खण्ड 1 - मन्त्र 7

यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदग्ँ श्रुतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ७ ॥

yacchrotreṇa na śṛṇoti yena śrotramidag̐ śrutam .
tadeva brahma tvaṃ viddhi nedaṃ yadidamupāsate .. 7 ..


जिसे कोई कान से नहीं सुनता बल्कि जिससे यह श्रोत्रेन्द्रिय सुनी जाती है उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [देशकालावच्छिन्न वस्तु]-की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ७ ॥

पद-भाष्य

लोक जिसे मनोवृत्ति से युक्त आकाश के कार्यभूत तथा दिशा-रूप देवता से अधिष्ठित श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा नहीं सुन सकता अर्थात् जिसे
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यत् श्रोत्रेण न शृणोति दिग्देवताधिष्ठितेन आकाशकार्येण मनोवृत्तिसंयुक्तेन न

वाक्य-भाष्य

अविषय है और नित्य विज्ञानस्वरूप से अवभासित होने के कारण जिससे वे
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तानि च सव्यापाराणि सविषयाणि नित्यविज्ञानस्वरूपावभासतया

पद-भाष्य

श्रोत्र से विषय नहीं कर सकता, बल्कि जिस चैतन्यात्मज्योति द्वारा यह प्रसिद्ध श्रोत्र सुना यानी विषय किया जाता है वही [ब्रह्म है] इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ ७ ॥
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विषयीकरोति लोकः, येन श्रोत्रम् इदं श्रुतं यत्प्रसिद्धं चैतन्यात्मज्योतिषा विषयीकृतं तदेव इत्यादि पूर्ववत् ॥ ७ ॥