इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥ ३ ॥
na tatra cakṣurgacchati na vāggacchati no mano na vidmo na vijānīmo yathaitadanuśiṣyādanyadeva tadviditādatho aviditādadhi .
iti śuśruma pūrveṣāṃ ye nastadvyācacakṣire .. 3 ..
पद-भाष्य
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वाक्य-भाष्य
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ही पहुँचती है । जिस समय वाणी से उच्चारण किया हुआ शब्द अपने वाच्य को प्रकाशित करता है उस समय ही, अपने वाच्य तक वाणी पहुँचती है— ऐसा कहा जाता है । किन्तु ब्रह्म तो शब्द और उसका व्यवहार करनेवाले इन्द्रिय का आत्मा है । अतः वाणी वहाँ उसी प्रकार नहीं पहुँच सकती, जैसे कि अग्नि दाहक और प्रकाशक होने पर भी अपने को न जलाता है और न प्रकाशित ही करता है ।
और न मन ही [वहाँ तक जाता है] । मन भी अन्य पदार्थों का संकल्प और निश्चय करनेवाला होता हुआ भी अपना संकल्प या निश्चय नहीं करता है, क्योंकि ब्रह्म
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वाचा हि शब्द उच्चार्यमाणोऽभिधेयं प्रकाशयति यदा, तदाभिधेयं प्रति वागगच्छतीत्युच्यते । तस्य च शब्दस्य तन्निर्वर्तकस्य च करणस्यात्मा ब्रह्म । अतो न वागगच्छति यथाग्निर्दाहकः प्रकाशकश्चापि सन् न ह्यात्मानं प्रकाशयति दहति वा, तद्वत् ।
नो मनः मनश्चान्यस्य सङ्कल्पयितृ अध्यवसायितृ च सद् नात्मानं सङ्कल्पयत्यध्यवस्यति च, तस्यापि ब्रह्मात्मेति । इन्द्रिय
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उसका भी आत्मा है । इन्द्रिय और मन से ही वस्तु का ज्ञान हुआ करता है; उनका अविषय होने के कारण हम यह नहीं जानते कि वह ब्रह्म ऐसा है ।
अतः जिस प्रकार से इस ब्रह्म का अनुशासन—शिष्य के प्रति उपदेश किया जाय—यह हम नहीं जानते ऐसा इसका अभिप्राय है । जो वस्तु इन्द्रियों का विषय होती है उसी का जाति, गुण और क्रियारूप विशेषणों द्वारा दूसरे को उपदेश किया जा सकता है । किन्तु ब्रह्म उन जाति आदि विशेषणोंवाला नहीं है । अतः शिष्यों को उपदेश द्वारा उसकी प्रतीति कराना बहुत
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मनोभ्यां हि वस्तुनो विज्ञानम् । तदगोचरत्वान्न विद्मः तद्ब्रह्म ईदृशमिति ।
अतो न विजानीमो यथा येन प्रकारेण एतद् ब्रह्म अनुशिष्याद् उपदिशेच्छिष्यायेत्यभिप्रायः । यद्धि करणगोचरं तदन्यस्मै उपदेष्टुं शक्यं जातिगुणक्रियाविशेषणैः । न तज्जात्यादिविशेषणवद्ब्रह्म तस्माद्विषमं शिष्यानुपदेशेन
वाक्य-भाष्य
श्रोत्रादि के आत्मस्वरूप उस आत्मतत्त्व के विषय में चक्षु आदि इन्द्रियाँ ज्ञान उत्पन्न नहीं कर सकतीं, क्योंकि यहाँ वाक् और चक्षु सभी इन्द्रियों का उपलक्षण करने के लिये हैं ।
[इसपर सन्देह होता है—] तो फिर सुखादि के समान उसका अन्तःकरण से ग्रहण हो सकता होगा? [इसपर कहते हैं—] मन भी उस तक नहीं पहुँचता । वह सुखादि के समान मन का भी विषय नहीं है, क्योंकि वह इन्द्रियों का अविषय है ।
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द्यात्मभूते चक्षुरादीनि वाक्चक्षुषोः सर्वेन्द्रियोपलक्षणार्थत्वान्न विज्ञानमुत्पादयन्ति ।
सुखादिवत्तर्हि गृह्येतान्तःकरणेनात आह—नो मनः । न सुखादिवन्मनसो विषयस्तत्; इन्द्रियाविषयत्वात् ।
पद-भाष्य
कठिन है—इस प्रकार श्रुति उपदेश और उसके अर्थ का ग्रहण करने में अधिक प्रयत्न करने की आवश्यकता दिखलाती है ।
[पूर्वोक्त श्रुति के] ‘न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात्’ इस वाक्य से उपदेश के प्रकार का अत्यन्त निषेध प्राप्त होने पर उसका यह अपवाद कहा जाता है । यह ठीक है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से परमात्मा की प्रतीति नहीं करायी जा सकती, किन्तु शास्त्र से तो
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प्रत्याययितुमिति उपदेशे तदर्थग्रहणे च यत्नातिशयकर्तव्यतां दर्शयति ।
‘न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात्’ इति अत्यन्तम् एवोपदेशप्रकारप्रत्याख्याने प्राप्ते तदपवादोऽयमुच्यते । सत्यमेवं प्रत्यक्षादिभिः प्रमाणैर्न परः प्रत्याययितुं शक्यः; आगमेन तु
वाक्य-भाष्य
यह ब्रह्म मन आदि इन्द्रियसमूह का जिस प्रकार अनुशासन करता है अर्थात् जिस प्रकार उनकी प्रवृत्ति का कारण होता है—इन्द्रियों का अविषय होने के कारण—इस सम्बन्ध में अपने अन्तःकरण द्वारा हम कुछ नहीं जानते अर्थात् कुछ नहीं समझते ।
अथवा शिष्य के यह कहने पर कि ‘श्रोत्रादि के श्रोत्रादिरूप ब्रह्म को विशेषरूप से दिखलाओ’ आचार्य कहते हैं कि ‘उसे दिखाया नहीं जा सकता ।’ क्यों? ‘क्योंकि उस तक नेत्र नहीं पहुँच सकते’ इत्यादि प्रकार से सबका आशय पूर्ववत् समझना चाहिये । यहाँ ‘यथैतदनुशिष्यात्’ इस वाक्य का विशेष तात्पर्य है; अर्थात् जिस किसी अन्य विधि से कोई अन्य गुरु अपने
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न विद्मो न विजानीमोऽन्तःकरणेन यथैतद्ब्रह्म मनआदिकरणजातमनुशिष्याद् अनुशासनं कुर्यात्प्रवृत्तिनिमित्तं भवेत्तथाविषयत्वान्न विद्मो न विजानीमः ।
अथवा श्रोत्रादीनां श्रोत्रादिलक्षणं ब्रह्मविशेषेण दर्शयेत्युक्त आचार्य आह न शक्यते दर्शयितुम् । कस्मात्? न तत्र चक्षुर्गच्छति इत्यादि पूर्ववत्सर्वम् । अत्र तु विशेषो यथैतदनुशिष्यादिति । यथैतदनुशिष्यात् प्रतिपादयेद्
पद-भाष्य
उसकी प्रतीति करायी ही जा सकती है—अतः उसके उपदेश के लिये शास्त्र प्रमाण देते हैं—
‘वह विदित से अन्य ही है और अविदित से भी परे है ।’ यहाँ जिस प्रकरणप्राप्त श्रोत्रादि के श्रोत्रादि और उनके अविषय ब्रह्म का उल्लेख किया गया है ।
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शक्यत एव प्रत्याययितुमिति तदुपदेशार्थमागममाह—
अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधीति । अन्यदेव पृथगेव तद् यत्प्रकृतं श्रोत्रादीनां श्रोत्रादीत्युक्तमविषयश्च तेषाम्;
वाक्य-भाष्य
शिष्यों को इसका अनुशासन—प्रतिपादन कर सकता है [वह हम नहीं जानते] ।
परन्तु मुझे तो किसी भी तरह ब्रह्म का बोध करा ही दीजिये—शिष्य के ऐसा कहने पर आचार्य कहते हैं—‘वह ब्रह्म जाने हुए से अन्य है तथा बिना जाने से भी परे है’—जाने और न जाने हुए से भिन्न होना यही उपदेश की परम्परा है । इसके सिवा जो कोई भी उसको जाननेवाला है वह स्वयं वही है, क्योंकि ब्रह्म सर्वात्मक है । अतः सबके आत्मारूप उस ज्ञाता के सिवा अन्य ज्ञाता का अभाव होने के कारण वह, जितना कुछ जाना जाता है उससे भिन्न है; जैसा कि मन्त्रवर्ण भी कहता है—‘वह सम्पूर्ण ज्ञेय को जानता है तथा उसका ज्ञाता और कोई नहीं है’ तथा वाजसनेय श्रुति में भी कहा है— ‘अरे! उस विज्ञाता को किससे जाने? ’ इसके सिवा व्यक्त को ही विदित कहा गया है, उससे भिन्न [यानी अव्यक्त]
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अन्योऽपि शिष्यानितोऽन्येन विधिनेत्यभिप्रायः ।
सर्वथापि ब्रह्म बोधयेत्युक्त आचार्य आह, अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधीत्यागमं विदिताविदिताभ्यामन्यत्वम् । यो हि ज्ञाता स एव सः, सर्वात्मकत्वात् । अतः सर्वात्मनो ज्ञातुर्ज्ञात्रन्तराभावाद्विदितादन्यत्वम् । ‘स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता’ (श्वे० उ० ३ । १९) इति च मन्त्रवर्णात् । ‘विज्ञातारमरे केन विजानीयात्’ (बृ० उ० २ । ४ । १४) इति च वाजसनेयके । अपि च व्यक्तमेव
पद-भाष्य
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वाक्य-भाष्य
है यही इस [अन्यदेव विदितात्]- का तात्पर्य है जो विदित अर्थात् व्यक्त होता है वह दूसरे का विषय होने के कारण अल्प और सविरोध होता है ऐसा होने से अनित्य होता है, अतः अनेक होने के कारण अशुद्ध भी होता है; इसलिये सिद्ध हुआ कि ब्रह्म उससे भिन्न प्रकार का ही है ।
पूर्व०—तो फिर ब्रह्म अज्ञात हुआ?
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि उसे विज्ञान (ज्ञात होने)-की अपेक्षा नहीं है । जो वस्तु अज्ञात होती है उसके विज्ञान की अपेक्षा हुआ करती है । अज्ञात वस्तु को जानने के लिये ही सम्पूर्ण लोकों की प्रवृत्ति है; किन्तु ब्रह्म को अपने विज्ञान की अपेक्षा नहीं है; क्यों? क्योंकि वह विज्ञानस्वरूप ही है । जिसका जो स्वरूप होता है वह उसी की दूसरे से अपेक्षा नहीं रखता और अपने से तो अपेक्षा हुआ ही नहीं करती, क्योंकि अपना आप तो सिद्ध
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विदितं तस्मादन्यदित्यभिप्रायः । यद्विदितं व्यक्तं तदन्यविषयत्वादल्पं सविरोधं ततोऽनित्यमत एवानेकत्वादशुद्धमत एव तद्विलक्षणं ब्रह्मेति सिद्धम् ।
तर्ह्यविदितम् ।
न; विज्ञानानपेक्षत्वात् । यद्ध्यब्रह्मणः विदितं तद्विज्ञास्वीयप्रकाशते नापेक्षम् । अविदित अन्यानपेक्षत्वम् विज्ञानाय हि लोकप्रवृत्तिः । इदं तु विज्ञानानपेक्षम् । कस्मात्? विज्ञानस्वरूपत्वात् । न हि यस्य यत्स्वरूपं तत्तेनान्यतोऽपेक्ष्यते । न च स्वत एवापेक्षा अनपेक्षमेव सिद्ध
पद-भाष्य
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वाक्य-भाष्य
(प्राप्त) होने के कारण अपेक्षा से रहित ही है । दीपक अपने स्वरूप की अभिव्यक्ति के लिये अपने से अथवा किसी अन्य से प्रकाशान्तर की अपेक्षा नहीं रखता । इस प्रकार जो अपेक्षा नहीं रखता वह स्वतःसिद्ध ही है । दीपक प्रकाशस्वरूप ही है; अतः अपने स्वरूप की अभिव्यक्ति के लिये यदि वह प्रकाशान्तर की अपेक्षा करे तो व्यर्थ ही होगा, क्योंकि प्रकाश में कोई विशेषता नहीं हुआ करती । एक दीपक के स्वरूप की अभिव्यक्ति में किसी अन्य दीपक का प्रकाश सार्थक नहीं होता । इसी प्रकार आत्मा से भिन्न ऐसा कोई विज्ञान नहीं है जो उसके स्वरूप का ज्ञान कराने के लिये अपेक्षित हो ।
यदि कहो कि इससे विरोध प्रतीत होता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि [आत्मा] इससे भिन्न है ।
पूर्व०—तुमने जो कहा कि आत्मा विज्ञानस्वरूप है, इसलिये उसके स्वरूप को जानने में किसी अन्य विज्ञान की अपेक्षा नहीं है—सो ठीक नहीं,
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त्वात् । प्रदीपः स्वरूपाभिव्यक्तौ न प्रकाशान्तरमन्यतोऽपेक्षते स्वतो वा । यद्ध्यनपेक्षं तत्स्वत एव सिद्धम् । प्रकाशात्मत्वात् प्रदीपस्यापेक्षितोऽप्यनर्थकः स्यात्, प्रकाशे विशेषाभावात् । न हि प्रदीपस्य स्वरूपाभिव्यक्तौ प्रदीपप्रकाशोऽर्थवान् । न चैवमात्मनोऽन्यत्र विज्ञानमस्ति येन स्वरूपविज्ञानेऽप्यपेक्ष्येत ।
विरोध इति चेन्नान्यत्वात् ।
स्वरूपविज्ञाने विज्ञानस्वरूपत्वाद् विज्ञानान्तरं नापेक्षत इत्येतदसत् । दृश्यते हि विपरीतज्ञानमात्मनि
पद-भाष्य
क्योंकि जो वस्तु जिससे अधि—ऊपर होती है वह उससे अन्य हुआ करती है—यह प्रसिद्ध ही है ।
जो वस्तु विदित होती है वह अल्प, मरणशील एवं दुःखमयी होती है, इसलिये वह हेय (त्याज्य) है । ब्रह्म उस विदित वस्तु से भिन्न है—
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यद्धि यस्मादधि उपरि भवति, तत्तस्मादन्यदिति प्रसिद्धम् ।
यद्विदितं तदल्पं मर्त्यं ब्रह्मण दुःखात्मकं चेति हेयम् । आत्मभिन्नत्व- तस्माद्विदितादन्यद्ब्रह्म प्रतिपादनम् इत्युक्ते त्वहेयत्वमुक्तं
वाक्य-भाष्य
क्योंकि आत्मा में भी विपरीत ज्ञान और सम्यक् ज्ञान होता देखा ही जाता है; जैसा कि ‘मैं आत्मा को नहीं जानता’ इत्यादि कथन से तथा ‘तू वह (ब्रह्म) है’ ‘आत्मा को ही जाना’ ‘उस इस आत्मा को निश्चयपूर्वक जानकर’ आदि श्रुतियों से सिद्ध होता है । श्रुतियों में आत्मा के ज्ञान के लिये सर्वत्र ही विज्ञानान्तर की अपेक्षा देखी जाती है । इसलिये [उपर्युक्त कथन का] प्रत्यक्ष ही श्रुति से विरोध है ।
सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं । क्यों? क्योंकि बुद्धि आदि कार्य और करण के संघात में जो अभिमान है उसकी परम्परा का विच्छेद न होना ही जिसका लक्षण है, नित्य चित्स्वरूप आत्मा ही जिसका आन्तरिक सार है और जिसमें अनित्य विज्ञान का अवभास हुआ करता है वह अविवेकात्मक, चिदाभास-प्रधान तथा चक्षु आदि करणोंवाला आत्मा (जीवात्मा) [शुद्ध चेतन से] भिन्न ही है । बौद्ध प्रतीतियों का
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सम्यग्ज्ञानं च; न जानाम्यात्मानमिति । श्रुतेश्च ‘तत्त्वमसि’ (छा० उ० ६ ।८—१६) ‘आत्मानमेवावेत्’(बृ० उ० १ ।४ ।१०) ‘एतं वै तमात्मानं विदित्वा’ (बृ० उ० ३ । ५ । १) इति च । सर्वत्र श्रुतिष्वात्मविज्ञाने विज्ञानान्तरापेक्षत्वं दृश्यते । तस्मात् प्रत्यक्षश्रुतिविरोध इति चेत् ।
न; कस्मात्? अन्यो हि स आत्मा बुद्ध्यादिकार्यकरणसङ्घाताभिमानसन्तानाविच्छेदलक्षणोऽविवेकात्मको बुद्ध्यवभासप्रधानश्चक्षुरादिकरणो नित्यचित्स्वरूपात्मान्तःसारो यत्रानित्यं विज्ञानम् अवभासते । बौद्धप्रत्ययानाम्
पद-भाष्य
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वाक्य-भाष्य
आविर्भाव-तिरोभाव उसका धर्म है; अतः अपने उस धर्म के कारण वह उससे पृथक् दिखलायी भी देता है ।
[किन्तु वह शुद्ध चेतन तो] ‘आत्मा सर्वान्तर है’ ऐसा बतलानेवाली श्रुति के अनुसार अन्तःकरण यानी मन का भी मन है । उस अन्तर्गत, नित्यविज्ञानस्वरूप, आकाश के समान अविचल और अन्तर्गर्भभूत चिदात्मा से बाह्य और विलक्षण अनित्य विज्ञानवान् विज्ञानात्मा ही, आविर्भाव-तिरोभाव धर्मवाले विज्ञानाभासरूप अनित्य प्रत्ययों के कारण लौकिक पुरुषों द्वारा आत्मा सुखी-दुःखी है—ऐसा माना जाता है, जैसे ज्वालाओं के कारण अग्नि ।
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आविर्भावतिरोभावधर्मकत्त्वात्तद्धर्मतयैव विलक्षणमपि चावभासते ।
अन्तःकरणस्य मनसोऽपि मनोऽन्तर्गतत्वात्सर्वान्तरश्रुतेः । अन्तर्गतेन नित्यविज्ञानस्वरूपेण आकाशवदप्रचलितात्मनान्तर्गर्भभूतेन बाह्यो बुद्ध्यात्मा तद्विलक्षणः, अर्चिर्भिरिवाग्निः प्रत्ययैराविर्भावतिरोभावधर्मकैर्विज्ञानाभासरूपैरनित्यविज्ञान आत्मा सुखीदुःखीत्यभ्युपगतो लौकिकैः । अतोऽन्यो नित्यविज्ञानस्वरूपादात्मनः ।
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वाक्य-भाष्य
अतः वह नित्यविज्ञानस्वरूप आत्मा से भिन्न है । उसी में विज्ञान की अपेक्षा तथा विपरीत ज्ञानत्व की सम्भावना है—नित्यविज्ञानस्वरूप चिदात्मा में नहीं ।
पूर्व०—[ऐसा मानने से तो] ‘तत्त्वमसि’ (वह ब्रह्म तू है) यह उपदेश भी नहीं बन सकता और न ‘अपने आत्मा को ही जाना [कि मैं ब्रह्म हूँ]’ इत्यादि वाक्य ही सार्थक हो सकते हैं—क्योंकि ब्रह्म तो नित्यबोधस्वरूप है । सूर्य दूसरे से प्रकाशित कभी नहीं हो सकता । इसलिये आत्मा के विषय में ज्ञान का उपदेश करना व्यर्थ ही होगा ।
सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि वह उपदेश लोगों द्वारा किये हुए अध्यारोप की निवृत्ति के लिये है । लोगों ने आत्मतत्त्व के अज्ञानवश उस नित्यविज्ञानस्वरूप सर्वात्मा पर बुद्धि आदि अनित्य धर्मों का आरोप किया हुआ है । उसकी निवृत्ति के लिये ही
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तत्र हि विज्ञानापेक्षा विपरीतज्ञानत्वं चोपपद्यते न पुनर्नित्यविज्ञाने ।
तत्त्वमसीति बोधोपदेशो न उपपद्यत इति चेत् । ‘आत्मानमेवावेत्’ (बृ० उ० १ । ४ । १०) इत्येवमादीनि च नित्यबोधात्मकत्वात् । न ह्यादित्योऽन्येन प्रकाश्यतेऽतस्तदर्थबोधोपदेशः अनर्थक इति चेत् ।
न; लोकाध्यारोपापोहार्थत्वात् ।
बोधोपदेशस्य सर्वात्मनि हि नित्यअध्यास- विज्ञाने बुद्ध्याद्यनित्यनिरासार्थत्वम् धर्मा लोकैरध्यारोपिता आत्माविवेकात्तस्तदपो-
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वाक्य-भाष्य
उस ज्ञानस्वरूप के ज्ञान का उपदेश किया जाता है ।
तथा उस बोधस्वरूप में बोध और अबोध समीचीन भी हैं, क्योंकि जैसे अग्नि के कारण जल में उष्णता रहती है तथा सूर्य के कारण दिन और रात हुआ करते हैं, वैसे ही उनका कारण भी अन्य (आरोपित धर्म) ही है । उष्णता और प्रकाश—ये अग्नि और सूर्य के तो नित्यधर्म हैं, किन्तु लोक में अन्यत्र अपने भाव और अभाव के कारण वे अनित्यवत् उपचरित होते हैं; जैसे— ‘अग्नि जला देगा’ ‘सूर्य प्रकाशित करेगा’ इत्यादि वाक्यों में; वैसे ही [आत्मा के विषय में समझना चाहिये] इस प्रकार लोक का जो सुख-दुःख एवं बन्ध-मोक्षरूप अध्यारोप है उसकी अपेक्षा से ही ‘तत्त्वमसि’ ‘आत्मानमेवावेत्’ इत्यादि श्रुतियाँ आत्मज्ञान के उपदेश से केवल अध्यारोप की निवृत्ति के लिये ही हैं ।
जिस प्रकार ‘यह सूर्य अपनेआपको प्रकाशित करता है’ [इस वाक्य से प्रकाशस्वरूप सूर्य में प्रकाशकर्तृत्व का उल्लेख किया जाता है] उसी प्रकार नित्यबोधस्वरूप आत्मा में भी ज्ञान और अज्ञान का कर्तृत्व माना गया है ।
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हार्थो बोधोपदेशो बोधात्मनः ।
तत्र च बोधाबोधौ समञ्जसौ, अन्यनिमित्तत्वादुदक इवौष्ण्यम् अग्निनिमित्तम्, रात्र्यहनी इवादित्यनिमित्ते । लोके नित्यावौष्ण्यप्रकाशावग्न्यादित्ययोरन्यत्रभावाभावयोर्निमित्तत्वादनित्याविव उपचर्येते । धक्ष्यत्यग्निः प्रकाशयिष्यति सवितेति तद्वत् । एवं च सुखदुःखबन्धमोक्षाद्यध्यारोपो लोकस्य तदपेक्ष्य तत्त्वमस्यात्मानमेवावेदित्यात्मावबोधोपदेशेन श्रुतयः केवलमध्यारोपापोहार्थाः ।
यथा सवितासौ प्रकाशयति ब्रह्मणो विदिता- आत्मानम् इति विदिताभ्या- तद्वत्, बोधाबोधमन्यत्वम् कर्तृत्वं च नित्यबोधात्मनि । तस्मात्
पद-भाष्य
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वाक्य-भाष्य
इसलिये वह अविदित (अज्ञात) से भी अन्य है । यहाँ ‘अधि’ शब्द ‘अन्य’ अर्थ में है अथवा जो जिससे अधि (ऊपर) होता है वह उससे अन्य ही हुआ करता है, क्योंकि उस शब्द की शक्ति से यही बोध होता है; जिस प्रकार सेवक आदि से ऊपर राजा । अव्यक्त ही अविदित है, उससे यह आत्मा पृथक् है—यही इसका तात्पर्य है ।
विदित और अविदित यानी व्यक्त और अव्यक्त ही क्रमशः कार्य तथा कारणभाव से माने गये हैं उनसे भिन्न वह ब्रह्म है जो सम्पूर्ण विशेषणों से रहित विज्ञानस्वरूप है—यह इस समस्त वाक्यसमुदाय का तात्पर्य है । अतः आत्मस्वरूप होने के कारण वह त्याज्य या ग्राह्य भी नहीं है । अन्य वस्तु ही किसी अन्य की त्याज्य या ग्राह्य हुआ करती है; स्वयं आप ही अपनी कोई भी वस्तु हेय या उपादेय नहीं होती । आत्मा ही ब्रह्म है और सबका अन्तर्यामी होने से वह किसी इन्द्रिय का विषय भी नहीं है । इसलिये वह किसी अन्य का भी हेय या उपादेय नहीं है । न इसके सिवा आत्मा से भिन्न कोई और
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अन्यदविदितात् । अधिशब्दश्च अन्यार्थे । यद्वा यद्धि यस्याधि तत्ततोऽन्यत्सामर्थ्यात् । यथाधि भृत्यादीनां राजा । अव्यक्तमेव अविदितं ततोऽन्यदित्यर्थः ।
विदितमविदितं च व्यक्ताव्यक्ते कार्यकारणत्वेन विकल्पिते ताभ्यामन्यद्ब्रह्म विज्ञानस्वरूपं सर्वविशेषप्रत्यस्तमितम् इत्ययं समुदायार्थः । अत एवात्मत्वान्न हेय उपादेयो वा । अन्यद्ध्यन्येन हेयमुपादेयं वा । न तेनैव तद्यस्य कस्यचिद्धेयमुपादेयं वा भवति । आत्मा च ब्रह्म सर्वान्तरात्मत्वादविषयमतोऽन्यस्यापि न
पद-भाष्य
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वाक्य-भाष्य
वस्तु न होने के कारण भी [वह हेयोपादेयरहित है] ।
‘इति शुश्रुम पूर्वेषाम्’ (यह हमने पूर्व आचार्यों के मुँह से सुना है) ऐसा कहकर यह दिखलाते हैं कि यह [परम्परागत] शास्त्र का उपदेश है । हमसे [शास्त्रीय मत का] व्याख्यान किया था [यह उनकी स्वतन्त्र कल्पना नहीं है] ऐसा कहकर जो उन आचार्यों की अस्वतन्त्रता दिखलायी है वह तर्क का प्रतिषेध करने के लिये है; जिन्होंने हमसे उस ब्रह्म का वर्णन किया था । अर्थात् उन्होंने ब्रह्म का प्रतिपादन करनेवाले नित्य आगम का ही व्याख्यान करके बतलाया था अपनी बुद्धि से ही प्रकट हुए तर्कद्वारा नहीं कहा । इस प्रकार ज्ञान की स्तुति के लिये शास्त्रपरम्परा का अविच्छेद दिखलाया है, क्योंकि तर्क तो अनवस्थित और भ्रमपूर्ण भी होता है ॥ ३ ॥
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हेयमुपादेयं वा । अन्याभावाच्च ।
इति शुश्रुम पूर्वेषामित्यागमोपयथोक्तस्य देशः । व्याचचक्षिरे आस- इत्यस्वातन्त्र्यं प्रामाणिकत्वम् तर्कप्रतिषेधार्थम् । ये नस्तद्ब्रह्मोक्तवन्तस्ते नित्यमेवागमं ब्रह्मप्रतिपादकं व्याख्यातवन्तो न पुनः स्वबुद्धिप्रभवेण तर्केण उक्तवन्त इत्यागमपारम्पर्याविच्छेदं दर्शयति विद्यास्तुतये । तर्कस्त्वनवस्थितो भ्रान्तोऽपि भवतीति ॥ ३ ॥