खण्ड 2 - मन्त्र 2

नाहं[*] मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च ।
यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २ ॥

nāhaṃ[*] manye suvedeti no na vedeti veda ca .
yo nastadveda tadveda no na vedeti veda ca .. 2 ..


मैं न तो यह मानता हूँ कि ब्रह्म को अच्छी तरह जान गया और न यही समझता हूँ कि उसे नहीं जानता । इसलिये मैं उसे जानता हूँ [और नहीं भी जानता] । हम शिष्यों में से जो उसे ‘न तो नहीं जानता हूँ और न जानता ही हूँ’ इस प्रकार जानता है वही जानता है ॥ २ ॥

पद-भाष्य

मैं अच्छी तरह जानता हूँ—ऐसा नहीं मानता अर्थात् ब्रह्म को अच्छी तरह जानता हूँ—ऐसा भी मैं निश्चयपूर्वक नहीं मानता । ‘तब तो तुझे ब्रह्म विदित ही नहीं हुआ’—ऐसा कहने पर शिष्य कहता है—‘मैं नहीं जानता, सो भी बात नहीं है, जानता भी हूँ ।’ मूल के ‘वेद च’ इस पदसमूह के ‘च’ शब्द से ‘नहीं भी जानता’ ऐसा अर्थ लेना चाहिये ।

गुरु—‘मैं ब्रह्म को अच्छी तरह

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न अहं मन्ये सुवेदेति, नैवाहं मन्ये सुवेद ब्रह्मेति । नैव तर्हि विदितं त्वया ब्रह्मेत्युक्ते आह— नो न वेदेति वेद च । वेद चेति च शब्दान्न वेद च ।

ननु विप्रतिषिद्धं नाहं मन्ये

वाक्य-भाष्य

आचार्य का और अपना निश्चय समान ही है—यह दिखलाने के लिये शिष्य अपने अच्छी प्रकार निश्चित किये हुए सफल विज्ञान की प्रतिज्ञा करता है, क्योंकि ‘नाह मन्ये सुवेद’—ऐसा कहकर वह उसका हेतु बतलाता है ।

> [ * ]: [*] यहाँ ‘नाह’ ऐसा भी पाठ है, वाक्य-भाष्य इसी पाठ के अनुसार है ।

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परिनिष्ठितं सफलं विज्ञानं प्रतिजानीत आचार्यात्मनिश्चययोः तुल्यतायै यस्माद्धेतुमाह नाह मन्ये सुवेद इति ।

पद-भाष्य

जानता हूँ—ऐसा नहीं मानता’ तथा ‘मैं नहीं जानता—सो भी बात नहीं है बल्कि जानता ही हूँ’ ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है । यदि तू यह नहीं मानता कि ‘उसे अच्छी तरह जानता हूँ’ तो ऐसा कैसे समझता है कि ‘उसे जानता भी हूँ’ और यदि तू मानता है कि ‘मैं जानता ही हूँ’ तो ऐसा क्यों नहीं मानता कि ‘उसे अच्छी तरह जानता हूँ’ । संशययुक्त और विपरीत ज्ञान को छोड़कर एक वस्तु जिसके द्वारा जानी जाती है उसी से वही वस्तु अच्छी तरह नहीं जानी जाती— ऐसा कहना तो ठीक नहीं है । और ऐसा भी कोई नियम नहीं बनाया जा सकता कि ब्रह्म संशययुक्त अथवा विपरीतरूप से ही जाननेयोग्य है, क्योंकि संशय
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सुवेदेति, नो न वेदेति, वेद च इति । यदि न मन्यसे सुवेदेति, कथं मन्यसे वेद चेति । अथ मन्यसे वेदैवेति, कथं न मन्यसे सुवेदेति । एकं वस्तु येन ज्ञायते, तेनैव तदेव वस्तु न सुविज्ञायत इति विप्रतिषिद्धं संशयविपर्ययौ वर्जयित्वा । न च ब्रह्म संशयितत्वेन ज्ञेयं विपरीतत्वेन वेति नियन्तुं शक्यम् । संशय-

वाक्य-भाष्य

‘अह’ यह निश्चयार्थक निपात है । इसका यह तात्पर्य है कि मैं [ब्रह्म को अच्छी तरह जानता हूँ] ऐसा मानता ही नहीं । जबतक मुझे ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था तबतक ही मुझे ‘मैं ब्रह्म को अच्छी तरह जानता हूँ’— ऐसा विपरीत निश्चय था । आपके द्वारा [उस निश्चय से] विचलित किये जाने पर अब मेरा वह निश्चय दूर हो गया, क्योंकि वह पूर्वोक्त अर्थ की मीमांसा (विचार) के फलस्वरूप अपने आत्मा के ब्रह्मत्वनिश्चयरूप सम्यक् प्रत्यय के विरुद्ध है । अतः ‘मैं अच्छी तरह जानता हूँ’ ऐसा तो मानता ही नहीं ।
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अहेत्यवधारणार्थो निपातो नैव मन्य इत्येतत् । यावदपरिनिष्ठितं विज्ञानं तावत्सुवेद सुष्ठु वेदाहं ब्रह्मेति विपरीतो मम निश्चय आसीत् । स उपजगाम भवद्भिर्विचालितस्य; यथोक्तार्थमीमांसाफलभूतात् स्वात्मब्रह्मत्वनिश्चयरूपात्सम्यक्प्रत्ययाद्विरुद्धत्वात् । अतो नाह मन्ये सुवेदेति ।

पद-भाष्य

और विपर्यय तो सर्वत्र अनर्थकारीरूप से ही प्रसिद्ध हैं ।

आचार्यद्वारा इस प्रकार विचलित किये जाने पर भी ‘वह विदित से अन्य ही है और अविदित से भी ऊपर है’ इस आचार्य के कहे हुए शास्त्रसम्प्रदाय के बल से तथा उपपत्ति और अपने अनुभव के बल से शिष्य विचलित न हुआ; बल्कि वह ब्रह्मविद्या में अपनी दृढ़निश्चयता दिखलाते हुए गर्जने लगा । किस प्रकार गर्जने लगा, सो बतलाते हैं—ब्रह्मचारियों के सहित ‘हम शिष्यों में

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विपर्ययौ हि सर्वत्रानर्थकरत्वेनैव प्रसिद्धौ ।

एवमाचार्येण विचाल्यमानोऽपि शिष्यो न विचचाल, ‘अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि’ इत्याचार्योक्तागमसम्प्रदायबलात् उपपत्त्यनुभवबलाच्च; जगर्ज च ब्रह्मविद्यायां दृढनिश्चयतां दर्शयन्नात्मनः । कथमित्युच्यते—यो यः कश्चिद् नः अस्माकं सब्रह्मचारिणां मध्ये

वाक्य-भाष्य

तथा उस ब्रह्म को मैं नहीं जानता—ऐसा भी नहीं मानता क्योंकि अविदित ब्रह्म का प्रतिषेध किया गया है । यहाँ ‘नो न वेदेति’ इस वाक्य के आगे ‘मन्ये’ इस क्रियापद की अनुवृत्ति होती है । फिर यह पूछने पर कि ‘तुम किस प्रकार मानते हो? ’ शिष्य बोला—‘वेद च’ । यहाँ ‘च’ शब्द से ‘वेद च न वेद च’ अर्थात् जानता भी हूँ और नहीं भी जानता—
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यस्माच्चैतन्नैव न वेद नो न वेदेति मन्य इत्यनुवर्तते; अविदितब्रह्मप्रतिषेधात् । कथं तर्हि मन्यसे इत्युक्त आह—वेद च । च शब्दाद्वेद च न वेद चेत्यभिप्रायः ।

पद-भाष्य

जो-जो मेरे कहे हुए उस वचन को तत्त्वतः जानता है—वही उस ब्रह्म को जानता है ।

अच्छा तो वह वचन है क्या? ऐसा प्रश्न करने पर [शिष्य] कहता है—‘मैं नहीं जानता—ऐसा भी नहीं है, जानता भी हूँ ।’ जो बात [आचार्य ने] ‘वह विदित से अन्य ही है और अविदित से भी ऊपर है’ इस वाक्य द्वारा कही थी उसी वस्तु को अपने अनुमान और अनुभव से मिलाकर निश्चित करके आचार्य की बुद्धि को सम्यक् प्रकार से बतलाने और मन्दबुद्धियों की बुद्धि की पहुँच से बचाने के लिये एक दूसरे वाक्य से

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तन्मदुक्तं वचनं तत्त्वतो वेद, स तद्ब्रह्म वेद ।

किं पुनस्तद्वचनमित्यत आह नो न वेदेति वेद च इति । यदेव ‘अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि’ इत्युक्तम्, तदेव वस्तु अनुमानानुभवाभ्यां संयोज्य निश्चितं वाक्यान्तरेण नो न वेदेति वेद च इत्यवोचत् आचार्यबुद्धिसंवादार्थं मन्दबुद्धि

वाक्य-भाष्य

ऐसा अभिप्राय है । क्योंकि ब्रह्म विदित और अविदित—दोनों से ही भिन्न है । अतः ‘ब्रह्म मुझे विदित है—यह मानता हूँ’—यही इस वाक्य का अर्थ है ।

अथवा ‘वेद च’ इसका यह अभिप्राय है कि मैं नित्यविज्ञान-ब्रह्मस्वरूप होने के कारण ‘नहीं जानता’—ऐसी बात नहीं है बल्कि जानता ही हूँ, क्योंकि अपने स्वरूप में कोई विकार नहीं है । तथा विशेष विज्ञान भी दूसरों का आरोपित किया हुआ ही है स्वरूप से नहीं है—इसलिये परमार्थतः नहीं भी जानता ।

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विदिताविदिताभ्यामन्यत्वाद्ब्रह्मणः तस्मान्मया विदितं ब्रह्मेति मन्य इति वाक्यार्थः ।

अथवा वेद चेति नित्यविज्ञानब्रह्मस्वरूपतया नो न वेद वेदैव चाहं स्वरूपविक्रियाभावात् । विशेषविज्ञानं च पराध्यस्तं न स्वत इति परमार्थतो न च वेदेति ।

पद-भाष्य

‘मैं नहीं जानता—ऐसा भी नहीं है जानता भी हूँ’ ऐसा कहा है । ऐसा होने पर ही ‘हममें से जो इस [वाक्य के मर्म] को जानता है वही जानता है’ यह गर्जना उचित हो सकती है ॥ २ ॥
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ग्रहणव्यपोहार्थं च । तथा च गर्जितमुपपन्नं भवति ‘यो नस्तद्वेद तद्वेद’ इति ॥ २ ॥

अब शिष्य और आचार्य के संवाद से निवृत्त होकर श्रुति समस्त संवाद से सम्पन्न होनेवाले अर्थ को ही ‘यस्यामतम्’ इत्यादि अपने ही रूप से बतलाती है—
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शिष्याचार्यसंवादात्प्रतिनिवृत्य स्वेन रूपेण श्रुतिः समस्तसंवादनिर्वृत्तमर्थमेव बोधयति—यस्यामतमित्यादिना—

वाक्य-भाष्य

‘यो नस्तद्वेद तद्वेद’ यह आगम उपर्युक्त अर्थ का अनुवाद होने के कारण इससे अन्य पक्षों का निषेध करने के लिये है । हममें से जो उस ब्रह्म को इस प्रकार विदित-अविदित से भिन्न जानता है वही जानता है, और कोई नहीं; क्योंकि जैसा मैं जानता हूँ उससे अन्य प्रकार जाननेवाला तो उपास्य अर्थात् कार्य ब्रह्म को ही जाननेवाला है । ‘वेद च’ इस पद से अन्य पक्षवाले में ब्रह्मवित्त्व का निरास किया जाता है । किस कारण यह निष्कर्ष निकाला जाता है? सो बतलाते हैं । ऊपर कहे हुए अर्थ का अनुवाद करने के कारण; क्योंकि यहाँ ‘नो न वेदेति वेद च’ इस वाक्य से पूर्वोक्त का ही अनुवाद करते हैं ॥ २ ॥
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यो नस्तद्वेद तद्वेदेति पक्षान्तरनिरासार्थमाम्नाय उक्तार्थानुवादात् । यो नोऽस्माकं मध्ये स एव तद्ब्रह्म वेद नान्यः । उपास्यब्रह्मवित्त्वादतोऽन्यस्य यथाहं वेदेति । वेद चेति पक्षान्तरे ब्रह्मवित्त्वं निरस्यते । कुतोऽयमर्थोऽवसीयत इत्युच्यते । उक्तानुवादादुक्तं ह्यनुवदति नो न वेदेति वेद चेति ॥ २ ॥