खण्ड 1 - मन्त्र 8

यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ८ ॥

yatprāṇena na prāṇiti yena prāṇaḥ praṇīyate .
tadeva brahma tvaṃ viddhi nedaṃ yadidamupāsate .. 8 ..


जो नासिकारन्ध्रस्थ प्राण के द्वारा विषय नहीं किया जाता, बल्कि जिससे प्राण अपने विषयों की ओर जाता है उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [देशकालावच्छिन्न वस्तु]-की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ८ ॥

पद-भाष्य

अन्तःकरण की और प्राण की वृत्तियों के सहित नासिकारन्ध्र में स्थित एवं पृथिवी के कार्यभूत प्राण यानी घ्राण के द्वारा जो प्राणन अर्थात् गन्धयुक्त वस्तुओं को विषय नहीं करता, बल्कि जिस चैतन्यात्मज्योति से प्रकाश्यरूप से प्राण अपने विषय की
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यत् प्राणेन घ्राणेन पार्थिवेन नासिकापुटान्तरवस्थितेनान्तःकरणप्राणवृत्तिभ्यां सहितेन यन्न प्राणिति गन्धवन्न विषयीकरोति, येन चैतन्यात्मज्योतिषावभास्य

वाक्य-भाष्य

सभी इन्द्रियाँ अपने व्यापार और विषयों के सहित अवभासित होती हैं—यह इन मन्त्रों का तात्पर्य है । ‘तथा क्षेत्रज्ञ सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है’ इस स्मृति से और ‘उसीके तेज से’ [यह सब प्रकाशित है] इस
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येनावभास्यन्त इति श्लोकार्थः ॥

‘क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति’ (गीता १३ । ३३) इति स्मृतेः । ‘तस्य भासा’ (मु० उ० २ । २ । १०) इति

पद-भाष्य

ओर प्रवृत्त किया जाता है वही ब्रह्म है इत्यादि शेष सब अर्थ पहले ही के समान है ॥ ८ ॥
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त्वेन स्वविषयं प्रति प्राणः प्रणीयते तदेवेत्यादि सर्वं समानम् ॥ ८ ॥

इति प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥


वाक्य-भाष्य

आथर्वणी श्रुति से भी यही प्रमाणित होता है । ‘येन प्राणः’ इस श्रुति का यह तात्पर्य है कि क्रियाशक्ति भी आत्मविज्ञान के कारण ही प्रवृत्त होती है ॥ ५—८ ॥
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चाथर्वणे । ‘येन प्राण’ इति क्रियाशक्तिरप्यात्मविज्ञाननिमित्तेत्येतत् ॥ ५—८ ॥

इति प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥


द्वितीय खण्ड

ब्रह्मज्ञान की अनिर्वचनीयता

पद-भाष्य

इस प्रकार हेयोपादेय से विपरीत तू आत्मा ही ब्रह्म है—ऐसी प्रतीति कराया हुआ शिष्य यह न समझ बैठे कि ‘ब्रह्म मैं ही हूँ, ऐसा मैं उसे अच्छी तरह जानता हूँ’ इस अभिप्राय से उसकी बुद्धि को [इस निश्चय से] विचलित करने के लिये आचार्य ने ‘यदि मन्यसे’ इत्यादि कहा ।
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एवं हेयोपादेयविपरीतस्त्वमात्मा ब्रह्मेति प्रत्यायितः शिष्योऽहमेव ब्रह्मेति सुष्ठु वेदाहमिति मा गृह्णीयादित्याशयादाहाचार्यः शिष्यबुद्धिविचालनार्थम्—यदीत्यादि ।

पद-भाष्य

पूर्व०—मैं उसे अच्छी तरह जानता हूँ—ऐसा निश्चित ज्ञान तो इष्ट ही है ।

सिद्धान्ती—ठीक है, निश्चित ज्ञान तो अवश्य इष्ट ही है, परन्तु ‘मैं उसे अच्छी तरह जानता हूँ’ ऐसा कथन इष्ट नहीं है । जो वेद्य वस्तु वेत्ता की विषय होती है वही अच्छी तरह जानी जा सकती है; जिस प्रकार दहन करनेवाले अग्नि के दाह का विषय दाह्य पदार्थ ही हो सकता है उसका स्वरूप नहीं हो सकता । ‘ब्रह्म सभी ज्ञाताओं का आत्मा (अपना-आप) ही है’, यह समस्त वेदान्तों का भलीभाँति निश्चय किया हुआ अर्थ है । यहाँ भी ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादि प्रश्नोत्तरों द्वारा उसी का प्रतिपादन किया गया है । उसीको ‘यद्वाचानभ्युदितम्’ इस वाक्य द्वारा विशेषरूप से निश्चय किया है । वह विदित से अन्य है और अविदित से भी ऊपर है’ इस वाक्य द्वारा ब्रह्मवेत्ताओं के सम्प्रदाय का निश्चय भी बतलाया गया है; तथा इस प्रकार उल्लेख किये हुए प्रकरण का ‘अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्’ इस वाक्य द्वारा उपसंहार करेंगे । अतः ‘मैं अच्छी तरह जानता हूँ’ ऐसी शिष्य की बुद्धि का निराकरण करना उचित ही है ।

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नविष्टैव सु वेदाहम् इति निश्चिता प्रतिपत्तिः ।

सत्यम्, इष्टा निश्चिता प्रतिपत्तिः; न हि सु ब्रह्मणोऽवेद्यत्वे हेतुः वेदाहमिति । यद्धि वेद्यं वस्तु विषयीभवति, तत्सुष्ठु वेदितुं शक्यम्, दाह्यमिव दग्धुम् अग्नेर्दग्धुर्न त्वग्नेः स्वरूपमेव । सर्वस्य हि वेदितुः स्वात्मा ब्रह्मेति सर्ववेदान्तानां सुनिश्चितोऽर्थः । इह च तदेव प्रतिपादितं प्रश्नप्रतिवचनोक्त्या ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्याद्यया । ‘यद्वाचानभ्युदितम्’ इति च विशेषतोऽवधारितम् । ब्रह्मवित्सम्प्रदायनिश्चयश्चोक्तः ‘अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि’ इति । उपन्यस्तमुपसंहरिष्यति च ‘अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्’ इति । तस्माद्युक्तमेव शिष्यस्य सुवेदेति बुद्धिं निराकर्तुम् ।

पद-भाष्य

जिस प्रकार जलानेवाले अग्नि द्वारा स्वयं अग्नि नहीं जलाया जा सकता उसी प्रकार जाननेवाले के द्वारा स्वयं जाननेवाला नहीं जाना जा सकता । ब्रह्म का जाननेवाला कोई और है भी नहीं जिसका वह उससे भिन्न ब्रह्म ज्ञेय हो सके । ‘इससे भिन्न और कोई ज्ञाता नहीं है’ इस श्रुति द्वारा भी ब्रह्म से भिन्न ज्ञाता का प्रतिषेध किया गया है । अतः ‘मैं ब्रह्म को अच्छी तरह जानता हूँ’ यह समझना मिथ्या ही है । इसलिये गुरु ने ‘यदि मन्यसे’ इत्यादि ठीक ही कहा है ।
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न हि वेदिता वेदितुर्वेदितुं शक्योऽग्निर्दग्धुरिव दग्धुमग्नेः । न चान्यो वेदिता ब्रह्मणोऽस्ति यस्य वेद्यमन्यत्स्याद्ब्रह्म । ‘नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ’ (बृ० उ० ३ । ८ । ११) इत्यन्यो विज्ञाता प्रतिषिध्यते । तस्मात् सुष्ठु वेदाहं ब्रह्मेति प्रतिपत्तिर्मिथ्यैव तस्माद् युक्तमेवाहाचार्यो यदीत्यादि ।

वाक्य-भाष्य

‘यदि मन्यसे सुवेद’ इत्यादि वाक्य से जो शिष्य की बुद्धि को विचलित करना है वह उसके ग्रहण किये हुए अर्थ को स्थिर करने के लिये ही है । शिष्य की बुद्धि को ज्ञात और अज्ञात वस्तुओं से हटाकर ‘तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि’ (उसीको तू ब्रह्म जान) इस कथन से अपने आत्मस्वरूप में स्थिर कर तथा उपास्य के प्रतिषेध द्वारा उसे स्वराज्य पर अभिषिक्त कर अब उसकी बुद्धि को विचलित करते हैं ।
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यदि मन्यसे सुवेद इति शिष्यबुद्धिविचालना गृहीतस्थिरतायै । विदिताविदिताभ्यां निवर्त्य बुद्धिं शिष्यस्य स्वात्मन्यवस्थाप्य तदेव ब्रह्म त्वं विद्धीति स्वाराज्येऽभिषिच्य उपास्यप्रतिषेधेनाथास्य बुद्धिं विचालयति ।