śrotrasya śrotraṃ manaso mano yadvāco ha vācaṃ sa u prāṇasya prāṇaścakṣuṣaścakṣuratimucya dhīrāḥ pretyāsmāllokādamṛtā bhavanti .. 2 ..
पद-भाष्य
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उसका भी श्रोत्र वह है जिसके विषय में तूने पूछा है कि ‘चक्षु और श्रोत्र को कौन देव नियुक्त करता है? ’
शंका—प्रश्न के उत्तर में तो यह बतलाना चाहिये था कि इस प्रकार के गुणोंवाला व्यक्ति श्रोत्रादि को प्रेरित करता है; उसमें यह कहना कि वह श्रोत्र का श्रोत्र है— ठीक उत्तर नहीं है ।
समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि उस प्रेरक का और किसी प्रकार कोई विशेष रूप नहीं जाना जा सकता । यदि दाँती आदि का प्रयोग करनेवाले के समान
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असावेवंविशिष्टः श्रोत्रादीनि नियुङ्क्त इति वक्तव्ये, नन्वेतदनुरूपं प्रतिवचनं श्रोत्रस्य श्रोत्रमिति ।
नैष दोषः, तस्यान्यथा विशेषानवगमात् । यदि हि श्रोत्रादिव्यापारव्यतिरेक्तेन स्वव्यापारेण विशिष्टः श्रोत्रादिनियोक्ता अवगम्येत दात्रादिप्रयोक्तृवत्,
वाक्य-भाष्य
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कैसे? [सो इस प्रकार कि] जिससे प्राणी सुनते हैं उसे ‘श्रोत्र’ कहते हैं । उसका जो शब्द को प्रकाशित करना है वह ‘श्रोत्रत्व’ है । श्रोत्र का जो शब्द के उपलब्धारूप से प्रकाशकत्व है वह स्वतः नहीं है; क्योंकि वह अचेतन है और आत्मा चेतनरूप है ।
श्रोत्र का जो उपलब्धारूप से अवभासकत्व है वह आत्मनिमित्तक होने से आत्मा को ‘श्रोत्र का श्रोत्र’ ऐसा कहा जाता है, जैसे क्षत्रिय
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कथम्? शृणोत्यनेनेति श्रोत्रम्; तस्य शब्दावभासकत्वं श्रोत्रत्वम् । शब्दोपलब्धृरूपतयावभासकत्वं न स्वतः, श्रोत्रस्याचिद्रूपत्वात्, आत्मनश्च चिद्रूपत्वात् ।
यच्छ्रोत्रस्योपलब्धृत्वेनावभासकत्वं तदात्मनिमित्तत्वाच्छ्रोत्रस्य श्रोत्रमित्युच्यते; यथा क्षत्रस्य
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परार्थ (दूसरे के साधनरूप) हुआ करते हैं; इसीसे कोई श्रोत्रादि का प्रयोक्ता अवश्य है—यह जाना जाता है । अतः यह ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादि उत्तर ठीक ही है ।
शंका—किन्तु इस ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादि पद का यहाँ क्या अर्थ अभिप्रेत है? क्योंकि जिस तरह एक प्रकाश को दूसरे प्रकाश का प्रयोजन नहीं होता उसी तरह एक श्रोत्र को दूसरे श्रोत्र से तो कोई प्रयोजन है ही नहीं ।
समाधान—यह भी कोई दोष नहीं है । यहाँ इस पद का अर्थ इस प्रकार है—श्रोत्र अपने विषय को अभिव्यक्त करने में समर्थ है—यह देखा ही जाता है । किन्तु श्रोत्र का वह अपने विषय को अभिव्यक्त
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अवगम्यते श्रोत्रादीनां प्रयोक्ता तस्मादनुरूपमेवेदं प्रतिवचनं श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्यादि ।
कः पुनरत्र पदार्थः श्रोत्रस्य आत्मनः श्रोत्रमित्यादेः? न श्रोत्रादि- ह्यत्र श्रोत्रस्य प्रकाशकत्वम् श्रोत्रान्तरेणार्थः, यथा प्रकाशस्य प्रकाशान्तरेण ।
नैष दोषः । अयमत्र पदार्थः— श्रोत्रं तावत्स्वविषयव्यञ्जनसमर्थं दृष्टम् । तत्तु स्वविषयव्यञ्जनसामर्थ्यं श्रोत्रस्य चैतन्ये ह्यात्मज्योतिषि नित्येऽसंहते सर्वान्तरे
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चेतनों का चेतन है ’ इत्यादि । श्रोत्रादि इन्द्रियवर्ग ही सबका आत्मभूत चेतन है—यह बात [लोक में] प्रसिद्ध है । उस भ्रान्ति का इस पद से निराकरण किया जाता है । अतः श्रोत्रादि का भी श्रोत्रादि अर्थात् उनकी सामर्थ्य का निमित्तभूत ऐसा कोई पदार्थ है जो आत्मवेत्ताओं की बुद्धि का विषय सबसे अन्तरतम, कूटस्थ, अजन्मा, अजर, अमर और अभयरूप है—इस प्रकार यह उत्तर और शब्दार्थ ठीक ही है ।
इसी प्रकार वह मन का—अन्तःकरण का मन है, क्योंकि चिज्ज्योति के प्रकाश के बिना अन्तःकरण अपने विषय संकल्प और अध्यवसाय (निश्चय) आदि में समर्थ नहीं हो सकता । अतः वह मन का भी मन है; यहाँ बुद्धि और मन को एक मानकर मन का निर्देश किया गया है ।
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चेतनश्चेतनानाम्’ (२ । २ । १३) इति । श्रोत्राद्येव सर्वस्यात्मभूतं चेतनमिति प्रसिद्धम्; तदिह निवर्त्यते । अस्ति किमपि विद्वद्बुद्धिगम्यं सर्वान्तरतमं कूटस्थमजमजरममृतमभयं श्रोत्रादेरपि श्रोत्रादि तत्सामर्थ्यनिमित्तम् इति प्रतिवचनं शब्दार्थश्चोपपद्यत एव ।
तथा मनसः अन्तःकरणस्य मनः । न ह्यन्तःकरणम् अन्तरेण चैतन्यज्योतिषो दीधितिं स्वविषयसङ्कल्पाध्यवसायादिसमर्थं स्यात् । तस्मान्मनसोऽपि मन इति । इह बुद्धिमनसी एकीकृत्य निर्देशो मनस इति ।
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यद्वाचो ह वाचम्—इस वाक्य के ‘यत्’ शब्द का ‘यस्मात्’ अर्थ (हेत्वर्थ) में ‘क्योंकि वह श्रोत्र का श्रोत्र है, क्योंकि वह मन का मन है’ इस प्रकार श्रोत्रादि सभी पदों से सम्बन्ध है । ‘वाचो ह वाचम्’ इस पदसमूह में ‘वाचम्’ पद की द्वितीया विभक्ति प्रथमा विभक्ति के रूप में परिणत कर ली जाती है, जैसा कि ‘प्राणस्य प्राणः’ में देखा जाता है ।
यदि कहो कि ‘वाचो ह वाचम्’ इस प्रयोग के अनुरोध से ‘प्राणस्य प्राणम्’ इस प्रकार द्वितीया ही क्यों नहीं कर ली जाती? तो ऐसा कहना उचित नहीं क्योंकि बहुतों का अनुरोध मानना ही युक्तिसंगत है । अतः ‘स उ प्राणस्य प्राणः’ इस पदसमूह के [स और प्राणः] दो शब्दों के अनुरोध से ‘वाचम्’ इस शब्द को ही ‘वाक्’ इतना कहना चाहिये । ऐसा करने से ही बहुतों का अनुरोध युक्त (स्वीकार) किया समझा जायगा ।
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यद्वाचो ह वाचम्; यच्छब्दो यस्मादर्थे श्रोत्रादिभिः सर्वैः सम्बध्यते—यस्माच्छ्रोत्रस्य श्रोत्रम्, यस्मान्मनसो मन इत्येवम् ।
वाचो ह वाचमिति द्वितीया प्रथमात्वेन विपरिणम्यते, प्राणस्य प्राण इति दर्शनात् । वाचो ह वाचमित्येतदनुरोधेन प्राणस्य प्राणमिति कस्माद्द्वितीयैव न क्रियते? न; बहूनामनुरोधस्य युक्तत्वात् । वाचमित्यस्य वागित्येतावद्वक्तव्यं स उ प्राणस्य प्राण इति शब्दद्वयानुरोधेन; एवं हि बहूनामनुरोधो युक्तः कृतः स्यात् ।
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वाचो ह वाचं प्राणस्य प्राण इति विभक्तिद्वयं सर्वत्रैव द्रष्टव्यम् ।
कथम्? पृष्टत्वात्स्वरूपनिर्देशः; प्रथमयैव च निर्देशः । तस्य च
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ज्ञेयत्वात्कर्मत्वमिति द्वितीया ।
अतो वाचो ह वाचं प्राणस्य प्राण इत्यस्मात्सर्वत्रैव विभक्तिद्वयम् ।
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शंका—परन्तु यहाँ श्रोत्रादि इन्द्रियों के प्रसंग में घ्राण को ही ग्रहण करना युक्तियुक्त है, प्राण को नहीं ।
समाधान—यह ठीक है । किन्तु श्रुति, प्राण को ग्रहण करने से ही घ्राण का भी ग्रहण किया मानती है । इस प्रकरण को यही अर्थ बतलाना अभीष्ट है कि जिसके लिये सम्पूर्ण इन्द्रियसमूह की प्रवृत्ति है वही ब्रह्म है ।
तथा [वह ब्रह्म] चक्षु का चक्षु है । रूप को प्रकाशित करनेवाले चक्षु-इन्द्रिय में जो रूप को ग्रहण करने की सामर्थ्य है वह आत्मचैतन्य से अधिष्ठित होने के कारण ही है । इसलिये वह चक्षु का चक्षु है ।
प्रश्न—कर्ता को अपने पूछे हुए पदार्थ को जानने की इच्छा हुआ ही करती है, इसलिये, तथा ‘अमृता भवन्ति’ (अमर हो जाते हैं) ऐसी
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श्रोत्रादीन्द्रियप्रस्तावे घ्राणस्यैव ग्रहणं युक्तं न तु प्राणस्य ।
सत्यमेवम्; प्राणग्रहणेनैव तु घ्राणस्य ग्रहणं कृतमेव मन्यते श्रुतिः । सर्वस्यैव करणकलापस्य यदर्थप्रयुक्ता प्रवृत्तिः; तद्ब्रह्मेति प्रकरणार्थो विवक्षितः ।
तथा चक्षुषश्चक्षू रूपप्रकाशकस्य चक्षुषो यद्रूपग्रहणसामर्थ्यं तदात्मचैतन्याधिष्ठितस्यैव । अतः चक्षुषश्चक्षुः ।
प्रष्टुः पृष्टस्यार्थस्य ज्ञातुमिष्टआत्मविदो- त्वात् श्रोत्रादेः श्रोत्रादिऽमृतत्व- लक्षणं यथोक्तं निरूपणम् ब्रह्म ‘ज्ञात्वा’ इत्यध्याह्रियते; अमृता भवन्ति इति
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संसार से छूटकर—उससे मुक्त होकर, धीर—बुद्धिमान् लोग इस लोक से जाकर अर्थात् इस शरीर से पृथक् होकर दूसरे शरीर का अनुसन्धान न करने के कारण अन्य कोई प्रयोजन न रहने से अमृत हो जाते हैं ।
अज्ञान के रहने तक ही कर्म दूसरे शरीर की खोज किया करते हैं । आत्मज्ञान हो जाने पर तो सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भक
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संसारान्मोक्षणं कृत्वा धीरा धीमन्तः प्रेत्यास्माल्लोकाच्छरीरात् प्रेत्य वियुज्यान्यस्मिन्नप्रतिसन्धीयमाने निर्निमित्तत्वादमृता भवन्ति ।
सति ह्यज्ञाने कर्माणि शरीरान्तरं प्रतिसन्दधते । आत्मावबोधे तु सर्वकर्मारम्भनिमित्ता-
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अर्थात् पुत्र, मित्र, कलत्र और बन्धुओं में अहंता-ममता के व्यवहाररूप इस लोक से विलग होकर यानी सम्पूर्ण एषणाओं से मुक्त होकर अमृत—अमरणधर्मा हो जाते हैं । जो लोग श्रोत्रादि में आत्मभाव का त्याग करते हैं वे धीर यानी बुद्धिमान् होते हैं । क्योंकि विशिष्ट बुद्धिमत्त्व के बिना श्रोत्रादि में आत्मभाव का त्याग नहीं किया जा सकता ।
‘कर्म से, प्रजा से अथवा धन से नहीं, किन्हीं-किन्हीं ने केवल त्याग से ही अमरत्व लाभ किया है’ ‘स्वयम्भू ने इन्द्रियों को बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है, इसलिये जीव बाह्य वस्तुओं को ही देखता है, अपने अन्तरात्मा को नहीं देखता । कोई बुद्धिमान् पुरुष अमरत्व की इच्छा से इन्द्रियों को रोककर अपने प्रत्यगात्मा को देखता है’ ‘जिस समय इसके हृदय की कामनाएँ छूट जाती हैं……इस अवस्था में वह ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है’ इत्यादि श्रुतियों से भी यही सिद्ध होता है ।
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व्यावृत्य अस्मात् लोकात् पुत्रमित्रकलत्रबन्धुषु ममाहंभावसंव्यवहारलक्षणात्, त्यक्तसर्वैषणा भूत्वेत्यर्थः अमृता अमरणधर्माणो भवन्ति ।
‘न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः’ (कैवल्य० १ । २) ‘पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात् पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्’ (क० उ० २ । १ । १) ‘यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः……… अत्र ब्रह्म समश्नुते’ (क० उ० २ । ३ । १४) इत्यादिश्रुतिभ्यः ।