यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ५ ॥
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ५ ॥
yanmanasā na manute yenāhurmano matam .
tadeva brahma tvaṃ viddhi nedaṃ yadidamupāsate .. 5 ..
जो मन से मनन नहीं किया जाता, बल्कि जिससे मन मनन किया हुआ कहा जाता है उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [देशकालावच्छिन्न वस्तु]-की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ५ ॥
पद-भाष्य
जिसका मन के द्वारा मनन नहीं किया जाता; मन और बुद्धि के एकत्वरूप से यहाँ मन शब्द से अन्तःकरण का ग्रहण किया जाता है । जिसके द्वारा मनन करते हैं उसे मन कहते हैं; वह समस्त इन्द्रियों के विषयों में व्यापक होने के कारण, सम्पूर्ण इन्द्रियों के लिये समान है । ‘काम, संकल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धैर्य, अधैर्य, लज्जा, बुद्धि और भय—ये सब मन ही हैं ।’
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यन्मनसा न मनुते; मन इत्यन्तःकरणं बुद्धिमनसोरेकत्वेन गृह्यते । मनुतेऽनेनेति मनः सर्वकरणसाधारणम्, सर्वविषयव्यापकत्वात् । “कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धाश्रद्धाधृतिरधृतिर्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव” (बृ० उ० १ । ५ । ३)
वाक्य-भाष्य
‘यन्मनसा’ इत्यादि श्रुतियों का तात्पर्य समान ही है ।
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यन्मनसा इत्यादि समानम् ।
पद-भाष्य
इस श्रुति के अनुसार मन कामादि वृत्तियोंवाला है । उस मन के द्वारा यह लोक जिस मन के प्रकाशक चैतन्यज्योति का मनन—संकल्प अथवा निश्चय नहीं कर सकता, क्योंकि मन का प्रकाशक होने के कारण वह तो उसका नियामक है । आत्मा सब विषयों के प्रति प्रत्यक्रूप (आन्तरिक) ही है; अतः उसमें मन प्रवृत्त नहीं हो सकता । अपने भीतर स्थित चैतन्यज्योति से प्रकाशित हुए मन में ही मनन करने का सामर्थ्य है । उसके द्वारा वृत्तियुक्त हुए मन को ब्रह्मवेत्ता लोग जिस ब्रह्म के द्वारा मत—विषयीकृत अर्थात् व्याप्त बतलाते हैं; उस मन के प्रत्यक्चेतयिता आत्मा को ही तू ब्रह्म जान । ‘नेदं…..’ इत्यादि वाक्य की व्याख्या पूर्ववत् समझनी चाहिये ॥ ५ ॥
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इति श्रुतेः कामादिवृत्तिमन्मनः । तेन मनसा यत् चैतन्यज्योतिर्मनसोऽवभासकं न मनुते न सङ्कल्पयति नापि निश्चिनोति लोकः, मनसोऽवभासकत्वेन नियन्तृत्वात् । सर्वविषयं प्रति प्रत्यगेवेति स्वात्मनि न प्रवर्ततेऽन्तःकरणम् । अन्तःस्थेन हि चैतन्यज्योतिषावभासितस्य मनसो मननसामर्थ्यम्; तेन सवृत्तिकं मनो येन ब्रह्मणा मतं विषयीकृतं व्याप्तम् आहुः कथयन्ति ब्रह्मविदः । तस्मात् तदेव मनस आत्मानं प्रत्यक्चेतयितारं ब्रह्म विद्धि । नेदमित्यादि पूर्ववत् ॥ ५ ॥
वाक्य-भाष्य
‘मन मनन’ किया जाता है’ अर्थात् जिस नित्य विज्ञानस्वरूप ब्रह्म द्वारा मन भी विषय किया जाता है । जो सब इन्द्रियों का
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मनो मतमिति येन ब्रह्मणा मनोऽपि विषयीकृतं नित्यविज्ञानस्वरूपेण इत्येतत् । सर्वकरणानामविषयम्,