ॐ
॥ तत्सद्ब्रह्मणे नमः ॥
सर्वभावपदातीतं स्वात्मानं तं स्मराम्यहम् ॥
yasmin sarvaṃ yataḥ sarvaṃ yaḥ sarvadṛktathā .
sarvabhāvapadātītaṃ svātmānaṃ taṃ smarāmyaham ..
सम्बन्ध-भाष्य
प्रथमोऽध्यायः
प्रथमा वल्ली
ॐ ब्रह्मविद्या के आचार्य सूर्यपुत्र भगवान् यम और नचिकेता को नमस्कार है ।
अब कठोपनिषद् की वल्लियों को सुगमता से समझाने के लिये यह संक्षिप्त वृत्ति आरम्भ की जाती है ।
विशरण (नाश), गति और अवसादन (शिथिल करना) — इन तीन अर्थोंवाली तथा ‘उप’ और ‘नि’ उपसर्गपूर्वक एवं ‘क्विप्’ प्रत्ययान्त ‘सद्’ धातु का ‘उपनिषद्’ यह रूप बनता है । उपनिषद् शब्द से, जिस ग्रन्थ की हम व्याख्या करना चाहते हैं उसके प्रतिपाद्य और वेद्य ब्रह्मविषयक विद्या का प्रतिपादन किया जाता है । किस अर्थ का योग होने के कारण उपनिषद् शब्द से विद्या का कथन होता है, सो बतलाते हैं ।
जो मोक्षकामी पुरुष लौकिक और पारलौकिक विषयों से विरक्त होकर उपनिषद् शब्द की वाच्य तथा आगे कहे जानेवाले लक्षणों से युक्त विद्या के समीप जाकर अर्थात् उसे प्राप्त कर उसी की निष्ठा से निश्चयपूर्वक उसका परिशीलन करते हैं उनके अविद्या आदि संसार के बीज का विशरण — हिंसन अर्थात् विनाश करने के कारण इस अर्थ के योग से ही ‘उपनिषद्’ शब्द से वह विद्या कही जाती है । ऐसा ही आगे श्रुति कहेगी भी कि “उसे साक्षात् जानकर पुरुष मृत्यु के मुख से छूट जाता है ।”
अथवा पूर्वोक्त विशेषणों से युक्त मुमुक्षुओं को ब्रह्मविद्या परब्रह्म के पास पहुँचा देती है — इस प्रकार ब्रह्म के पास पहुँचानेवाली होने के कारण इस अर्थ के योग से भी ब्रह्मविद्या ‘उपनिषद्’ है । ऐसा ही ‘ब्रह्म को प्राप्त हुआ पुरुष विरज (शुद्ध) और विमृत्यु (अमर) हो गया’ इस वाक्य से श्रुति आगे कहेगी भी ।
जो अग्नि भूः भुवः आदि लोकों से पूर्वसिद्ध, ब्रह्मा से उत्पन्न और ज्ञाता है उससे सम्बन्ध रखनेवाली विद्या, जो कि दूसरे वर से माँगी गयी है, और स्वर्गलोकरूप फल की प्राप्ति के कारणरूप से लोकान्तरों में पुनः-पुनः प्राप्त होनेवाले गर्भवास, जन्म और वृद्धावस्था आदि उपद्रवसमूह का अवसादन अर्थात् शैथिल्य करनेवाली है, अतः वह अग्निविद्या भी ‘सद्’ धातु के अर्थ के योग से ‘उपनिषद्’ कही जाती है । “स्वर्गलोक को प्राप्त होनेवाले पुरुष अमरत्व प्राप्त करते हैं” ऐसा आगे कहेंगे भी ।
शङ्का — किन्तु अध्ययन करनेवाले तो ‘उपनिषद्’ शब्द से ग्रन्थ का भी उल्लेख करते हैं, जैसे — ‘हम उपनिषद् पढ़ते हैं अथवा पढ़ाते हैं’ इत्यादि ।
समाधान — ऐसा कहना भी दोषयुक्त नहीं है । संसार के हेतुभूत अविद्या आदि के विशरण आदि, जो कि सद् धातु के अर्थ हैं, ग्रन्थमात्र में तो सम्भव नहीं हैं किन्तु विद्या में सम्भव हो सकते हैं । ग्रन्थ भी विद्या के ही लिये है; इसलिये वह भी उस शब्द से कहा जा सकता है; जैसे [आयुर्वृद्धि में उपयोगी होने के कारण] ‘घृत आयु ही है’ ऐसा कहा जाता है । इसलिये ‘उपनिषद्’ शब्द विद्या में मुख्य वृत्ति से प्रयुक्त होता है तथा ग्रन्थ में गौणी वृत्ति से ।
इस प्रकार ‘उपनिषद्’ शब्द का निर्वचन करने से ही विद्या का विशिष्ट अधिकारी बतला दिया गया । तथा विद्या का प्रत्यगात्मस्वरूप परब्रह्मरूप विशिष्टविषय भी कह दिया । इसी प्रकार इस उपनिषद् का संसार की आत्यन्तिक निवृत्ति और ब्रह्मप्राप्तिरूप प्रयोजन तथा इस प्रकार के प्रयोजन से इसका [साध्य-साधनरूप] सम्बन्ध भी बतला दिया । अतः उपर्युक्त अधिकारी, विषय, प्रयोजन और सम्बन्धवाली विद्या को करामलकवत् प्रकाशित करनेवाली होने से ये कठोपनिषद् की वल्लियाँ विशिष्ट अधिकारी, विषय, प्रयोजन और सम्बन्धवाली हैं, सो हम उनकी यथामति व्याख्या करते हैं ।
संस्कृत भाष्य पढ़ें
ॐ नमो भगवते वैवस्वताय मृत्यवे ब्रह्मविद्याचार्याय नचिकेतसे च ।
अथ काठकोपनिषद्वल्लीनां सुखार्थप्रबोधनार्थम् अल्पग्रन्था वृत्तिरारभ्यते ।
सदेर्धातोर्विशरणगत्यवसादनार्थस्योपनिपूर्वस्य उपनिषच्छब्दार्थ- क्विप्प्रत्ययान्तस्य निरुक्तिः रूपमुपनिषद् इति । उपनिषच्छब्देन च व्याचिख्यासितग्रन्थप्रतिपाद्यवेद्यवस्तुविषया विद्योच्यते । केन पुनरर्थयोगेन उपनिषच्छब्देन विद्योच्यत इत्युच्यते ।
ये मुमुक्षवो दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णाः सन्त उपनिषच्छब्दवाच्यां वक्ष्यमाणलक्षणां विद्याम् उपसद्योपगम्य तन्निष्ठतया निश्चयेन शीलयन्ति तेषामविद्यादेः संसारबीजस्य विशरणाद्धिंसनाद् विनाशनादित्यनेनार्थयोगेन विद्या उपनिषदित्युच्यते । तथा च वक्ष्यति—“निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते” (क० उ० १ । ३ । १५) इति ।
पूर्वोक्तविशेषणान्मुमुक्षून्वा परं ब्रह्म गमयतीति ब्रह्मगमयितृत्वेन योगाद्ब्रह्मविद्योपनिषत् । तथा च वक्ष्यति—“ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युः” (क० उ० २ । ३ । १८) इति ।
लोकादिर्ब्रह्मजज्ञो योऽग्निस्तद्विषयाया विद्याया द्वितीयेन वरेण प्रार्थ्यमानायाः स्वर्गलोकफलप्राप्तिहेतुत्वेन गर्भवासजन्मजराद्युपद्रववृन्दस्य लोकान्तरे पौनःपुन्येन प्रवृत्तस्यावसादयितृत्वेन शैथिल्यापादनेन धात्वर्थयोगादग्निविद्याप्युपनिषदित्युच्यते । तथा च वक्ष्यति—‘स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते’ (क० उ० १ । १ । १३) इत्यादि ।
ननु चोपनिषच्छब्देनाध्येतारो ग्रन्थमप्यभिलषन्ति । उपनिषदमधीमहेऽध्यापयाम इति च ।
एवं नैष दोषोऽविद्यादिसंसारहेतुविशरणादेः सदिधात्वर्थस्य ग्रन्थमात्रेऽसम्भवाद्विद्यायां च सम्भवात् । ग्रन्थस्यापि तादर्थ्येन तच्छब्दत्वोपपत्तेः, आयुर्वै घृतम् इत्यादिवत् । तस्माद्विद्यायां मुख्यया वृत्त्योपनिषच्छब्दो वर्तते ग्रन्थे तु भक्त्येति ।
एवमुपनिषन्निर्वचनेनैव विशिष्टोऽधिकारी विद्यायामुक्तः । विषयश्च विशिष्ट उक्तो विद्यायाः परं ब्रह्म प्रत्यगात्मभूतम् । प्रयोजनं चास्या उपनिषद आत्यन्तिकी संसारनिवृत्तिर्ब्रह्मप्राप्तिलक्षणा । सम्बन्धश्चैवंभूतप्रयोजनेनोक्तः । अतो यथोक्ताधिकारिविषयप्रयोजनसम्बन्धाया विद्यायाः करतलन्यस्तामलकवत् प्रकाशकत्वेन विशिष्टाधिकारिविषयप्रयोजनसम्बन्धा एता वल्लयो भवन्ति इत्यतस्ता यथाप्रतिभानं व्याचक्ष्महे ।