खण्ड 1 - मन्त्र 6

यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ६ ॥

yaccakṣuṣā na paśyati yena cakṣūṃṣi paśyati .
tadeva brahma tvaṃ viddhi nedaṃ yadidamupāsate .. 6 ..


जिसे कोई नेत्र से नहीं देखता बल्कि जिसकी सहायता से नेत्र [अपने विषयों को] देखते हैं उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [देशकालावच्छिन्न वस्तु]-की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ६ ॥

पद-भाष्य

लोक जिसे अन्तःकरण की वृत्ति से युक्त नेत्र द्वारा नहीं देखता अर्थात् विषय नहीं करता, किन्तु जिस चैतन्यात्मज्योति के द्वारा चक्षुओं अर्थात् अन्तःकरण की वृत्तियों के भेद से विभिन्न हुईं—नेत्रेन्द्रिय की वृत्तियों को देखता—विषय करता यानी व्याप्त करता है उसीको तु ब्रह्म जान इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ ६ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यत् चक्षुषा न पश्यति न विषयीकरोति अन्तःकरणवृत्तिसंयुक्तेन लोकः, येन चक्षूंषि अन्तःकरणवृत्तिभेदभिन्नाश्चक्षुर्वृत्तीः पश्यति चैतन्यात्मज्योतिषा विषयीकरोति व्याप्नोति । तदेवेत्यादि पूर्ववत् ॥ ६ ॥