खण्ड 1 - मन्त्र 2

श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणश्चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ २ ॥

śrotrasya śrotraṃ manaso mano yadvāco ha vācaṃ sa u prāṇasya prāṇaścakṣuṣaścakṣuratimucya dhīrāḥ pretyāsmāllokādamṛtā bhavanti .. 2 ..


जो श्रोत्र का श्रोत्र, मन का मन और वाणी का भी वाणी है वही प्राण का प्राण और चक्षु का चक्षु है [ऐसा जानकर] धीर पुरुष संसार से मुक्त होकर इस लोक से जाकर अमर हो जाते हैं ॥ २ ॥

पद-भाष्य

श्रोत्रस्य श्रोत्रम्—जिससे श्रवण करते हैं वह ‘श्रोत्र’ है अर्थात् शब्द के श्रवण में साधन यानी शब्द का अभिव्यंजक श्रोत्रेन्द्रिय है ।
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श्रोत्रस्य श्रोत्रं शृणोत्यनेनेति श्रोत्रम्, शब्दस्य श्रवणं प्रति करणं शब्दाभिव्यञ्जकं श्रोत्र मिन्द्रियम्, तस्य श्रोत्रं स यस्त्वया पृष्टः ‘चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति’ इति ।

पद-भाष्य

उसका भी श्रोत्र वह है जिसके विषय में तूने पूछा है कि ‘चक्षु और श्रोत्र को कौन देव नियुक्त करता है? ’

शंका—प्रश्न के उत्तर में तो यह बतलाना चाहिये था कि इस प्रकार के गुणोंवाला व्यक्ति श्रोत्रादि को प्रेरित करता है; उसमें यह कहना कि वह श्रोत्र का श्रोत्र है— ठीक उत्तर नहीं है ।

समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि उस प्रेरक का और किसी प्रकार कोई विशेष रूप नहीं जाना जा सकता । यदि दाँती आदि का प्रयोग करनेवाले के समान

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असावेवंविशिष्टः श्रोत्रादीनि नियुङ्क्त इति वक्तव्ये, नन्वेतदनुरूपं प्रतिवचनं श्रोत्रस्य श्रोत्रमिति ।

नैष दोषः, तस्यान्यथा विशेषानवगमात् । यदि हि श्रोत्रादिव्यापारव्यतिरेक्तेन स्वव्यापारेण विशिष्टः श्रोत्रादिनियोक्ता अवगम्येत दात्रादिप्रयोक्तृवत्,

वाक्य-भाष्य

‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादि उत्तर देना निर्विशेष आत्मा का निमित्तत्व बतलाने के लिये है । इस ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादिरूप से उत्तर देने का यही तात्पर्य है कि विक्रिया आदि समस्त विशेषों से रहित आत्मा का मन आदि की प्रवृत्ति में कारणत्व है यही इससे जाना जाता है, क्योंकि इस श्रुति के अक्षर भी इसी अर्थ में अनुगत हैं ।
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श्रोत्रस्य श्रोत्रम् इत्यादि प्रतिवचनं निर्विशेषस्य निमित्तत्वार्थम् । विक्रियादिविशेषरहितस्यात्मनो मनआदिप्रवृत्तौ निमित्तत्वम् इत्येतच्छ्रोत्रस्य श्रोत्रमित्यादिप्रतिवचनस्यार्थः; अनुगमात् । तदनुगतानि ह्यत्रास्मिन्नर्थेऽक्षराणि ।

पद-भाष्य

श्रोत्रादि व्यापार से अतिरिक्त किसी अपने व्यापार से विशिष्ट कोई श्रोत्रादि का नियोक्ता ज्ञात होता तो यह उत्तर अनुचित होता । किंतु यहाँ खेत काटनेवाले के समान कोई श्रोत्रादि का स्वव्यापारविशिष्ट प्रयोक्ता ज्ञात नहीं है । अवयव-सहयोग से उत्पन्न हुए श्रोत्रादि का जो चिदाभास की फलव्याप्ति का लिंगरूप आलोचना, संकल्प एवं निश्चय आदिरूप व्यापार है उसी से यह जाना जाता है कि गृह आदि के समान जिसके प्रयोजन से श्रोत्रादि कारण-कलाप प्रवृत्त हो रहा है वह श्रोत्रादि से असंहत (पृथक्) कोई तत्त्व अवश्य है । संहत पदार्थ
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तदेदमननुरूपं प्रतिवचनं स्यात् । न त्विह श्रोत्रादीनां प्रयोक्ता स्वव्यापारविशिष्टो लवित्रादिवदधिगम्यते । श्रोत्रादीनामेव तु संहतानां व्यापारेणालोचनसङ्कल्पाध्यवसायलक्षणेन फलावसानलिङ्गेनावगम्यते—अस्ति हि श्रोत्रादिभिरसंहतः, यत्प्रयोजनप्रयुक्तः श्रोत्रादिकलापः गृहादिवदिति । संहतानां परार्थत्वाद्

वाक्य-भाष्य

कैसे? [सो इस प्रकार कि] जिससे प्राणी सुनते हैं उसे ‘श्रोत्र’ कहते हैं । उसका जो शब्द को प्रकाशित करना है वह ‘श्रोत्रत्व’ है । श्रोत्र का जो शब्द के उपलब्धारूप से प्रकाशकत्व है वह स्वतः नहीं है; क्योंकि वह अचेतन है और आत्मा चेतनरूप है ।

श्रोत्र का जो उपलब्धारूप से अवभासकत्व है वह आत्मनिमित्तक होने से आत्मा को ‘श्रोत्र का श्रोत्र’ ऐसा कहा जाता है, जैसे क्षत्रिय

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कथम्? शृणोत्यनेनेति श्रोत्रम्; तस्य शब्दावभासकत्वं श्रोत्रत्वम् । शब्दोपलब्धृरूपतयावभासकत्वं न स्वतः, श्रोत्रस्याचिद्रूपत्वात्, आत्मनश्च चिद्रूपत्वात् ।

यच्छ्रोत्रस्योपलब्धृत्वेनावभासकत्वं तदात्मनिमित्तत्वाच्छ्रोत्रस्य श्रोत्रमित्युच्यते; यथा क्षत्रस्य

पद-भाष्य

परार्थ (दूसरे के साधनरूप) हुआ करते हैं; इसीसे कोई श्रोत्रादि का प्रयोक्ता अवश्य है—यह जाना जाता है । अतः यह ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादि उत्तर ठीक ही है ।

शंका—किन्तु इस ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादि पद का यहाँ क्या अर्थ अभिप्रेत है? क्योंकि जिस तरह एक प्रकाश को दूसरे प्रकाश का प्रयोजन नहीं होता उसी तरह एक श्रोत्र को दूसरे श्रोत्र से तो कोई प्रयोजन है ही नहीं ।

समाधान—यह भी कोई दोष नहीं है । यहाँ इस पद का अर्थ इस प्रकार है—श्रोत्र अपने विषय को अभिव्यक्त करने में समर्थ है—यह देखा ही जाता है । किन्तु श्रोत्र का वह अपने विषय को अभिव्यक्त

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अवगम्यते श्रोत्रादीनां प्रयोक्ता तस्मादनुरूपमेवेदं प्रतिवचनं श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्यादि ।

कः पुनरत्र पदार्थः श्रोत्रस्य आत्मनः श्रोत्रमित्यादेः? न श्रोत्रादि- ह्यत्र श्रोत्रस्य प्रकाशकत्वम् श्रोत्रान्तरेणार्थः, यथा प्रकाशस्य प्रकाशान्तरेण ।

नैष दोषः । अयमत्र पदार्थः— श्रोत्रं तावत्स्वविषयव्यञ्जनसमर्थं दृष्टम् । तत्तु स्वविषयव्यञ्जनसामर्थ्यं श्रोत्रस्य चैतन्ये ह्यात्मज्योतिषि नित्येऽसंहते सर्वान्तरे

वाक्य-भाष्य

जाति का [नियामक कर्म] क्षत्र कहलाता है; अथवा जैसे [उष्ण] जल की उष्णता अग्नि के कारण होती है; इसलिये उस जलानेवाले जल का भी जलानेवाला अग्नि कहा जाता है; और अग्नि के संयोग से जल भी अग्नि कहा जाता है, उसी प्रकार [प्रमाता आत्मा में] जिनके संयोग से अनित्य उपलब्धृत्व है वे श्रोत्रादि करण कहलाते हैं ।
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क्षत्रं यथा वोदकस्यौष्ण्यमग्निनिमित्तमिति दग्धुरप्युदकस्य दग्धाग्निरुच्यते; उदकमपि ह्यग्निसंयोगादग्निरुच्यते, तद्वद् अनित्यं यत्संयोगादुपलब्धृत्वं तत्करणं श्रोत्रादि । उदकस्येव

पद-भाष्य

करने का सामर्थ्य नित्य असंहत, सर्वान्तर चेतन आत्मज्योति के रहने पर ही रह सकता है, न रहने पर नहीं रह सकता । अतः उसे ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादि कहना उचित ही है । ‘यह अपने ही प्रकाश से प्रकाशित है’ ‘उसके प्रकाश से ही यह सब प्रकाशित होता है’ ‘जिस तेज से प्रदीप्त हुआ सूर्य तपता है’ इत्यादि श्रुतियाँ भी इसी अर्थ की द्योतक हैं । तथा गीता में भी कहा है—‘जो तेज सूर्य में स्थित होकर सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है ।’ ‘हे भारत! इसी प्रकार सम्पूर्ण क्षेत्र को क्षेत्री प्रकाशित करता है ।’ कठोपनिषद् में भी कहा है—‘वह नित्यों का नित्य और
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सति भवति, न असति इति । अतः श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्याद्युपपद्यते । तथा च श्रुत्यन्तराणि— ‘आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते’ (बृ० उ० ४ । ३ । ६) ‘तस्य भासा सर्वमिदं विभाति’ (क० उ० २ । २ । १५, श्वे० उ० ६ । १४, मु० उ० २ । २ । १०) ‘येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः’ (तै० ब्रा० ३ । १२ । ९ । ७) इत्यादीनि । ‘यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्’ (गीता १५ । १२) ‘क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत’ (गीता १३ । ३३) इति च गीतासु । काठके च ‘नित्यो नित्यानां

वाक्य-भाष्य

जल के दाहकत्व के समान आत्मा में उपलब्धृत्व अनित्य ही है । जैसे अग्नि में नित्य उष्णता रहने के कारण वह दग्धा कहलाता है उसी प्रकार जिसमें नित्य उपलब्धृत्व रहता है वह नित्य उपलब्धिस्वरूप होने के कारण उपलब्धा कहा जाता है । श्रोत्रादि निमित्तों के होने पर जो आत्मा में श्रोतृत्वादि की उपलब्धि होती है वह अनित्य है और केवल आत्मा में वह नित्य है, अतः ‘श्रोत्रस्य
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दग्धृत्वमनित्यं हि तत्र तत् । यत्र तु नित्यमुपलब्धृत्वमग्नाविवौष्ण्यं स नित्योपलब्धिस्वरूपत्वाद्दग्धेवोपलब्धोच्यते । श्रोत्रादिषु श्रोतृत्वाद्युपलब्धिरनित्या नित्या चात्मन्यतः श्रोत्रस्य

पद-भाष्य

चेतनों का चेतन है ’ इत्यादि । श्रोत्रादि इन्द्रियवर्ग ही सबका आत्मभूत चेतन है—यह बात [लोक में] प्रसिद्ध है । उस भ्रान्ति का इस पद से निराकरण किया जाता है । अतः श्रोत्रादि का भी श्रोत्रादि अर्थात् उनकी सामर्थ्य का निमित्तभूत ऐसा कोई पदार्थ है जो आत्मवेत्ताओं की बुद्धि का विषय सबसे अन्तरतम, कूटस्थ, अजन्मा, अजर, अमर और अभयरूप है—इस प्रकार यह उत्तर और शब्दार्थ ठीक ही है ।

इसी प्रकार वह मन का—अन्तःकरण का मन है, क्योंकि चिज्ज्योति के प्रकाश के बिना अन्तःकरण अपने विषय संकल्प और अध्यवसाय (निश्चय) आदि में समर्थ नहीं हो सकता । अतः वह मन का भी मन है; यहाँ बुद्धि और मन को एक मानकर मन का निर्देश किया गया है ।

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चेतनश्चेतनानाम्’ (२ । २ । १३) इति । श्रोत्राद्येव सर्वस्यात्मभूतं चेतनमिति प्रसिद्धम्; तदिह निवर्त्यते । अस्ति किमपि विद्वद्बुद्धिगम्यं सर्वान्तरतमं कूटस्थमजमजरममृतमभयं श्रोत्रादेरपि श्रोत्रादि तत्सामर्थ्यनिमित्तम् इति प्रतिवचनं शब्दार्थश्चोपपद्यत एव ।

तथा मनसः अन्तःकरणस्य मनः । न ह्यन्तःकरणम् अन्तरेण चैतन्यज्योतिषो दीधितिं स्वविषयसङ्कल्पाध्यवसायादिसमर्थं स्यात् । तस्मान्मनसोऽपि मन इति । इह बुद्धिमनसी एकीकृत्य निर्देशो मनस इति ।

वाक्य-भाष्य

श्रोत्रम्’ इत्यादि अक्षरों के अर्थ के अनुगम से नित्योपलब्धिस्वरूप निर्विशेष आत्मा का मन आदि की प्रवृत्ति में कारण होना ठीक ही है । इसी प्रकार [जैसा कि ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ के विषय में कहा गया है] मन, वाक् और प्राणादि के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिये ।
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श्रोत्रमित्याद्यक्षराणामर्थानुगमाद् उपपद्यते निर्विशेषस्योपलब्धिस्वरूपस्यात्मनो मनआदिप्रवृत्तिनिमित्तत्वमिति । मनआदिष्वेवं यथोक्तम् ।

पद-भाष्य

यद्वाचो ह वाचम्—इस वाक्य के ‘यत्’ शब्द का ‘यस्मात्’ अर्थ (हेत्वर्थ) में ‘क्योंकि वह श्रोत्र का श्रोत्र है, क्योंकि वह मन का मन है’ इस प्रकार श्रोत्रादि सभी पदों से सम्बन्ध है । ‘वाचो ह वाचम्’ इस पदसमूह में ‘वाचम्’ पद की द्वितीया विभक्ति प्रथमा विभक्ति के रूप में परिणत कर ली जाती है, जैसा कि ‘प्राणस्य प्राणः’ में देखा जाता है ।

यदि कहो कि ‘वाचो ह वाचम्’ इस प्रयोग के अनुरोध से ‘प्राणस्य प्राणम्’ इस प्रकार द्वितीया ही क्यों नहीं कर ली जाती? तो ऐसा कहना उचित नहीं क्योंकि बहुतों का अनुरोध मानना ही युक्तिसंगत है । अतः ‘स उ प्राणस्य प्राणः’ इस पदसमूह के [स और प्राणः] दो शब्दों के अनुरोध से ‘वाचम्’ इस शब्द को ही ‘वाक्’ इतना कहना चाहिये । ऐसा करने से ही बहुतों का अनुरोध युक्त (स्वीकार) किया समझा जायगा ।

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यद्वाचो ह वाचम्; यच्छब्दो यस्मादर्थे श्रोत्रादिभिः सर्वैः सम्बध्यते—यस्माच्छ्रोत्रस्य श्रोत्रम्, यस्मान्मनसो मन इत्येवम् ।

वाचो ह वाचमिति द्वितीया प्रथमात्वेन विपरिणम्यते, प्राणस्य प्राण इति दर्शनात् । वाचो ह वाचमित्येतदनुरोधेन प्राणस्य प्राणमिति कस्माद्द्वितीयैव न क्रियते? न; बहूनामनुरोधस्य युक्तत्वात् । वाचमित्यस्य वागित्येतावद्वक्तव्यं स उ प्राणस्य प्राण इति शब्दद्वयानुरोधेन; एवं हि बहूनामनुरोधो युक्तः कृतः स्यात् ।

वाक्य-भाष्य

यहाँ ‘वाचो ह वाचम्’ तथा ‘प्राणस्य प्राणः’ इस प्रकार [पिछले पद में] सर्वत्र ही [प्रथमा और द्वितीया] दो विभक्ति समझनी चाहिये, क्यों? क्योंकि आत्माविषयक प्रश्न होने के कारण उसके स्वरूप का निर्देश किया गया है और निर्देश प्रथमा विभक्ति से ही किया जाता है; तथा आत्मा ही
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वाचो ह वाचं प्राणस्य प्राण इति विभक्तिद्वयं सर्वत्रैव द्रष्टव्यम् ।

कथम्? पृष्टत्वात्स्वरूपनिर्देशः; प्रथमयैव च निर्देशः । तस्य च

पद-भाष्य

इसके सिवा, पूछी हुई वस्तु का निर्देश प्रथमा विभक्ति से ही करना उचित है । [अभिप्राय यह कि] जिसके विषय में तूने पूछा है वह प्राण का यानी प्राण नामक वृत्ति-विशेष का प्राण है । उसके कारण ही प्राण का प्राणनसामर्थ्य है, क्योंकि आत्मा से अनधिष्ठित प्राण का प्राणन सम्भव नहीं है, जैसा कि ‘यदि यह आनन्दस्वरूप आकाश न होता तो कौन जीवित रहता और कौन श्वासोच्छ्वास करता’ ‘यह प्राण को ऊपर ले जाता है तथा अपान को नीचे की ओर छोड़ता है’ इत्यादि श्रुतियों से सिद्ध होता है । यहाँ (इस उपनिषद् में) भी यह कहेंगे ही कि जिसके द्वारा प्राण प्राणन करता है उसी को तू ब्रह्म जान ।
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पृष्टं च वस्तु प्रथमयैव निर्देष्टुं युक्तम् । स यस्त्वया पृष्टः प्राणस्य प्राणाख्यवृत्तिविशेषस्य प्राणः तत्कृतं हि प्राणस्य प्राणनसामर्थ्यम् । न ह्यात्मनानधिष्ठितस्य प्राणनमुपपद्यते, ‘को ह्येवान्यात्कः प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्’ (तै० उ० २ । ७ । १) ‘ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति’ (क० उ० २ । २ । ३) इत्यादिश्रुतिभ्यः । इहापि च वक्ष्यते येन प्राणः प्रणीयते तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि इति ।

वाक्य-भाष्य

ज्ञेय है, इसलिये उसमें कर्मत्व रहने के कारण द्वितीया भी ठीक है । अतः ‘वाचो ह वाचम्’ तथा ‘प्राणस्य प्राणः’ इस कथन के अनुसार सभी जगह दो विभक्ति समझनी चाहिये । [अर्थात् सभी पदों में ये दोनों विभक्तियाँ रह सकती हैं ।]
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ज्ञेयत्वात्कर्मत्वमिति द्वितीया ।

अतो वाचो ह वाचं प्राणस्य प्राण इत्यस्मात्सर्वत्रैव विभक्तिद्वयम् ।

पद-भाष्य

शंका—परन्तु यहाँ श्रोत्रादि इन्द्रियों के प्रसंग में घ्राण को ही ग्रहण करना युक्तियुक्त है, प्राण को नहीं ।

समाधान—यह ठीक है । किन्तु श्रुति, प्राण को ग्रहण करने से ही घ्राण का भी ग्रहण किया मानती है । इस प्रकरण को यही अर्थ बतलाना अभीष्ट है कि जिसके लिये सम्पूर्ण इन्द्रियसमूह की प्रवृत्ति है वही ब्रह्म है ।

तथा [वह ब्रह्म] चक्षु का चक्षु है । रूप को प्रकाशित करनेवाले चक्षु-इन्द्रिय में जो रूप को ग्रहण करने की सामर्थ्य है वह आत्मचैतन्य से अधिष्ठित होने के कारण ही है । इसलिये वह चक्षु का चक्षु है ।

प्रश्न—कर्ता को अपने पूछे हुए पदार्थ को जानने की इच्छा हुआ ही करती है, इसलिये, तथा ‘अमृता भवन्ति’ (अमर हो जाते हैं) ऐसी

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श्रोत्रादीन्द्रियप्रस्तावे घ्राणस्यैव ग्रहणं युक्तं न तु प्राणस्य ।

सत्यमेवम्; प्राणग्रहणेनैव तु घ्राणस्य ग्रहणं कृतमेव मन्यते श्रुतिः । सर्वस्यैव करणकलापस्य यदर्थप्रयुक्ता प्रवृत्तिः; तद्ब्रह्मेति प्रकरणार्थो विवक्षितः ।

तथा चक्षुषश्चक्षू रूपप्रकाशकस्य चक्षुषो यद्रूपग्रहणसामर्थ्यं तदात्मचैतन्याधिष्ठितस्यैव । अतः चक्षुषश्चक्षुः ।

प्रष्टुः पृष्टस्यार्थस्य ज्ञातुमिष्टआत्मविदो- त्वात् श्रोत्रादेः श्रोत्रादिऽमृतत्व- लक्षणं यथोक्तं निरूपणम् ब्रह्म ‘ज्ञात्वा’ इत्यध्याह्रियते; अमृता भवन्ति इति

वाक्य-भाष्य

यह जो श्रोत्रादि की उपलब्धि का निमित्तभूत तथा ‘श्रोत्र का श्रोत्र’ इत्यादि लक्षणोंवाला नित्योपलब्धिस्वरूप निर्विशेष आत्मतत्त्व है उसे जानकर, अज्ञान के कारण आरोपित बुद्धि आदि लक्षणोंवाले
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यदेतच्छ्रोत्राद्युपलब्धिनिमित्तं आत्मज्ञानेन श्रोत्रस्य श्रोत्रअमृतत्व- मित्यादिलक्षणं नित्योनिरूपणम् पलब्धिस्वरूपं निर्विशेषमात्मतत्त्वं तद्बुद्ध्वातिमुच्यानवबोधनिमित्ताध्यारोपिताद् बुद्ध्यादिलक्षणात्

पद-भाष्य

फलश्रुति होने के कारण भी उपर्युक्त श्रोत्रादि के श्रोत्रादिरूप ब्रह्म को जानकर— इस प्रकार यहाँ ‘ज्ञात्वा’ क्रिया का अध्याहार किया जाता है, क्योंकि अमरत्व की प्राप्ति ज्ञान से ही होती है, जैसा कि ‘[ब्रह्म को] जानकर मुक्त हो जाता है’ इस उक्ति की सामर्थ्य से सिद्ध होता है । जीव श्रोत्रादि करण-कलाप को त्यागकर—श्रोत्रादि में ही आत्मभाव करके उनकी उपाधि से युक्त होकर जन्मता, मरता और संसार को प्राप्त होता है । अतः श्रोत्रादि का श्रोत्रादि रूप ब्रह्म ही आत्मा है ऐसा जानकर और अतिमोचन करके अर्थात् श्रोत्रादि में आत्मभाव को त्यागकर धीर पुरुष ‘प्रेत्य’
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फलश्रुतेश्च । ज्ञानाद्ध्यमृतत्वं प्राप्यते । ज्ञात्वा विमुच्यते इति सामर्थ्यात् । श्रोत्रादिकरणकलापमुज्झित्वा— श्रोत्रादौ ह्यात्मभावं कृत्वा, तदुपाधिः सन्, तदात्मना जायते म्रियते संसरति च । अतः श्रोत्रादेः श्रोत्रादिलक्षणं ब्रह्मात्मेति विदित्वा, अतिमुच्य श्रोत्राद्यात्मभावं परित्यज्य—ये श्रोत्राद्यात्मभावं परित्यजन्ति, ते धीरा धीमन्तः; न हि विशिष्टधीमत्त्वमन्तरेण श्रोत्राद्यात्मभावः शक्यः परित्यक्तुम्—प्रेत्य

वाक्य-भाष्य

संसार से छूटकर—उससे मुक्त होकर, धीर—बुद्धिमान् लोग इस लोक से जाकर अर्थात् इस शरीर से पृथक् होकर दूसरे शरीर का अनुसन्धान न करने के कारण अन्य कोई प्रयोजन न रहने से अमृत हो जाते हैं ।

अज्ञान के रहने तक ही कर्म दूसरे शरीर की खोज किया करते हैं । आत्मज्ञान हो जाने पर तो सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भक

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संसारान्मोक्षणं कृत्वा धीरा धीमन्तः प्रेत्यास्माल्लोकाच्छरीरात् प्रेत्य वियुज्यान्यस्मिन्नप्रतिसन्धीयमाने निर्निमित्तत्वादमृता भवन्ति ।

सति ह्यज्ञाने कर्माणि शरीरान्तरं प्रतिसन्दधते । आत्मावबोधे तु सर्वकर्मारम्भनिमित्ता-

पद-भाष्य

अर्थात् पुत्र, मित्र, कलत्र और बन्धुओं में अहंता-ममता के व्यवहाररूप इस लोक से विलग होकर यानी सम्पूर्ण एषणाओं से मुक्त होकर अमृत—अमरणधर्मा हो जाते हैं । जो लोग श्रोत्रादि में आत्मभाव का त्याग करते हैं वे धीर यानी बुद्धिमान् होते हैं । क्योंकि विशिष्ट बुद्धिमत्त्व के बिना श्रोत्रादि में आत्मभाव का त्याग नहीं किया जा सकता ।

‘कर्म से, प्रजा से अथवा धन से नहीं, किन्हीं-किन्हीं ने केवल त्याग से ही अमरत्व लाभ किया है’ ‘स्वयम्भू ने इन्द्रियों को बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है, इसलिये जीव बाह्य वस्तुओं को ही देखता है, अपने अन्तरात्मा को नहीं देखता । कोई बुद्धिमान् पुरुष अमरत्व की इच्छा से इन्द्रियों को रोककर अपने प्रत्यगात्मा को देखता है’ ‘जिस समय इसके हृदय की कामनाएँ छूट जाती हैं……इस अवस्था में वह ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है’ इत्यादि श्रुतियों से भी यही सिद्ध होता है ।

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व्यावृत्य अस्मात् लोकात् पुत्रमित्रकलत्रबन्धुषु ममाहंभावसंव्यवहारलक्षणात्, त्यक्तसर्वैषणा भूत्वेत्यर्थः अमृता अमरणधर्माणो भवन्ति ।

‘न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः’ (कैवल्य० १ । २) ‘पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात् पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्’ (क० उ० २ । १ । १) ‘यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः……… अत्र ब्रह्म समश्नुते’ (क० उ० २ । ३ । १४) इत्यादिश्रुतिभ्यः ।

वाक्य-भाष्य

अज्ञान से विपरीत ज्ञानरूप अग्निद्वारा कर्मों के दग्ध हो जाने पर फिर प्रारब्ध निःशेष हो जाने के कारण वे अमृत ही हो जाते हैं । [अनादि संसारपरम्परा से ‘मैं शरीर हूँ’ ऐसे अध्यास के कारण] ‘पुनः-पुनः शरीरप्राप्तिरूप परम्परा का विच्छेद न हो’ ऐसा अनुसन्धान करते रहने के कारण अपने ऊपर आरोपित
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ज्ञानविपरीतविद्याग्निविप्लुष्टत्वात् कर्मणामनारम्भेऽमृता एव भवन्ति । शरीरादिसन्तानाविच्छेदप्रतिसन्धानाद्यपेक्षयाध्यारोपित-

पद-भाष्य

अथवा एषणात्याग तो ‘अतिमुच्य’ इस पद से ही सिद्ध हो जाता है, अतः ‘अस्माल्लोकात्प्रेत्य’ का यह भाव समझना चाहिये कि इस शरीर से अलग होकर यानी मरकर [अमर हो जाते हैं] ॥ २ ॥
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अथवा अतिमुच्येत्यनेनैवैषणात्यागस्य सिद्धत्वाद् अस्माल्लोकात् प्रेत्य अस्माच्छरीरादपेत्य मृत्वेत्यर्थः ॥ २ ॥

क्योंकि ब्रह्म श्रोत्रादि का भी श्रोत्रादिरूप है, इसलिये—
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यस्माच्छ्रोत्रादेरपि श्रोत्राद्यात्मभूतं ब्रह्म अतः ।