१.४
यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ४ ॥
yadvācānabhyuditaṃ yena vāgabhyudyate .
tadeva brahma tvaṃ viddhi nedaṃ yadidamupāsate .. 4 ..
जो वाणी से प्रकाशित नहीं है, किन्तु जिससे वाणी प्रकाशित होती है उसी को तू ब्रह्म जान, जिस इस [देशकालावच्छिन्न वस्तु]-की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ४ ॥
पद-भाष्य
जो चैतन्य सत्तास्वरूप ब्रह्म वाणी से [अप्रकाशित है]—जिह्वामूल आदि आठ स्थानों में[ १ ] आश्रित तथा अग्निदेवता से अधिष्ठित वर्णों को अभिव्यक्त करनेवाली इन्द्रिय एवं अर्थ-संकेत से परिच्छिन्न और इतने तथा इस क्रम से[ २ ] प्रयुक्त होनेवाले हैं, ऐसे नियमवाले वर्ण ‘वाक्’ कहे जाते हैं । तथा उनसे अभिव्यक्त होनेवाला शब्द भी ‘पद’ या ‘वाक्’ कहा
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यच्चैतन्यमात्रसत्ताकम्, वाचा वागिति जिह्वामूलादिष्वष्टसु स्थानेषु विषक्तमाग्नेयं वर्णानाम् अभिव्यञ्जकं करणं वर्णाश्चार्थसङ्केतपरिच्छिन्ना एतावन्त एवं क्रमप्रयुक्ता इति; एवं तदभिव्यङ्ग्यः शब्दः पदं वागिति उच्यते; ‘अकारो वै सर्वा वाक्सैषा
वाक्य-भाष्य
‘यद्वाचा’ इत्यादि मन्त्रों का उल्लेख आत्मतत्त्व की दृढ़ प्रतीति के लिये किया गया है । ‘वह विदित से भिन्न है’ ऐसा जो शास्त्र का तात्पर्य इस ब्राह्मण-ग्रन्थ ने ऊपर कहा है उसकी पुष्टि के लिये ही ये ‘यद्वाचा’ इत्यादि मन्त्र पढ़े जाते हैं ।
जो ब्रह्म वाणी से अर्थात् शब्द से अनभ्युदित—
[ १ ]: जिह्वामूल, हृदय, कण्ठ, मूर्धा, दन्त, नासिका, ओष्ठ और तालु ।
[ २ ]: यह मीमांसकों का मत है, जैसे ‘गौः’ यह पद गकार, औकार तथा विसर्ग—इस क्रमविशेष से अवच्छिन्न वर्णरूप ही है ।
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यद्वाचा इति मन्त्रानुवादो दृढप्रतीतेः । अन्यदेव तद्विदितादिति योऽयमागमार्थो ब्राह्मणोक्तोऽस्यैव द्रढिम्ने मन्त्रा यद्वाचेत्यादयः पठ्यन्ते ।
यद्ब्रह्मवाचा शब्देनानभ्युदितम्
पद-भाष्य
जाता है । श्रुति कहती है—‘अकार[ १ ] ही सम्पूर्ण वाक् है और यह वाक् ही अपने स्पर्श[ २ ], अन्तःस्थ[ ३ ] और ऊष्म[ ४ ] आदि भेदों से अभिव्यक्त होकर अनेक रूपवाली हो जाती है ।’ इस प्रकार मित[ ५ ] अमित[ ६ ] स्वर[ ७ ] एवं सत्य और मिथ्या—ये जिसके विकार हैं उस पदरूप से परिच्छिन्न एवं वागिन्द्रियरूप गुणवाली वाणी से जो अनभ्युदित—अप्रकाशित अर्थात् नहीं कहा गया है—
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स्पर्शान्तःस्थोष्मभिर्व्यज्यमाना बह्वी नानारूपा भवति’ (ऐ० आ० २ । ३ । ७ । १३) इति श्रुतेः । मितममितं स्वरः सत्यानृते एष विकारो यस्यास्तया वाचा पदत्वेन परिच्छिन्नया करणगुणवत्या— अनभ्युदितम् अप्रकाशितमनभ्युक्तम् ।
वाक्य-भाष्य
अनुक्त अर्थात् अप्रकाशित है । और जिससे वाणी अभ्युदित होती है—ऐसा कहकर उसे वाणी के प्रकाश का हेतु बतलाया है । ‘जिससे वाणी प्रकाशित होती है’ ऐसा कहकर वाणी के अभिधान (उच्चारण)-के अभिधेय (वाच्य)-को प्रकाशित करने में ब्रह्म को हेतु बतलाया है [अर्थात् यह दिखलाया है कि वाणी में जो अर्थ को अभिव्यंजित करने का सामर्थ्य है वह ब्रह्म का ही है] ।
ऊपर ‘लोग किसकी प्रेरणा से इस वाणी को बोलते हैं’ इस प्रश्न के उत्तर में ‘जो वाणी की वाणी है’ इत्यादि कहा भी जा चुका है । ‘तू उसी को ब्रह्म
[ १ ]: अकारप्रधान ॐकार से उपलक्षित स्फोट नामक चिच्छक्ति ।
[ २ ]: क से म तक सभी वर्ण । ३- य र ल व । ४- श ष स ह । ५- जिनके पाद का अन्त नियत अक्षरोंवाला है उन वाक्यों को मित (ऋग्वेद) कहते हैं । ६- जिनके पाद का अन्त नियत अक्षरोंवाला नहीं है उन वाक्यों को अमित (यजुर्वेद) कहते हैं । ७- गायन-प्रधान सामवेद ‘स्वर’ कहलाता है ।
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अनभ्युक्तमप्रकाशितमित्येतत्, येन वागभ्युद्यत इति वाक्प्रकाशहेतुत्वोक्तिः । येन प्रकाश्यत इति वाचोऽभिधानस्याभिधेयप्रकाशकत्वस्य हेतुत्वमुच्यते ब्रह्मणः ।
उक्तं च केनेषितां वाचमिमां वदन्ति यद्वाचो ह वाचमिति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धीत्यविषयत्वेन
पद-भाष्य
बल्कि जिस ब्रह्म के द्वारा वागिन्द्रियसहित वाणी विवक्षित अर्थ में बोली जाती अर्थात् अपने चैतन्यज्योतिःस्वरूप से प्रकाशित यानी प्रयुक्त की जाती है, जो ‘वाणी की वाणी है’ इस प्रकार बतलाया गया है [जिसके विषय में] बृहदारण्यकोपनिषद् में ‘बोलने के कारण वाणी है’ ‘जो भीतर से वाणी का नियमन करता है’ इत्यादि कहा है, तथा ‘चेतन प्राणियों में जो वाणी (वाक्-शक्ति) है वह घोषों (वर्णों) में स्थित है, उसे कोई ब्रह्मवेत्ता ही जानता है’ इस प्रकार प्रश्न उठाकर यह उत्तर दिया है कि ‘जिसके द्वारा जीव स्वप्न में बोलता है वह वाक् है’ वक्ता की वह नित्य वाचन-शक्ति ही चैतन्य-ज्योतिःस्वरूपा वाक् है जैसा कि ‘वक्ता की वाचन-शक्ति का लोप कभी नहीं होता’ इस श्रुति से सिद्ध होता है ।
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येन ब्रह्मणा विवक्षितेऽर्थेसकरणा वाग् अभ्युद्यते चैतन्यज्योतिषा प्रकाश्यते प्रयुज्यत इत्येतद्यद्वाचो ह वागित्युक्तम्, ‘वदन्वाक्’ (बृ० उ० १ । ४ । ७) ‘यो वाचमन्तरो यमयति’ (बृ० उ० ३ । ७ । १७) इत्यादि च वाजसनेयके । ‘या वाक् पुरुषेषु सा घोषेषु प्रतिष्ठिता कश्चित्तां वेद ब्राह्मणः’ इति प्रश्नमुत्पाद्य प्रतिवचनमुक्तम् ‘सा वाग्यया स्वप्ने भाषते’ इति । सा हि वक्तुर्वक्तिर्नित्या वाक् चैतन्यज्योतिःस्वरूपा, ‘न हि वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यते’ (बृ० उ० ४ । ३ । २६) इति श्रुतेः ॥
वाक्य-भाष्य
जान’ यह आगम ब्रह्म को अविषयरूप से बुद्धि में बिठाने के लिये है । ‘जो वाणी से प्रकट नहीं होता, बल्कि वाणी के प्रकाशित होने का हेतु है’ इस कथन से ब्रह्म का अविषयत्व सिद्ध करता हुआ शास्त्र पुरुष को अन्य वस्तु के ग्रहण करने की इच्छा से
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ब्रह्मण आत्मन्यवस्थापनार्थ आम्नायः । यद्वाचानभ्युदितं वाक्प्रकाशनिमित्तं चेति ब्रह्मणोऽविषयत्वेन वस्त्वन्तरजिघृक्षां
पद-भाष्य
उस आत्मस्वरूप को ही तू बृहत् होने के कारण ‘ब्रह्म’ यानी भूमासंज्ञक सर्वोत्कृष्ट ब्रह्म जान । जिन वाक् आदि उपाधियों के कारण, वाणी की वाणी, चक्षु का चक्षु, श्रोत्र का श्रोत्र, मन का मन, कर्ता, भोक्ता, विज्ञाता, नियन्ता, शासनकर्ता तथा ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है—इत्यादि प्रकार के व्यवहार उस अव्यवहार्य निर्विशेष सर्वोत्कृष्ट समस्वरूप ब्रह्म में प्रवृत्त होते हैं, उन सब उपाधियों का बाध कर अपने निर्विशेष आत्मा को ही ब्रह्म जान—यही ‘एव’ शब्द का अर्थ है । जिस इस उपाधिविशिष्ट अनात्मा ईश्वरादि की उपासना—ध्यान करते हैं यह ब्रह्म नहीं है । ‘उसीको तू ब्रह्म जान’ इतना कह देने पर भी [अनात्मवस्तु में ब्रह्मभावना का
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तदेव आत्मस्वरूपं ब्रह्म निरतिशयं भूमाख्यं बृहत्त्वाद् ब्रह्मेति विद्धि विजानीहि त्वम् । यैर्वागाद्युपाधिभिर्वाचो ह वाक् चक्षुषश्चक्षुः श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनः कर्ता भोक्ता विज्ञाता नियन्ता प्रशासिता विज्ञानमानन्दं ब्रह्म इत्येवमादयः संव्यवहारा असंव्यवहारे निर्विशेषे परे साम्ये ब्रह्मणि प्रवर्तन्ते, तान्व्युदस्य आत्मानमेव निर्विशेषं ब्रह्म विद्धीति एवशब्दार्थः । नेदं ब्रह्म यदिदम् इत्युपाधिभेदविशिष्टमनात्मेश्वरादि उपासते ध्यायन्ति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि
वाक्य-भाष्य
निवृत्त करके अपने आत्मस्वरूप में ही जोड़ता है और ‘उसीको तू ब्रह्म जान’ इस वाक्यद्वारा वह उसे अन्य प्रयत्न से उपरत करता है तथा ‘नेदं यदिदमुपासते’ इस कथन से भी ब्रह्म का उपास्यत्व निषेध करने के कारण [वह अन्य सब ओर से उसे निवृत्त करता है] ॥ ४ ॥
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निवर्त्य स्वात्मन्येवावस्थापयति आम्नायस्तदेव ब्रह्म त्वं विद्धीति यत्नत उपरमयति । नेदमित्युपास्यप्रतिषेधाच्च ॥ ४ ॥
पद-भाष्य
निषेध हो ही जाता] पुनः ‘यह ब्रह्म नहीं है’ इस वाक्य के द्वारा जो अनात्मा का अब्रह्मत्व प्रतिपादन किया है वह आत्मा में ही ब्रह्म-बुद्धि का नियमन करने के लिये अथवा अन्य उपास्य देवताओं में ब्रह्मबुद्धि की निवृत्ति करने के लिये है ॥ ४ ॥
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इत्युक्तेऽपि नेदं ब्रह्म इत्यनात्मनोऽब्रह्मत्वं पुनरुच्यते नियमार्थम् अन्यब्रह्मबुद्धिपरिसंख्यानार्थं वा ॥ ४ ॥