खण्ड 1 - मन्त्र 1

ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः ।
केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः ।
केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥ १ ॥

oṃ keneṣitaṃ patati preṣitaṃ manaḥ .
kena prāṇaḥ prathamaḥ praiti yuktaḥ .
keneṣitāṃ vācamimāṃ vadanti cakṣuḥ śrotraṃ ka u devo yunakti .. 1 ..


यह मन किसके द्वारा इच्छित और प्रेरित होकर अपने विषयों में गिरता है? किससे प्रयुक्त होकर प्रथम (प्रधान) प्राण चलता है? प्राणी किसके द्वारा इच्छा की हुई यह वाणी बोलते हैं? और कौन देव चक्षु तथा श्रोत्र को प्रेरित करता है? ॥ १ ॥

वाक्य-भाष्य

[मन आदि अचेतन पदार्थों की] प्रवृत्तिरूप लिंग से [उनकी प्रेरणा करनेवाले] किसी विशेष तत्त्व के विषय में प्रश्न करना ठीक ही है, क्योंकि रथ आदि [अचेतन पदार्थों] की प्रवृत्ति भी चेतन प्राणियों से अधिष्ठित होकर ही देखी है, उनसे अधिष्ठित हुए बिना नहीं देखी । मन आदि अचेतन पदार्थों की भी प्रवृत्ति देखी ही जाती है । यही उनके चेतन अधिष्ठाता के अस्तित्व का अनुमापक लिंग है । मन आदि इन्द्रियाँ नियम से
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प्रवृत्तिलिङ्गाद्विशेषार्थः प्रश्न उपपन्नः । रथादीनां हि चेतनावदधिष्ठितानां प्रवृत्तिर्दृष्टा न अनधिष्ठानाम् । मनआदीनां च अचेतनानां प्रवृत्तिर्दृश्यते । तद्धि लिङ्गं चेतनावतोऽधिष्ठातुरस्तित्वे । करणानि हि मनआदीनि नियमेन प्रवर्तन्ते ।

पद-भाष्य

केन इषितम्—किस कर्ता के द्वारा इच्छित अर्थात् अभिप्रेत हुआ मन अपने विषय की ओर जाता है—यहाँ ‘पतति’ क्रिया के साथ ‘स्वविषयं प्रति’ का सम्बन्ध (अन्वय) है । यहाँ आभीक्ष्ण्य और गत्यर्थक१ ‘इष्’ धातु सम्भव न होने के कारण यह इच्छार्थक ‘इष्’ धातु का ही [इषितम्] रूप है—ऐसा जाना जाता है । [‘इष्टम्’ के स्थान में ‘इषितम्’] यह इट्प्रयोग छान्दस (वैदिक)२ है । उस प्रपूर्वक ‘इष्’ धातु का ही प्रेरणा-अर्थ में
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केन इषितं केन कर्त्रा इषितम् इष्टमभिप्रेतं सद् मनः पतति गच्छति स्वविषयं प्रतीति सम्बध्यते इषेराभीक्ष्ण्यार्थस्य गत्यर्थस्य चेहासम्भवादिच्छार्थस्यैवैतद्रूपमिति गम्यते । इषितमिति इट्प्रयोगस्तुच्छान्दसः । तस्यैव प्रपूर्वस्य नियोगार्थे प्रेषितमित्येतत् ।

वाक्य-भाष्य

प्रवृत्त हो रही हैं । उनकी प्रवृत्ति बिना किसी चेतन अधिष्ठाता के बन नहीं सकती । इस प्रकार सामान्य चेतन का ज्ञान होने पर भी उसके विशेष रूप का ज्ञान न होने के कारण यह विशेष-विषयक प्रश्न उचित ही है ।

केन इषितम्—किससे इच्छा किया हुआ अर्थात् किसकी इच्छामात्र से मन अपने विषयों की ओर गिरता अर्थात् जाता है? यानी वह किसकी इच्छा से अपने विषय में नियमानुसार व्यापार करता है? जिससे मनन करते हैं वह विज्ञान-निमित्तक अन्तःकरण मन है । यहाँ ‘किसके द्वारा प्रेषित हुआ-सा’—ऐसा उपमापरक अर्थ लेना चाहिये ।

[ १ ]: इष् धातु के अर्थ आभीक्ष्ण्य (बारम्बार होना) गति और इच्छा हैं ।

[ २ ]: व्याकरण का यह सिद्धान्त है कि ‘छन्दसि दृष्टानुविधि: ’ वेद में जो प्रयोग जैसे देखे गये हैं वहाँ के लिये उनका वैसा ही विधान माना गया है ।

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तन्नासति चेतनावत्यधिष्ठातरि उपपद्यते । तद्विशेषस्य चानधिगमाच्चेतनावत्सामान्ये चाधिगते विशेषार्थः प्रश्न उपपद्यते ।

केनेषितं केनेष्टं कस्येच्छामात्रेण मनः पतति गच्छति स्वविषये नियमेन व्याप्रियत इत्यर्थः । मनुतेऽनेनेति विज्ञाननिमित्तमन्तःकरणं मनः प्रेषितम् इवेत्युपमार्थः । न त्विषित-

पद-भाष्य

‘प्रेषितम्’ रूप हुआ है । यदि यहाँ केवल ‘प्रेषितम्’ इतना ही कहा होता तो प्रेषण करनेवाले और उसके प्रेषण-प्रकार के सम्बन्ध में ऐसी शंका हो सकती थी कि किस प्रेषकविशेष के द्वारा और किस प्रकार प्रेषण किया हुआ? अतः यहाँ ‘इषितम्’ इस विशेषण के रहने से ये दोनों शंकाएँ निवृत्त हो जाती हैं, क्योंकि ‘इससे किसी की इच्छामात्र से प्रेषित हुआ’ यह विशेष अर्थ हो जाता है ।

शंका—यदि यही अर्थ अभिमत था तो ‘केनेषितम्’ इतने ही से सिद्ध हो सकने के कारण ‘प्रेषितम्’ ऐसा और नहीं कहना चाहिये था । इसके अतिरिक्त शब्दों की अधिकता से अर्थ की अधिकता होनी उचित है, इसलिये ‘इच्छा’ कर्म अथवा वाणी इनमें से किसके द्वारा प्रेषित, इस प्रकार प्रेषकविशेष का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक होगा ।

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तत्र प्रेषितमित्येवोक्ते प्रेषयितृप्रेषणविशेषविषयाकाङ्क्षा स्यात्— केन प्रेषयितृविशेषेण, कीदृशं वा प्रेषणमिति । इषितमिति तु विशेषणे सति तदुभयं निवर्तते, कस्येच्छामात्रेण प्रेषितमित्यर्थविशेषनिर्धारणात् ।

यद्येषोऽर्थोऽभिप्रेतः स्यात्, मन्त्रार्थ- केनेषितमित्येतावतैव मीमांसा सिद्धत्वात्प्रेषितमिति न वक्तव्यम् । अपि च शब्दाधिक्यादर्थाधिक्यं युक्तमिति इच्छया कर्मणा वाचा वा केन प्रेषितमित्यर्थविशेषोऽवगन्तुं युक्तः ।

वाक्य-भाष्य

‘इषित’ और ‘प्रेषित’ शब्दों के मुख्य अर्थ यहाँ के लिये सम्भव नहीं हैं, क्योंकि आत्मा मन आदि को विषयों की ओर इस प्रकार नहीं भेजता जैसे गुरु
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प्रेषितशब्दयोरर्थाविह सम्भवतः । न हि शिष्यानिव मनआदीनि विषयेभ्यः प्रेषयत्यात्मा । विविक्त-

पद-भाष्य

समाधान—नहीं, प्रश्न की सामर्थ्य से यह बात प्रतीत नहीं होती; क्योंकि इससे यह निश्चय होता है कि जो पुरुष देहादिसंघातरूप अनित्य कर्म और कार्य से विरक्त हो गया है और इनसे पृथक् कूटस्थ नित्य वस्तु को जानने की इच्छा करनेवाला है वही यह बात पूछ रहा है । अन्यथा इच्छा, वाक् और कर्म के द्वारा तो इस देहादिसंघात का प्रेरकत्व प्रसिद्ध ही है [अर्थात् इच्छा, वाणी और कर्म के द्वारा यह देहादिसंघात मन को प्रेरित किया करता है— इस बात को तो सभी जानते हैं] । अतः यह प्रश्न निरर्थक ही हो जाता ।

शंका—किंतु इस प्रकार भी ‘प्रेषित’ शब्द का अर्थ तो प्रदर्शित हुआ ही नहीं ।

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न, प्रश्नसामर्थ्यात्; देहादिसंघातादनित्यात्कर्मकार्याद्विरक्तः, अतोऽन्यत्कूटस्थं नित्यं वस्तु बुभुत्समानः पृच्छतीति सामर्थ्यादुपपद्यते । इतरथा इच्छावाक्कर्मभिर्देहादिसंघातस्य प्रेरयितृत्वं प्रसिद्धमिति प्रश्नोऽनर्थक एव स्यात् ।

एवमपि प्रेषितशब्दस्यार्थो न प्रदर्शित एव ।

वाक्य-भाष्य

तु शिष्यों को । वह तो सबसे विलक्षण और नित्य-चित्स्वरूप होने के कारण नित्य-चिकित्सा के अधिष्ठाता [चकोर पक्षी]-के समान उनकी प्रवृत्ति में केवल निमित्तमात्र है ।
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नित्यचित्स्वरूपतया निमित्तमात्रं प्रवृत्तौ नित्यचिकित्साधिष्ठातृवत् ।

पद-भाष्य

समाधान—नहीं, यह प्रश्न किसी संशयालु का है इसीसे ‘प्रेषित’ शब्द का अर्थविशेष उपपन्न हो सकता है [अर्थात् जिसे ऐसा संदेह है कि] यह प्रेरकभाव सर्वप्रसिद्ध भूत और इन्द्रियों के संघातरूप देह में है, अथवा उस संघात से भिन्न किसी स्वतन्त्र वस्तु में ही केवल इच्छामात्र से मन आदि की प्रेरकता है? इस प्रकार इस अभिप्राय को प्रदर्शित करने के लिये ही ‘किसके द्वारा इच्छित और प्रेषित किया हुआ मन [अपने विषय की ओर] जाता है’ ऐसे दो विशेषण ठीक हो सकते हैं ।

यदि कहो कि यह बात तो प्रसिद्ध ही है कि मन स्वतन्त्र है और वह स्वयं ही अपने विषयों की ओर जाता है; फिर उसके विषय में यह प्रश्न कैसे बन सकता है? तो इसके उत्तर में हमारा कहना है कि यदि मन प्रवृत्ति

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न; संशयवतोऽयं प्रश्न इति प्रेषितशब्दस्यार्थविशेष उपपद्यते । किं यथाप्रसिद्धमेव कार्यकारणसंघातस्य प्रेषयितृत्वम्, किं वा संघातव्यतिरिक्तस्य स्वतन्त्रस्य इच्छामात्रेणैव मनआदिप्रेषयितृत्वम्, इत्यस्यार्थस्य प्रदर्शनार्थं केनेषितं पतति प्रेषितं मन इति विशेषणद्वयमुपपद्यते ।

ननु स्वतन्त्रं मनः स्वविषये मनःप्रभृतीनां स्वयं पततीति पारतन्त्र्य- प्रसिद्धम्; तत्र कथं प्रदर्शनम् प्रश्न उपपद्यत इति, उच्यते यदि स्वतन्त्रं मनः प्रवृत्ति

वाक्य-भाष्य

यहाँ प्रकरणवश ‘प्राण’ शब्द से नासिका में रहनेवाला वायु समझना चाहिये । चलन-क्रिया प्राण-निमित्तक होने से प्राण को प्रधान माना गया है ।
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प्राण इति नासिकाभवः; प्रकरणात् । प्रथमत्वं प्रचलनक्रियायाः प्राणनिमित्तत्वात्स्वतो

पद-भाष्य

निवृत्ति में स्वतन्त्र होता तो सभी को अनिष्टचिन्तन होना ही नहीं चाहिये था । किंतु मन जान-बूझकर भी अनर्थ-चिन्तन करता है और रोके जाने पर भी अत्यन्त दुःखमय कार्य में भी प्रवृत्त हो ही जाता है । अतः ‘केनेषितम्’ इत्यादि प्रश्न उचित ही है ।

किसके द्वारा नियुक्त यानी प्रेरित हुआ प्राण अपने व्यापार में प्रवृत्त होता है? ‘प्रथम’ यह प्राण का विशेषण हो सकता है, क्योंकि समस्त इन्द्रियों की प्रवृत्तियाँ प्राणपूर्वक ही होती हैं ।

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निवृत्तिविषये स्यात्, तर्हि सर्वस्य अनिष्टचिन्तनं न स्यात् । अनर्थं च जानन्सङ्कल्पयति । अभ्यग्रदुःखे च कार्ये वार्यमाणमपि प्रवर्तत एव मनः । तस्माद्युक्त एव केनेषितमित्यादिप्रश्नः ।

केन प्राणो युक्तो नियुक्तः प्रेरितः सन् प्रैति गच्छति स्वव्यापारं प्रति । प्रथम इति प्राणविशेषणं स्यात्, तत्पूर्वकत्वात् सर्वेन्द्रियप्रवृत्तीनाम् ।

वाक्य-भाष्य

इन्द्रियों की स्वतः प्रवृत्ति तो केवल विषयों का प्रकाशनमात्र ही है । मन आदि में चलन-क्रिया तो प्राण की ही है; इसीलिये प्राण की प्रधानता है । वह प्राण किससे युक्त अर्थात् प्रेरित होकर गमन करता यानी चलता है । वाणी का भाषण भी किस निमित्त से होता है? प्राणियों के नेत्र और श्रोत्रों को प्रेरित करनेवाला कौन देव है? अर्थात् जो चेतन-तत्त्व इन्द्रियों का अधिष्ठाता है वह किन विशेषणों से युक्त है? ॥ १ ॥
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विषयावभासमात्रं करणानां प्रवृत्तिः । चलिक्रिया तु प्राणस्यैव मनआदिषु । तस्मात्प्राथम्यं प्राणस्य । प्रैति गच्छति युक्तः प्रयुक्त इत्येतत् । वाचो वदनं किं निमित्तं प्राणिनां चक्षुः श्रोत्रयोश्च को देवः प्रयोक्ता । करणानाम् अधिष्ठाता चेतनावान्यः स किं विशेषण इत्यर्थः ॥ १ ॥

पद-भाष्य

लौकिक पुरुष किसके द्वारा इच्छित यह शब्दरूपा वाणी बोलते हैं? तथा कौन देव—द्योतनवान् (प्रकाशमान) व्यक्ति चक्षु एवं श्रोत्रेन्द्रिय को अपने-अपने व्यापार में नियुक्त—प्रेरित करता है ॥ १ ॥
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केन इषितां वाचम् इमां शब्दलक्षणां वदन्ति लौकिकाः । तथा चक्षुः श्रोत्रं च स्वे स्वे विषये क उ देवः द्योतनवान् युनक्ति नियुङ्क्ते प्रेरयति ॥ १ ॥

पद-भाष्य

इस प्रकार पूछनेवाले योग्य शिष्य से गुरु ने कहा—तू जो पूछता है कि मन आदि इन्द्रियसमूह को अपने विषयों की ओर प्रेरित करनेवाला कौन देव है और वह उन्हें किस प्रकार प्रेरित करता है, सो सुन—
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एवं पृष्टवते योग्यायाह गुरुः ।

शृणु यत् त्वं पृच्छसि, मनआदिकरणजातस्य को देवः स्वविषयं प्रति प्रेरयिता कथं वा प्रेरयतीति ।