खण्ड 2 - मन्त्र 1

यदि मन्यसे सुवेदेति[*] दहरमेवापि नूनम् ।
त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपं यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमाग्ँस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥ १ ॥

yadi manyase suvedeti[*] daharamevāpi nūnam .
tvaṃ vettha brahmaṇo rūpaṃ yadasya tvaṃ yadasya deveṣvatha nu mīmāg̐syameva te manye viditam .. 1 ..


यदि तू ऐसा मानता है कि ‘मैं अच्छी तरह जानता हूँ’ तो निश्चय ही तू ब्रह्म का थोड़ा-सा ही रूप जानता है । इसका जो रूप तू जानता है और इसका जो रूप देवताओं में विदित है [वह भी अल्प ही है] अतः तेरे लिये ब्रह्म विचारणीय ही है । [तब शिष्य ने एकान्त देश में विचार करने के अनन्तर कहा—] ‘मैं ब्रह्म को जान गया—ऐसा समझता हूँ’ ॥ १ ॥

पद-भाष्य

यदि कदाचित् तू ऐसा मानता हो कि मैं ब्रह्म को अच्छी तरह जानता हूँ जिसके दोष क्षीण हो गये हैं ऐसा कोई बुद्धिमान् पुरुष कभी सुने हुए के अनुसार दुर्विज्ञेय विषय को भी समझ लेता है और कोई नहीं भी समझता—इस आशय से ही [गुरु ने] ‘यदि मन्यसे’ इत्यादि शंकायुक्त वाक्य कहा है । ऐसा देखा भी गया है कि ‘यह जो नेत्रों के भीतर पुरुष दिखायी देता है यही आत्मा है, यही अमृत है, यही अभयपद है और यही ब्रह्म है—ऐसा [ब्रह्मा ने] कहा’
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यदि कदाचिद् मन्यसे सुवेदेति सुष्ठु वेदाहं ब्रह्मेति । कदाचिद्द्यथाश्रुतं दुर्विज्ञेयमपि क्षीणदोषः सुमेधाः कश्चित्प्रतिपद्यते कश्चिन्नेति साशङ्कमाह यदीत्यादि । दृष्टं च ‘य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्म’

वाक्य-भाष्य

यदि तू यह मानता है कि मैं ब्रह्म को अच्छी तरह जानता हूँ तो तू निश्चय

[ * ]: ‘दभ्रमेव’ ऐसा भी पाठ है ।

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यदि मन्यसे सुवेद अहं ब्रह्मेति त्वं ततोऽल्पमेव ब्रह्मणो

पद-भाष्य

इस प्रकार ब्रह्माजी के कहने पर प्रजापति की सन्तान और पण्डित होने पर भी असुरराज विरोचन ने अपने स्वभाव के दोष से, किसी प्रकार सिद्ध न होने पर भी शरीर ही आत्मा है, ऐसा विपरीत अर्थ समझ लिया । तथा देवराज इन्द्र ने भी एक, दो तथा तीन बार कहने पर भी इसका भाव न समझकर अपने स्वभाव का दोष क्षीण हो जाने के अनन्तर चौथी बार कहने पर पहली ही बार कहे हुए ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त किया । लोक में भी एक ही गुरु से श्रवण करनेवालों में कोई तो ठीक-ठीक समझ लेता है, कोई ठीक नहीं समझता है, कोई उलटा समझ बैठता है और कोई समझता ही नहीं । फिर यदि
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(छा० उ० ८ । ७ । ४) इत्युक्ते प्राजापत्यः पण्डितोऽप्यसुरराड् विरोचनः स्वभावदोषवशादनुपपद्यमानमपि विपरीतमर्थं शरीरमात्मेति । प्रतिपन्नः । तथेन्द्रो देवराट् सकृद्द्विस्त्रिरुक्तं चाप्रतिपद्यमानः स्वभावदोषक्षयमपेक्ष्य चतुर्थे पर्याये प्रथमोक्तमेव ब्रह्म प्रतिपन्नवान् । लोकेऽपि एकस्माद् गुरोः शृण्वतां कश्चिद्यथावत्प्रतिपद्यते कश्चिद्यथावत् कश्चिद्विपरीतं कश्चिन्न प्रतिपद्यते । किमु

वाक्य-भाष्य

ही ब्रह्म के रूप को बहुत कम जानता है—ऐसा आचार्य समझते हैं । परन्तु आचार्य जो शिष्य की बुद्धि को विचलित करते हैं वह किसलिये है—इसपर कहते हैं कि [उनका यह कार्य] शिष्य द्वारा पहले ग्रहण किये हुए अर्थ में बुद्धि की स्थिरता के लिये है ।
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रूपं वेत्थ त्वमिति नूनं निश्चितं मन्यत इत्याचार्यः । सा पुनर्विचालना किमर्थेत्युच्यते—पूर्वगृहीतवस्तुनि बुद्धेः स्थिरतायै ।

पद-भाष्य

अतीन्द्रिय आत्मतत्त्व को न समझ सकें तो इसमें कहना ही क्या है? इसके सम्बन्ध में तो समस्त सद्वादी और असद्वादी तार्किक भी उलटा ही समझे हुए हैं । अतः ‘ब्रह्म को जान लिया’ यह कथन सुनिश्चित होने पर भी विषम प्रतिपत्ति (ज्ञान) होने के कारण आचार्य का ‘यदि मन्यसे सुवेद’ इत्यादि शंकायुक्त कथन उचित ही है । [अतः आचार्य कहते हैं यदि तू ‘ब्रह्म को मैंने जान लिया है’ ऐसा मानता है तो] निश्चय ही तू ब्रह्म के अल्प रूप को ही जानता है ।

पूर्व०—क्या ब्रह्म के बड़े और छोटे अनेकों रूप हैं, जिससे कि गुरु ‘तू ब्रह्म के अल्प रूप को ही जानता है’ ऐसा कह रहे हैं ।

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वक्तव्यमतीन्द्रियमात्मतत्त्वम्? अत्र हि विप्रतिपन्नाः सदसद्वादिनस्तार्किकाः सर्वे । तस्माद्विदितं ब्रह्मेति सुनिश्चितोक्तमपि विषमप्रतिपत्तित्वाद् यदि मन्यसे इत्यादि साशङ्कं वचनं युक्तमेव आचार्यस्य । दहरम् अल्पमेवापि नूनं त्वं वेत्थ जानीषे ब्रह्मणो रूपम् ।

किमनेकानि ब्रह्मणो रूपाणि महान्त्यर्भकाणि च, येनाह दहरमेवेत्यादि?

वाक्य-भाष्य

[इसी उद्देश्य को लेकर आचार्य कहते हैं—] देवताओं में भी जो कोई यह मानता है कि मैं ब्रह्म को अच्छी तरह जानता हूँ वह भी निश्चय ही उस ब्रह्म के रूप को बहुत कम जानता है । क्यों? क्योंकि ब्रह्म किसी का भी विषय नहीं है ।
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देवेष्वपि सुवेदाहमिति मन्यते यः सोऽप्यस्य ब्रह्मणो रूपं दहरमेव वेत्ति नूनम् । कस्मात्? अविषयत्वात्कस्यचिद्ब्रह्मणः ।

पद-भाष्य

सिद्धान्ती—हाँ, नाम-रूपात्मक उपाधि के किये हुए तो ब्रह्म के अनेक रूप हैं, किन्तु स्वतः नहीं हैं । स्वतः तो ‘जो अशब्द, अस्पर्श, रूपरहित, अव्यय, रसहीन, नित्य और गन्धहीन है’ इस श्रुति के अनुसार शब्दादि के सहित उसके सभी रूपों का प्रतिषेध किया जाता है ।

पूर्व०—जिस धर्म के द्वारा जिसका निरूपण किया जाता है वही उसका रूप हुआ करता है; अतः ब्रह्म का भी जिस विशेषण से निरूपण होता है वही उसका स्वरूप होना चाहिये । अतः कहते हैं—चैतन्य पृथिवी आदि का अथवा परिणाम को प्राप्त हुए अन्य समस्त पदार्थों में से किसी का धर्म नहीं है और न वह श्रोत्रादि इन्द्रिय अथवा अन्तःकरण का ही धर्म है, अतएव वह ब्रह्म का रूप है, इसीलिये

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बाढम्; अनेकानि हि ब्रह्मण नामरूपोपाधिकृतानि औपाधिकभेद-ब्रह्मणो रूपाणि, न निरूपणम् स्वतः । स्वतस्तु ‘अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्’ (क० उ० १ । ३ । १५, नृसिंहोत्तर० ९, मुक्तिक० २ । ७२) इति शब्दादिभिः सह रूपाणि प्रतिषिध्यन्ते ।

ननु येनैव धर्मेण यद्रूप्यते तदेव तस्य स्वरूपमिति ब्रह्मणोऽपि येन विशेषेण निरूपणं तदेव तस्य स्वरूपं स्यात् । अत उच्यते—चैतन्यम् पृथिव्यादीनामन्यतमस्य सर्वेषां विपरिणतानां वा धर्मो न भवति, तथा श्रोत्रादीनामन्तःकरणस्य च धर्मो न भवतीति ब्रह्मणो रूपमिति ब्रह्म रूप्यते चैतन्येन । तथा चोक्तम् ।

वाक्य-भाष्य

अथवा इसका इस प्रकार सम्बन्ध लगाना चाहिये कि इस ब्रह्म का जो मनुष्यों में आध्यात्मिक और देवताओं में आधिदैविक रूप है वह बहुत तुच्छ ही है । ‘अथ नु’ ऐसा कहकर ब्रह्म के विचार में हेतु प्रदर्शित करते हैं । क्योंकि ‘ब्रह्म विदित से पृथक् ही है’—ऐसा कहे जाने के कारण ब्रह्म का अच्छी प्रकार जाना हुआ रूप तो अल्प ही है ।
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अथवाल्पमेवास्याध्यात्मिकं मनुष्येषु देवेषु च आधिदैविकमस्य ब्रह्मणो यद्रूपं तदिति सम्बन्धः । अथ न्विति हेतुमीमांसायाः । यस्माद्दहरमेव सुविदितं ब्रह्मणो रूपमन्यदेव तद्विदि-

पद-भाष्य

ब्रह्म का चैतन्यरूप से निरूपण किया जाता है । ऐसा ही कहा भी है—‘ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है’ ‘वह विज्ञानघन ही है’ ‘ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्तस्वरूप है’ ‘प्रज्ञान ब्रह्म है’ इस प्रकार श्रुतियों में भी ब्रह्म के रूप का निरूपण किया गया है ।

सिद्धान्ती—यह ठीक है, तथापि वह अन्तःकरण, शरीर और इन्द्रियरूप उपाधि के द्वारा ही विज्ञानादि शब्दों से निरूपण किया जाता है, क्योंकि देहादि के वृद्धि, संकोच, उच्छेद और नाश आदि में वह उनका अनुकरण करनेवाला है; परन्तु स्वतः वैसा नहीं है । स्वतः तो वह ‘जाननेवालों के लिये अज्ञात है और न जाननेवालों के लिये ज्ञात है’ इस प्रकार निश्चय किया जायगा ।

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‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ (बृ० उ० ३ । ९ । २८) ‘विज्ञानघन एव’ (बृ० उ० २ । ४ । १२) ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ (तै० उ० २ । १ । १) ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ (ऐ० उ० ३ । १ । ३) इति च ब्रह्मणो रूपं निर्दिष्टं श्रुतिषु ।

सत्यमेवम्; तथापि तदन्तःकरणदेहेन्द्रियोपाधिद्वारेणैव विज्ञानादिशब्दैर्निर्दिश्यते, तदनुकारित्वाद् देहादिवृद्धिसङ्कोचोच्छेदादिषु नाशेषु च, न स्वतः । स्वतस्तु ‘अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्’ (के० उ० २ । ३) इति स्थितं भविष्यति ।

वाक्य-भाष्य

और तू यह मानता ही है कि मैं उसे अच्छी तरह जानता हूँ । इसलिये तू ब्रह्म के अल्प स्वरूप को ही जानता है । क्योंकि ऐसी बात है, इसलिये जबतक तुझे विदित और अविदित का प्रतिषेध करनेवाले शास्त्रवचन का अनुभव न हो तबतक तो अब भी मैं तेरे लिये ब्रह्म को मीमांसा यानी विचार के योग्य ही समझता हूँ; यह इसका तात्पर्य है ।
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तादित्युक्तत्वात् । सुवेदेति च मन्यसेऽतोऽल्पमेव वेत्थ त्वं ब्रह्मणो रूपं यस्मादथ नु तस्मान्मीमांस्यम् एवाद्यापि ते तव ब्रह्म विचार्यमेव यावद्विदिताविदितप्रतिषेधागमार्थानुभव इत्यर्थः ।

पद-भाष्य

‘यदस्य’ इस पदसमूह का पूर्ववर्ती ‘ब्रह्मणो रूपम्’ के साथ सम्बन्ध है । तू केवल आध्यात्मिक उपाधि से परिच्छिन्न हुए इस ब्रह्म के ही अल्प रूप को नहीं जानता बल्कि अधिदैवत उपाधि से परिच्छिन्न हुए इस ब्रह्म के भी जिस रूप को तू देवताओं में जानता है वह भी निश्चय तू इसके अल्प रूप को ही जानता है—ऐसा मैं मानता हूँ । इसका जो अध्यात्मरूप है और जो देवताओं में है वह भी उपाधिपरिच्छिन्न होने के कारण दहरत्व (अल्पत्व)-से दूर नहीं है । किन्तु जो सम्पूर्ण उपाधि और विशेषणों से रहित शान्त अनन्त एक अद्वितीय भूमासंज्ञक नित्य ब्रह्म है वह सुगमता से जाननेयोग्य नहीं है—यह इसका अभिप्राय है ।
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यदस्य ब्रह्मणो रूपमिति पूर्वेण सम्बन्धः । न केवलमध्यात्मोपाधिपरिच्छिन्नस्यास्य ब्रह्मणो रूपं त्वमल्पं वेत्थ; यदप्यधिदैवतोपाधिपरिच्छिन्नस्यास्य ब्रह्मणो रूपं देवेषु वेत्थ त्वम् तदपि नूनं दहरमेव वेत्थ इति मन्येऽहम् । यदध्यात्मं यदपि देवेषु तदपि चोपाधिपरिच्छिन्नत्वाद्दहरत्वान्न निवर्तते । यत्तु विध्वस्तसर्वोपाधिविशेषं शान्तम् अनन्तमेकमद्वैतं भूमाख्यं नित्यं ब्रह्म, न तत्सुवेद्यमित्यभिप्रायः ।

वाक्य-भाष्य

‘मन्ये विदितम्’ यह शिष्य की मीमांसा (विचार) करने के अनन्तर की उक्ति है—क्योंकि ऐसा मानने पर ही तीन प्रकार की प्रतीतियों की संगति होती है । सम्यक् वस्तु के निश्चय के लिये विचलित किये हुए शिष्य से जब आचार्य ने कहा कि ‘तुम्हारे लिये अभी ब्रह्म विचारणीय ही है’ तब शिष्य ने
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मन्ये विदितमिति शिष्यस्य मीमांसानन्तरोक्तिः प्रत्ययत्रयसङ्गतेः । सम्यग्वस्तुनिश्चयाय विचालितः शिष्य आचार्येण मीमांस्यमेव त इति चोक्त एकान्ते

पद-भाष्य

क्योंकि ऐसी बात है इसलिये अभी तो मैं तेरे लिये ब्रह्म को विचारणीय ही समझता हूँ । आचार्य के ऐसा कहने पर शिष्य ने एकान्त में बैठकर समाहित हो आचार्य के बतलाये हुए आगम को अर्थसहित विचारकर और तर्कद्वारा निश्चयकर आत्मानुभव करने के अनन्तर आचार्य के समीप आकर कहा—मैं ऐसा मानता हूँ कि अब मुझे ब्रह्म विदित हो गया है ॥ १ ॥
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यत एवम् अथ नु तस्मात् मन्ये अद्यापि मीमांस्यं विचार्यमेव ते तव ब्रह्म । एवमाचार्योक्तः शिष्य एकान्ते उपविष्टः समाहितः सन्, यथोक्तमाचार्येण आगममर्थतो विचार्य, तर्कतश्च निर्धार्य, स्वानुभवं कृत्वा, आचार्यसकाशमुपगम्य उवाच—मन्येऽहमथेदानीं विदितं ब्रह्मेति ॥ १ ॥

वाक्य-भाष्य

एकान्त देश में समाहित चित्त से पूर्वोक्त प्रकार से ब्रह्म को विचारने के अनन्तर भलीभाँति निश्चय करके शास्त्र, आचार्य और अपना अनुभव—इन तीनों प्रतीतियों की एक ही विषय में संगति करने के लिये कहा [मैं ब्रह्म को ज्ञात हुआ ही मानता हूँ] । इससे यह न्याय दिखलाया गया है कि इस प्रकार खूब निश्चित किया हुआ ज्ञान ही सफल होता है—अनिश्चित नहीं, क्योंकि ‘मन्ये विदितम्’ इस उक्ति से परिनिष्ठित—निश्चित विज्ञान की प्रतिज्ञा के हेतु का ही प्रतिपादन किया गया है ॥ १ ॥
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समाहितो भूत्वा विचार्य यथोक्तं सुपरिनिश्चितः सन्नागमाचार्यात्मानुभवप्रत्ययत्रयस्यैकविषयत्वेन सङ्गत्यर्थम् । एवं हि सुपरिनिष्ठिता विद्या सफला स्यान्न अनिश्चितेति न्यायः प्रदर्शितो भवति; मन्ये विदितमिति परिनिष्ठितनिश्चितविज्ञानप्रतिज्ञाहेतूक्तेः ॥ १ ॥

पद-भाष्य

कैसे विदित हुआ है सो सुनिये—
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कथमिति, शृणु—