अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥ ३ ॥
yasyāmataṃ tasya mataṃ mataṃ yasya na veda saḥ .
avijñātaṃ vijānatāṃ vijñātamavijānatām .. 3 ..
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जाता है! जिसे वागादि इन्द्रियों का अविषय होने के कारण जाने हुए पदार्थों से भिन्न बतलाया था तथा अनुभव और उपपत्ति से भी जिसकी मीमांसा की थी उस ब्रह्म को वैसा ही जानना चाहिये ।
किस कारण से? [सो बतलाते हैं—] जिज्ञासा से प्रेरित होकर प्रवृत्त हुए जिस साधक को ब्रह्म अविज्ञात—अविदित है अर्थात् आत्मतत्त्व-निश्चयरूप फल में पर्यवसित होनेवाले ज्ञानरूप से जिसकी जिज्ञासा निवृत्त हो गयी है उसी को वह विदित—ज्ञात है । तात्पर्य यह कि जिसने ब्रह्म को अविषयरूप से आत्मभाव से जाना है उसीने उसे जाना है । जिसे विज्ञान की प्राप्ति के अनन्तर ही सब ओर ब्रह्मात्मभाव की प्राप्ति हो जाने के कारण कर्तव्य का अभाव हो जाता है वही सम्यग्दर्शी है । इससे विपरीत समझनेवाला मिथ्या ज्ञानी होता है । कैसे?
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विदितादन्यद्रागादीनामगोचरत्वात् मीमांसितं चानुभवोपपत्तिभ्यां ब्रह्म तत्तथैव ज्ञातव्यम् ।
कस्मात्? यस्यामतं यस्य विविदिषाप्रयुक्तप्रवृत्तस्य साधकस्य अमतमविज्ञातमविदितं ब्रह्म इत्यात्मतत्त्वनिश्चयफलावसानावबोधतया विविदिषा निवृत्ता इत्यभिप्रायः; तस्य मतं ज्ञातं तेन विदितं ब्रह्म । येनाविषयत्वेन आत्मत्वेन प्रतिबुद्धमित्यर्थः । स सम्यग्दर्शी यस्य विज्ञानानन्तरमेव ब्रह्मात्मभावस्यावसितत्वात् सर्वतः कार्याभावो विपर्ययेण मिथ्याज्ञानो भवति कथम्? मतं विदितं ज्ञातं मया ब्रह्मेति यस्य
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[सो कहते हैं—] जिसका ऐसा विज्ञान है कि ब्रह्म मुझे विदित—ज्ञात अर्थात् मालूम है वह विपरीत विज्ञानवान् मिथ्यादर्शी है, क्योंकि ब्रह्म विदित से भिन्न है; इसलिये वह ब्रह्म को नहीं जानता—नहीं समझता ।
इन कारणों से अवैदिक विज्ञान का मिथ्यात्व सिद्ध हुआ, क्योंकि वह ब्रह्मविषयक न होने से निन्दित है । यही नहीं, कपिल और कणाद आदि के सिद्धान्त भी ज्ञातब्रह्मविषयक, अनवस्थिततर्कजनित और जिज्ञासा की निवृत्ति न करनेवाले होने से मिथ्या ही हैं । ‘जो वेदबाह्य स्मृतियाँ हैं तथा और भी जो कोई कुविचार हैं वे सभी निष्फल कहे गये हैं
[ * ]: [*] इस वाक्य का तात्पर्य यह है कि ‘जिन्हें ब्रह्म के स्वरूप का यथार्थ बोध हो गया है वे तो उसे मन-बुद्धि आदि से अग्राह्य होने के कारण अज्ञात यानी अज्ञेय ही मानते हैं । और जो अज्ञानी हैं वे मन-बुद्धि आदि को ही आत्मा समझने के कारण ब्रह्म का उनके साथ अभेद समझकर यह मानने लगते हैं कि हमने उसे जान लिया है ।’
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विज्ञानं स मिथ्यादर्शी विपरीतविज्ञानो विदितादन्यत्वाद्ब्रह्मणो न वेद स न विजानाति ।
ततश्च सिद्धमवैदिकस्य विज्ञानस्य मिथ्यात्वम्, अब्रह्मविषयतया निन्दितत्वात्तथा कपिलकणभुगादिसमयस्यापि विदितब्रह्मविषयत्वादनवस्थिततर्कजन्यत्वाद्विविदिषानिवृत्तेश्च मिथ्यात्वमिति । स्मृतेश्च ‘या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाः
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और सब-के-सब अज्ञाननिष्ठ ही माने गये हैं’ इस स्मृतिवाक्य से भी विपरीत ज्ञान और मिथ्याज्ञान को नष्ट बतलाया गया है ।
‘अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्’ यह मन्त्र के पूर्वार्ध में कहे हुए अर्थ का हेतु-कथन है, क्योंकि उसी का अनुवाद करना तो व्यर्थ होगा । अनुवादमात्र के लिये कोई बात कहना कुछ अर्थ नहीं रखता, इसलिये ‘यस्यामतम्’ इत्यादि पूर्व पद से कहे हुए ज्ञान और अज्ञान के हेतुरूप से ही यह कहा गया है ।
क्योंकि विज्ञानियों को ब्रह्म आत्मस्वरूप होने के कारण इन्द्रियों का विषय न होने से अविज्ञात—अविदित है, इसलिये वही ज्ञान है । और जो अज्ञानी हैं, जो ऐसा नहीं जानते कि ज्ञात और अज्ञात पदार्थों से रहित अपना आत्मा, नित्यविज्ञानस्वरूप, आत्मस्थ, अविक्रिय, अमृत, अजर,
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प्रोक्तास्तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः’ (मनु० १२ । ९५) इति विपरीतमिथ्याज्ञानयोर्नष्टत्वादिति ।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानतामिति पूर्वहेतूक्तिरनुवादस्यानर्थक्यात् । अनुवादमात्रेऽनर्थकं वचनमिति पूर्वोक्तयोर्यस्यामतमित्यादिना ज्ञानाज्ञानयोर्हेत्वर्थत्वेनेदमुच्यते ।
अविज्ञातमविदितमात्मत्वेन अविषयतया ब्रह्म विजानतां यस्मात् तस्मात्तदेव ज्ञानम् । यत्तेषां विज्ञातं विदितं व्यक्तमेव बुद्ध्यादिविषयं ब्रह्माविजानतां विदिताविदितव्यावृत्तमात्मभूतं नित्यविज्ञानस्वरूपमात्मस्थमविक्रियममृतमजर
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अभय और अनन्यरूप होने के कारण ब्रह्म किसी इन्द्रिय का विषय नहीं है—उन्हींको ब्रह्म विज्ञात—विदित—व्यक्त अर्थात् बुद्धि आदि के विषयरूप से ही प्रतीत होता है, उन्हें सर्वदा बुद्धि आदि के विषयरूप से ही ब्रह्म का ज्ञान है । अतः विदित-अविदित अथवा व्यक्त-अव्यक्त आदि धर्मों के आरोप से [उनका जाना हुआ ब्रह्म] कार्यकारणभाव रहने से सविकल्प ही है; क्योंकि वह अयथार्थविषयक है । उनका वह ज्ञान शुक्ति आदि में आरोपित रजत आदि ज्ञानों के समान मिथ्या ही है ॥ ३ ॥
[ * ]: [*] हेतु यों समझना चाहिये—ब्रह्म अज्ञानियों को इसलिये ज्ञात है, क्योंकि विज्ञानियों को वह अज्ञात है ।