आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ ४ ॥
pratibodhaviditaṃ matamamṛtatvaṃ hi vindate .
ātmanā vindate vīryaṃ vidyayā vindate’mṛtam .. 4 ..
पद-भाष्य
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वाक्य-भाष्य
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पद-भाष्य
का साक्षी और चिच्छक्तिस्वरूपमात्र होने के कारण वह प्रतीतियों द्वारा सामान्यरूप से प्रतीतियों में ही लक्षित होता है । उस अन्तरात्मा का ज्ञान प्राप्त करने के लिये कोई और मार्ग नहीं है ।
अतः जिस समय ब्रह्म को प्रतीतियों के अन्तःसाक्षीस्वरूप से जाना जाता है उसी समय वह ज्ञात होता है; अर्थात् यही उसका सम्यक् ज्ञान है । सम्पूर्ण प्रतीतियों का साक्षी होने पर ही उसका वृद्धिक्षयशून्य साक्षित्व, नित्यत्व, विशुद्धस्वरूपत्व, आत्मत्व, निर्विशेषत्व और सम्पूर्ण भूतों में [अनुस्यूत] एकत्व सिद्ध
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दर्शी चिच्छक्तिस्वरूपमात्रः प्रत्ययैरेव प्रत्ययेष्वविशिष्टतया लक्ष्यते; नान्यद्द्वारमन्तरात्मनो विज्ञानाय ।
अतः प्रत्ययप्रत्यगात्मतया प्रत्ययसाक्षितया विदितं ब्रह्म यदा, ब्रह्मणोऽभेदप्रतिपादनम् तदा तन्मतं तत् सम्यग्दर्शनमित्यर्थः सर्वप्रत्ययदर्शित्वे चोपजननापायवर्जितदृक्स्वरूपता नित्यत्वं विशुद्धस्वरूपत्वमात्मत्वं निर्विशेषतैकत्वं च सर्वभूतेषु सिद्धं
वाक्य-भाष्य
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पद-भाष्य
हो सकता है, जिस प्रकार कि लक्षणों में भेद न होने के कारण घट, पर्वत और गुहादि में आकाश का अभेद है । इस प्रकार ‘ब्रह्म विदित और अविदित—दोनों ही से भिन्न है’ इस शास्त्रवचन के अर्थ का ही भली प्रकार शोधन करके यहाँ उपसंहार किया गया है । इसके सिवा ‘वह दृष्टि का द्रष्टा है, श्रवण का श्रोता है, मति का मनन करनेवाला है और विज्ञाति का विज्ञाता है’ ऐसी एक दूसरी श्रुति भी है । [उससे भी यही सिद्ध होता है ।]
जिस प्रकार, जो वृक्ष की शाखाओं को चलायमान करता है उसे वायु कहते हैं उसी प्रकार—जिस समय ‘प्रतिबोधविदितम्’
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भवेत्; लक्षणभेदाभावाद्योम्न इव घटगिरिगुहादिषु । विदिताविदिताभ्यामन्यद्ब्रह्मेत्यागमवाक्यार्थ एवं परिशुद्ध एवोपसंहृतो भवति । ‘दृष्टेर्द्रष्टा श्रुतेः श्रोता मतेर्मन्ता विज्ञातेर्विज्ञाता’ इति हि श्रुत्यन्तरम् ।
यदा पुनर्बोधक्रियाकर्तेति बोधक्रियालक्षणेन तत्कर्तारं विजानातीति बोधलक्षणेन विदितं प्रति
वाक्य-भाष्य
स्वरूप से जाना जाता है वही ब्रह्म है, वही माना हुआ अर्थात् ज्ञात है तथा वही सम्यग्ज्ञान के सहित प्रत्यगात्मा का ज्ञान है; विषयज्ञान सम्यग्ज्ञान नहीं है ।
‘प्रत्यगात्मा को आत्मस्वरूप से देखा’ ऐसा कठोपनिषद् में कहा है । ‘अमृतत्वं हि विन्दते’ (आत्म-ज्ञान से अमरत्व ही प्राप्त होता है) यह हेतुसूचक वाक्य है, क्योंकि इससे विपरीत ज्ञान से मृत्यु की प्राप्ति होती है । बुद्धि आदि विषयों में आत्मत्व बोध होने से ही
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तया यद्विदितं तद्ब्रह्म तदेव मतं ज्ञातं तदेव सम्यग्ज्ञानवत्प्रत्यगात्मविज्ञानम्, न विषयविज्ञानम् ।
आत्मत्वेन प्रत्यगात्मानमैक्षदिति च काठके । आत्मज्ञानममृतत्वनिमित्तम् ‘अमृतत्वं हि विन्दते’ इति हेतुवचनम्; विपर्यये मृत्युप्राप्तेः । विषयात्मविज्ञाने हि मृत्युः प्रारभत ।
पद-भाष्य
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वाक्य-भाष्य
मृत्यु का आरम्भ होता है, अतः आत्मविज्ञान अमरत्व का हेतु है; इसलिये ‘अमृतत्वं हि विन्दते’ यह हेतुवचन ठीक ही है ।
पूर्व०—क्या आत्मज्ञान से अमरत्व उत्पन्न किया जाता है?
सिद्धान्ती—नहीं ।
पूर्व०—तब कैसे?
सिद्धान्ती—अमरत्व तो आत्मा से— अपने नित्यात्मस्वभाव से ही प्राप्त करते हैं, किसी के आश्रय से नहीं । ‘विन्दते’ इससे यह समझना चाहिये कि उसकी
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इत्यात्मविज्ञानममृतत्वनिमित्तम् इति युक्तं हेतुवचनममृतत्वं हि विन्दत इति ।
आत्मज्ञानेन किममृतत्वमुत्पाद्यते?
न ।
कथं तर्हि?
आत्मना विन्दते स्वेनैव नित्यात्मस्वभावेनामृतत्वं विन्दते । नालम्बनपूर्वकम् । विन्दत इति
पद-भाष्य
जाता है तो वह निर्विशेष द्रव्यमात्र रह जाता है । ऐसा मानने से तो वह विकारी, सावयव, अनित्य और अशुद्ध निश्चित होता है, और उसके इन दोषों का किसी प्रकार परिहार नहीं किया जा सकता ।
तथा वैशेषिक मतावलम्बियों का जो मत है कि आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होनेवाला बोध आत्मा में समवायसम्बन्ध से रहता है, इसीसे आत्मा में बोद्धृत्व है, वस्तुतः आत्मा विकारी नहीं है, वह तो नील-पीतादि वर्णों के समवायी घट के समान केवल द्रव्यमात्र है—सो इस पक्ष में भी ब्रह्म अचेतन द्रव्यमात्र सिद्ध होता है और ‘ब्रह्म विज्ञान एवं आनन्दस्वरूप है’
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तत्रैवं सति विक्रियात्मकः सावयवोऽनित्योऽशुद्ध इत्यादयो दोषा न परिहर्तुं शक्यन्ते ।
यदपि काणादानाम् आत्मकाणादमत- मनःसंयोगजो बोध समीक्षा आत्मनि समवैति; अत आत्मनि बोद्धृत्वम्, न तु विक्रियात्मक आत्मा; द्रव्यमात्रस्तु भवति घट इव रागसमवायी; अस्मिन् पक्षेऽप्यचेतनं द्रव्यमात्रं ब्रह्मेति ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ (बृ० उ० ३ । ९ । २८)
वाक्य-भाष्य
प्राप्ति आत्मविज्ञान की अपेक्षा रखनेवाली है । यदि अमृतत्व विद्या से उत्पन्न किया जानेयोग्य होता तो कर्मफल के समान अनित्य हो जाता । इसलिये वह विद्या से उत्पाद्य नहीं है ।
यदि कहो कि जब अमृतत्व स्वतः ही मिल जाता है तो विद्या उसमें क्या करती है, तो इसमें हमें यह कहना है कि वह अनात्मविज्ञान को निवृत्त करती हुई उसकी निवृत्ति के द्वारा
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आत्मविज्ञानापेक्षम् । यदि हि विद्योत्पाद्यममृतत्वं स्यादनित्यं भवेत्कर्मकार्यवत् । अतो न विद्योत्पाद्यम् ।
यदि चात्मनैवामृतत्वं विन्दते किं पुनर्विद्यया क्रियत इत्युच्यते । अनात्मविज्ञानं निवर्तयन्ती सा तन्निवृत्त्या
पद-भाष्य
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वाक्य-भाष्य
स्वाभाविक अमृतत्व की हेतु बनती है, क्योंकि [अगले वाक्य से] ‘विद्या से [अज्ञानान्धकार को निवृत्त करने का] सामर्थ्य प्राप्त होता है’ ऐसा कहा भी है ।
विद्या से वीर्य—सामर्थ्य यानी अनात्मा के अध्यारोप तथा माया और
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स्वाभाविकस्यामृतत्वस्य निमित्तमिति कल्प्यते । यत आह ‘वीर्यं विद्यया विन्दते ।’
वीर्यं सामर्थ्यमनात्माध्यारोपमायास्वान्तध्वान्तानभिभाव्य
पद-भाष्य
मय आत्मा ही ब्रह्म है—यह अर्थ आत्मा के सम्पूर्ण बोधों के बोद्धा होनेपर ही सिद्ध हो सकता है, और किसी प्रकार नहीं । इसलिये ‘प्रतिबोधविदितम्’ इसका—हमने जैसी व्याख्या की है—वही अर्थ है ।
इसके सिवा ‘प्रतिबोधविदितम्’ इस वाक्य का जो स्वप्रकाशता अर्थ बतलाया जाता है वहाँ आत्मा को सोपाधिक मानकर उसमें बुद्धि आदि उपाधि के रूप से भेद की कल्पनाकर आत्मा से आत्मा को जानता है’ ऐसा व्यवहार हुआ करता है, जैसा कि ‘आत्मा में ही आत्मा को देखता है’ ‘हे पुरुषोत्तम! तुम स्वयं अपने से ही अपने को जानते हो’ इत्यादि वाक्यों द्वारा कहा गया है । किन्तु निरुपाधिक आत्मा के तो एक रूप होने के कारण उसमें स्वसंवेद्यता अथवा परसंवेद्यता सम्भव ही नहीं है ।
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ज्योतिरात्मा ब्रह्मेत्ययमर्थः सर्वबोधबोद्धृत्वे आत्मनः सिध्यति, नान्यथा । तस्मात् ‘प्रतिबोधविदितं मतम्’ इति यथाव्याख्यात एवार्थोऽस्माभिः ।
यत्पुनः स्वसंवेद्यता प्रतिबोधब्रह्मणः स्वपर- विदितमित्यस्य वाक्यसंवेद्यताया स्यार्थो वर्ण्यते, तत्र औपाधिकत्वम् भवति सोपाधिकत्वे आत्मनो बुद्ध्युपाधिस्वरूपत्वेन भेदं परिकल्प्यात्मनात्मानं वेत्तीति संव्यवहारः — ‘आत्मन्येवात्मानं पश्यति’ (बृ० उ० ४ । ४ । २३) ‘स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम’ (गीता १० । १५) इति । न तु निरुपाधिकस्यात्मन एकत्वे स्वसंवेद्यता परसंवेद्यता वा सम्भवति । संवेदनस्वरूप
वाक्य-भाष्य
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लक्षणं बलं विद्यया विन्दते । तच्च
किं विशिष्टम्? अमृतमविनाशि ।
अविद्याजं हि वीर्यं विनाशि ।
पद-भाष्य
जिस प्रकार प्रकाश को किसी अन्य प्रकाश की अपेक्षा होना सम्भव नहीं है उसी प्रकार ज्ञानस्वरूप होने के कारण उसे [अपने ज्ञान के लिये] किसी अन्य ज्ञान की अपेक्षा नहीं है ।
तथा बौद्धमतानुसार तो विज्ञान की स्वसंवेद्यता स्वीकार करनेपर भी उसकी क्षणभंगुरता और निरात्मकता सिद्ध होने लगेगी । [ऐसा होनेपर] ‘अविनाशी होने के कारण विज्ञाता की विज्ञाति का लोप नहीं होता’ ‘नित्य, विभु और सर्वगत है’ ‘वह यह महान् अज आत्मा अजर, अमर, अमृत और अभयरूप है’ इत्यादि श्रुतियाँ बाधित हो जायँगी ।
इसके सिवा जो लोग प्रतिबोधशब्द से, जैसा कि सुषुप्त पुरुष को होता है वह निर्निमित्त बोध ही प्रतिबोध है—ऐसे अर्थ की कल्पना करते हैं अथवा जो दूसरे लोग [मुक्ति के कारणभूत] एक बार होनेवाले विज्ञान को ही प्रतिबोध
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त्वात्संवेदनान्तरापेक्षा च न सम्भवति, यथा प्रकाशस्य प्रकाशान्तरापेक्षाया न सम्भवः तद्वत् ।
बौद्धपक्षे स्वसंवेद्यतायां तु क्षणभङ्गुरत्वं निरात्मकत्वं च विज्ञानस्य स्यात्; ‘न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्’ (बृ० उ० ४ । ३ । ३०) ‘नित्यं विभुं सर्वगतम्’ (मु० उ० १ । १ । ६) ‘सा वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽभयः’ (बृ० उ० ४ । ४ । २५) इत्याद्याः श्रुतयो बाध्येरन् ।
यत्पुनः प्रतिबोधशब्देन प्रतिबोधार्थविचारः निर्निमित्तो बोधः प्रतिबोधः यथा सुप्तस्य इत्यर्थ परिकल्पयन्ति, सकृद्विज्ञानं प्रतिबोध इत्यपरे;
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पद-भाष्य
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वाक्य-भाष्य
लोक में भी विद्याजनित बल ही दूसरे बलों का पराभव करता है, शरीर आदि का बल नहीं; जैसे हाथी-घोड़े आदि के शारीरिक बल [मनुष्य के] विद्याजनित बल को नहीं दबा सकते ।
अथवा ‘प्रतिबोधविदितं मतम्’ इस
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लोकेऽपि विद्याजमेव बलमभिभवति न शरीरादिसामर्थ्यं यथा हस्त्यादेः ।
अथवा प्रतिबोधविदितं मतमिति
पद-भाष्य
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वाक्य-भाष्य
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सकृदेवाशेषविपरीतनिरस्तसंस्कारेण स्वप्नप्रतिबोधवद्यद्विदितं तदेव मतं ज्ञातं भवतीति ।
अथवा गुरूपदेशः प्रतिबोधस्तेन वा विदितं मतमिति । उभयत्र
पद-भाष्य
ही प्राप्त करता है, इसलिये आत्मसम्बन्धिनी विद्या से ही अमरत्व प्राप्त करता है । अथर्ववेदीय (मुण्डक) उपनिषद् में कहा है—‘यह आत्मा बलहीन पुरुष को प्राप्त होनेयोग्य नहीं है’ । अतः यह आत्मविद्यारूप हेतु [मृत्यु का निवारण करने में] समर्थ है क्योंकि इससे अमरत्व प्राप्त करता है ॥ ४ ॥
जिनमें सांसारिक दुःखों की बहुलता है उन देवता, मनुष्य, तिर्यक् और प्रेतादि प्राणियों में अज्ञानवश जन्म, जरा, मरण और रोगादि की प्राप्ति होना निश्चय ही बड़े दुःख की बात है । अतः—
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विन्दतेऽमृतम् अमृतत्वम् । ‘नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः’ (मु० उ० ३ । २ । ४) इत्याथर्वणे । अतः समर्थो हेतुः अमृतत्वं हि विन्दत इति ॥ ४ ॥
कष्टा खलु सुरनरतिर्यक्प्रेतादिषु संसारदुःखबहुलेषु प्राणिनिकायेषु जन्मजरामरणरोगादिसम्प्राप्तिरज्ञानात् । अतः—