शान्तिपाठ

शान्तिपाठ

ॐ सह नाववतु ।
सह नौ भुनक्तु ।
सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु ।
मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

oṃ saha nāvavatu .
saha nau bhunaktu .
saha vīryaṃ karavāvahai .
tejasvi nāvadhītamastu .
mā vidviṣāvahai .
oṃ śāntiḥ! śāntiḥ!! śāntiḥ!!!


वह परमात्मा हम (आचार्य और शिष्य) दोनों की साथ-साथ रक्षा करें । हम दोनों का साथ-साथ पालन करें । हम साथ-साथ विद्यासम्बन्धी सामर्थ्य प्राप्त करें! हम दोनों का पढ़ा हुआ तेजस्वी हो । हम द्वेष न करें । त्रिविध ताप की शान्ति हो ।

शान्तिपाठ

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये तृतीया वल्ली समाप्ता ॥ ३ ॥ (६)

ॐ सह नाववतु ।
सह नौ भुनक्तु ।
सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
१९ ॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

oṃ saha nāvavatu .
saha nau bhunaktu .
saha vīryaṃ karavāvahai .
tejasvi nāvadhītamastu mā vidviṣāvahai ..
19 ..
oṃ śāntiḥ! śāntiḥ!! śāntiḥ!!!


परमात्मा हम [आचार्य और शिष्य] दोनों की साथ-साथ रक्षा करे । हमारा साथ-साथ पालन करे । हम साथ-साथ विद्यासम्बन्धी सामर्थ्य प्राप्त करें । हमारा अध्ययन किया हुआ तेजस्वी हो । हम द्वेष न करें ॥ १९ ॥
विद्या के स्वरूप का प्रकाशन कर हम दोनों की साथ-साथ रक्षा करे । कौन [रक्षा करे? इसपर कहते हैं—] वह उपनिषत्प्रकाशित परमेश्वर ही [हमारी रक्षा करे] । तथा उसके फल को प्रकाशित कर वह हम दोनों का साथ-साथ पालन करे । हम अपने विद्याकृत वीर्य—सामर्थ्य को साथ-साथ ही सम्पादित करें—प्राप्त करें । और हम तेजस्वियों का जो अध्ययन किया हुआ है वह सुपठित हो । अथवा तेजस्वी हो अर्थात् हमलोगों का जो अध्ययन किया हुआ है वह अत्यन्त तेजस्वी यानी वीर्यवान् हो । हम शिष्य और आचार्य परस्पर विद्वेष न करें अर्थात् हम प्रमादकृत अन्याय से अध्ययन और अध्यापन में हुए दोषों के कारण परस्पर एक-दूसरे से द्वेष न करें । ‘शान्तिः शान्तिः शान्तिः’ इस प्रकार ‘शान्तिः’ शब्द का तीन बार उच्चारण [आध्यात्मिकादि] सम्पूर्ण दोषों की शान्ति के लिये किया गया है । इत्योम् ॥ १९ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें

सह नावाववतु पालयतु विद्यास्वरूपप्रकाशनेन । कः? स एव परमेश्वर उपनिषत्प्रकाशितः । किं च सह नौ भुनक्तु तत्फलप्रकाशनेन नौ पालयतु ।

सहैवावां विद्याकृतं वीर्यं सामर्थ्यं करवावहै निष्पादयावहै । किं च तेजस्वि नौ तेजस्विनोरावयोर्यदधीतं तत्स्वधीतमस्तु । अथवा तेजस्वि नावावाभ्यां यदधीतं तदतीव तेजस्वि वीर्यवदस्तु इत्यर्थः । मा विद्विषावहै शिष्याचार्यावन्योन्यं प्रमादकृतान्यायाध्ययनाध्यापनदोषनिमित्तं द्वेषं मा करवावहै इत्यर्थः । शान्तिः शान्तिः शान्तिरिति त्रिर्वचनं सर्वदोषोपशमनार्थमित्योमिति ॥ १९ ॥


इति कठोपनिषदि द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ २ ॥

॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥