रकार प्राप्त होती है? यह बतलाने के लिये योगसाधन का उपदेश किया जाता है—
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सा हन्मनीट् कथं प्राप्यत इति तदर्थो योग उच्यते—