खण्ड 2 - मन्त्र 3

यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः ।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥ ३ ॥

yasyāmataṃ tasya mataṃ mataṃ yasya na veda saḥ .
avijñātaṃ vijānatāṃ vijñātamavijānatām .. 3 ..


ब्रह्म जिसको ज्ञात नहीं है उसी को ज्ञात है और जिसको ज्ञात है वह उसे नहीं जानता; क्योंकि वह जाननेवालों का बिना जाना हुआ है और न जाननेवालों का जाना हुआ है [क्योंकि अन्य वस्तुओं के समान दृश्य न होने से वह विषयरूप से नहीं जाना जा सकता] ॥ ३ ॥

पद-भाष्य

जिस ब्रह्मवेत्ता का ऐसा मत—अभिप्राय अर्थात् निश्चय है कि ब्रह्म अमत—अविज्ञात यानी अविदित है उसे ब्रह्म ठीक-ठीक मत अर्थात् ज्ञात हो गया है—ऐसा इसका तात्पर्य है । और जिसे ‘मुझे ब्रह्म मत—ज्ञात अर्थात् विदित हो गया है’—ऐसा निश्चय है वह जानता ही नहीं—उसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं है ।
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यस्य ब्रह्मविदः अमतम् अविज्ञातम् अविदितं ब्रह्मेति मतम् अभिप्रायः निश्चयः, तस्य मतं ज्ञातं सम्यग्ब्रह्मेत्यभिप्रायः । यस्य पुनः मतं ज्ञातं विदितं मया ब्रह्मेति निश्चयः, न वेदैव सः—न ब्रह्म विजानाति सः ।

वाक्य-भाष्य

‘यस्यामतम्’ इत्यादि श्रुति-वचन इस आख्यायिका का उपसंहार करने के लिये है । शिष्य और आचार्य की उक्ति-प्रत्युक्ति ही जिसका लक्षण है ऐसी इस अनुभव और युक्तिप्रधान आख्यायिका से जो अर्थ सिद्ध हुआ है वह सबका उपसंहार करनेवाले इस शास्त्रप्रधान श्रौतवचन से संक्षेप में कहा
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यस्यामतम् इति श्रौतम् आख्यायिकार्थोपसंहारार्थम् शिष्याचार्योक्तिप्रत्युक्तिलक्षणया अनुभवयुक्तिप्रधानया आख्यायिकया योऽर्थः सिद्धः स श्रौतेन वचनेनागमप्रधानेन निगमनस्थानीयेन संक्षेपत उच्यते । यदुक्तं

पद-भाष्य

अब ‘अविज्ञातं विजानताम्’ ऐसा कहकर विद्वान् और अविद्वान् के उपर्युक्त पक्षों का अवधारण (निश्चय) करते हैं—जाननेवालों अर्थात् भली प्रकार समझनेवालों को वह ब्रह्म अविज्ञात—अमत यानी अविदित (अज्ञेय) ही है; तात्पर्य
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विद्वदविदुषोर्यथोक्तौ पक्षौ अवधारयति—अविज्ञातं विजानतामिति, अविज्ञातम् अमतम् अविदितमेव ब्रह्म विजानतां सम्यग्विदितवतामित्येतत् । विज्ञातं विदितं ब्रह्म अविजानताम्,

वाक्य-भाष्य

जाता है! जिसे वागादि इन्द्रियों का अविषय होने के कारण जाने हुए पदार्थों से भिन्न बतलाया था तथा अनुभव और उपपत्ति से भी जिसकी मीमांसा की थी उस ब्रह्म को वैसा ही जानना चाहिये ।

किस कारण से? [सो बतलाते हैं—] जिज्ञासा से प्रेरित होकर प्रवृत्त हुए जिस साधक को ब्रह्म अविज्ञात—अविदित है अर्थात् आत्मतत्त्व-निश्चयरूप फल में पर्यवसित होनेवाले ज्ञानरूप से जिसकी जिज्ञासा निवृत्त हो गयी है उसी को वह विदित—ज्ञात है । तात्पर्य यह कि जिसने ब्रह्म को अविषयरूप से आत्मभाव से जाना है उसीने उसे जाना है । जिसे विज्ञान की प्राप्ति के अनन्तर ही सब ओर ब्रह्मात्मभाव की प्राप्ति हो जाने के कारण कर्तव्य का अभाव हो जाता है वही सम्यग्दर्शी है । इससे विपरीत समझनेवाला मिथ्या ज्ञानी होता है । कैसे?

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विदितादन्यद्रागादीनामगोचरत्वात् मीमांसितं चानुभवोपपत्तिभ्यां ब्रह्म तत्तथैव ज्ञातव्यम् ।

कस्मात्? यस्यामतं यस्य विविदिषाप्रयुक्तप्रवृत्तस्य साधकस्य अमतमविज्ञातमविदितं ब्रह्म इत्यात्मतत्त्वनिश्चयफलावसानावबोधतया विविदिषा निवृत्ता इत्यभिप्रायः; तस्य मतं ज्ञातं तेन विदितं ब्रह्म । येनाविषयत्वेन आत्मत्वेन प्रतिबुद्धमित्यर्थः । स सम्यग्दर्शी यस्य विज्ञानानन्तरमेव ब्रह्मात्मभावस्यावसितत्वात् सर्वतः कार्याभावो विपर्ययेण मिथ्याज्ञानो भवति कथम्? मतं विदितं ज्ञातं मया ब्रह्मेति यस्य

पद-भाष्य

यह है कि इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि में आत्मभाव करनेवाले असम्यग्दर्शी अज्ञानियों के लिये ब्रह्म विज्ञात यानी विदित (ज्ञेय) ही है ।[ * ] हाँ, जिनकी बुद्धि अत्यन्त अव्युत्पन्न (अकुशल) है उनके लिये ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उन्हें तो ‘हमने ब्रह्म को जान लिया है’ ऐसी
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असम्यग्दर्शिनाम्, इन्द्रियमनोबुद्धिष्वेवात्मदर्शिनामित्यर्थः; न त्वत्यन्तमेवाव्युत्पन्नबुद्धीनाम् । न हि तेषां विज्ञातम् अस्माभिर्ब्रह्मेति मतिर्भवति ।

वाक्य-भाष्य

[सो कहते हैं—] जिसका ऐसा विज्ञान है कि ब्रह्म मुझे विदित—ज्ञात अर्थात् मालूम है वह विपरीत विज्ञानवान् मिथ्यादर्शी है, क्योंकि ब्रह्म विदित से भिन्न है; इसलिये वह ब्रह्म को नहीं जानता—नहीं समझता ।

इन कारणों से अवैदिक विज्ञान का मिथ्यात्व सिद्ध हुआ, क्योंकि वह ब्रह्मविषयक न होने से निन्दित है । यही नहीं, कपिल और कणाद आदि के सिद्धान्त भी ज्ञातब्रह्मविषयक, अनवस्थिततर्कजनित और जिज्ञासा की निवृत्ति न करनेवाले होने से मिथ्या ही हैं । ‘जो वेदबाह्य स्मृतियाँ हैं तथा और भी जो कोई कुविचार हैं वे सभी निष्फल कहे गये हैं

[ * ]: [*] इस वाक्य का तात्पर्य यह है कि ‘जिन्हें ब्रह्म के स्वरूप का यथार्थ बोध हो गया है वे तो उसे मन-बुद्धि आदि से अग्राह्य होने के कारण अज्ञात यानी अज्ञेय ही मानते हैं । और जो अज्ञानी हैं वे मन-बुद्धि आदि को ही आत्मा समझने के कारण ब्रह्म का उनके साथ अभेद समझकर यह मानने लगते हैं कि हमने उसे जान लिया है ।’

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विज्ञानं स मिथ्यादर्शी विपरीतविज्ञानो विदितादन्यत्वाद्ब्रह्मणो न वेद स न विजानाति ।

ततश्च सिद्धमवैदिकस्य विज्ञानस्य मिथ्यात्वम्, अब्रह्मविषयतया निन्दितत्वात्तथा कपिलकणभुगादिसमयस्यापि विदितब्रह्मविषयत्वादनवस्थिततर्कजन्यत्वाद्विविदिषानिवृत्तेश्च मिथ्यात्वमिति । स्मृतेश्च ‘या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाः

पद-भाष्य

बुद्धि ही नहीं होती । किन्तु जो लोग इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि उपाधियों में आत्मभाव करनेवाले हैं उन्हें तो, ब्रह्म और उपाधि के पार्थक्य का ज्ञान न होने तथा बुद्धि आदि उपाधि के ज्ञातरूप होने से ‘ब्रह्म विदित है’ ऐसी भ्रान्ति होनी
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इन्द्रियमनोबुद्ध्युपाधिष्वात्मदर्शिनां तु ब्रह्मोपाधिविवेकानुपलम्भात्, बुद्ध्याद्युपाधेश्च विज्ञातत्वाद् विदितं ब्रह्मेत्युपपद्यते भ्रान्तिरित्यतोऽसम्यग्

वाक्य-भाष्य

और सब-के-सब अज्ञाननिष्ठ ही माने गये हैं’ इस स्मृतिवाक्य से भी विपरीत ज्ञान और मिथ्याज्ञान को नष्ट बतलाया गया है ।

‘अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्’ यह मन्त्र के पूर्वार्ध में कहे हुए अर्थ का हेतु-कथन है, क्योंकि उसी का अनुवाद करना तो व्यर्थ होगा । अनुवादमात्र के लिये कोई बात कहना कुछ अर्थ नहीं रखता, इसलिये ‘यस्यामतम्’ इत्यादि पूर्व पद से कहे हुए ज्ञान और अज्ञान के हेतुरूप से ही यह कहा गया है ।

क्योंकि विज्ञानियों को ब्रह्म आत्मस्वरूप होने के कारण इन्द्रियों का विषय न होने से अविज्ञात—अविदित है, इसलिये वही ज्ञान है । और जो अज्ञानी हैं, जो ऐसा नहीं जानते कि ज्ञात और अज्ञात पदार्थों से रहित अपना आत्मा, नित्यविज्ञानस्वरूप, आत्मस्थ, अविक्रिय, अमृत, अजर,

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प्रोक्तास्तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः’ (मनु० १२ । ९५) इति विपरीतमिथ्याज्ञानयोर्नष्टत्वादिति ।

अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानतामिति पूर्वहेतूक्तिरनुवादस्यानर्थक्यात् । अनुवादमात्रेऽनर्थकं वचनमिति पूर्वोक्तयोर्यस्यामतमित्यादिना ज्ञानाज्ञानयोर्हेत्वर्थत्वेनेदमुच्यते ।

अविज्ञातमविदितमात्मत्वेन अविषयतया ब्रह्म विजानतां यस्मात् तस्मात्तदेव ज्ञानम् । यत्तेषां विज्ञातं विदितं व्यक्तमेव बुद्ध्यादिविषयं ब्रह्माविजानतां विदिताविदितव्यावृत्तमात्मभूतं नित्यविज्ञानस्वरूपमात्मस्थमविक्रियममृतमजर

पद-भाष्य

उचित ही है । अतः यहाँ ‘विज्ञातमविजानताम्’ इस वाक्य द्वारा असम्यग्दर्शन का पूर्वपक्षरूप से उल्लेख किया गया है । अथवा ‘अविज्ञातं विजानताम्’ इत्यादि जो मन्त्र का उत्तरार्ध है वह[ * ] हेतु-अर्थ में है ॥ ३ ॥
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दर्शनं पूर्वपक्षत्वेनोपन्यस्यते—विज्ञातमविजानतामिति । अथवा हेत्वर्थ उत्तरार्धोऽविज्ञातमत्यादिः ॥ ३ ॥

पद-भाष्य

‘ब्रह्म जाननेवालों को अविज्ञात है’ ऐसा निश्चय हुआ । इस प्रकार यदि ब्रह्म अत्यन्त अविज्ञात ही है तो लौकिक पुरुष और ब्रह्मवेत्ताओं में कोई भेद नहीं रह जाता;
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‘अविज्ञातं विजानताम्’ इत्यवधृतम् । यदि ब्रह्मात्यन्तम् एवाविज्ञातम्, लौकिकानां ब्रह्मविदां चाविशेषः प्राप्तः ।

वाक्य-भाष्य

अभय और अनन्यरूप होने के कारण ब्रह्म किसी इन्द्रिय का विषय नहीं है—उन्हींको ब्रह्म विज्ञात—विदित—व्यक्त अर्थात् बुद्धि आदि के विषयरूप से ही प्रतीत होता है, उन्हें सर्वदा बुद्धि आदि के विषयरूप से ही ब्रह्म का ज्ञान है । अतः विदित-अविदित अथवा व्यक्त-अव्यक्त आदि धर्मों के आरोप से [उनका जाना हुआ ब्रह्म] कार्यकारणभाव रहने से सविकल्प ही है; क्योंकि वह अयथार्थविषयक है । उनका वह ज्ञान शुक्ति आदि में आरोपित रजत आदि ज्ञानों के समान मिथ्या ही है ॥ ३ ॥

[ * ]: [*] हेतु यों समझना चाहिये—ब्रह्म अज्ञानियों को इसलिये ज्ञात है, क्योंकि विज्ञानियों को वह अज्ञात है ।

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मभयमनन्यत्वादविषयमित्येवम् अविजानतां बुद्ध्यादिविषयात्मतयैव नित्यं विज्ञातं ब्रह्म । तस्माद्विदिताविदितव्यक्ताव्यक्तधर्माध्यारोपेण कार्यकारणभावेन स्वविकल्पमयथार्थविषयत्वात् । शुक्तिकादौ रजताद्यध्यारोपणज्ञानवन्मिथ्याज्ञानं तेषाम् ॥ ३ ॥

पद-भाष्य

इसके सिवा ‘जाननेवालों को अविज्ञात है’ यह कथन परस्पर विरुद्ध भी है । फिर वह ब्रह्म सम्यक् प्रकार से कैसे जाना जाता है—यही बात बतलाने के लिये कहते हैं-
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‘अविज्ञातं विजानताम्’ इति च परस्परविरुद्धम् । कथं तु तद्ब्रह्म सम्यग्विदितं भवतीत्येवमर्थमाह-