खण्ड 2 - मन्त्र 5

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः ।
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ ५ ॥

iha cedavedīdatha satyamasti na cedihāvedīnmahatī vinaṣṭiḥ .
bhūteṣu bhūteṣu vicitya dhīrāḥ pretyāsmāllokādamṛtā bhavanti .. 5 ..


यदि इस जन्म में ब्रह्म को जान लिया तब तो ठीक है और यदि उसे इस जन्म में न जाना तब तो बड़ी भारी हानि है । बुद्धिमान् लोग उसे समस्त प्राणियों में उपलब्ध करके इस लोक से जाकर (मरकर) अमर हो जाते हैं ॥ ५ ॥

वाक्य-भाष्य

प्रतिबोधित—दोनों ही जगह ‘प्रतिबोध’ शब्द का प्रयोग होता है । परन्तु इन तीनों में सबसे पहला अर्थ ही ठीक है ॥ ४ ॥
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प्रतिबोधशब्दप्रयोगोऽस्ति सुप्तप्रतिबुद्धो गुरुणा प्रतिबोधित इति । पूर्वं तु यथार्थम् ॥ ४ ॥

पद-भाष्य

यदि किसी अधिकारी पुरुष ने सामर्थ्य लाभ कर इस लोक में ही उपर्युक्त लक्षणों से युक्त आत्मा को पूर्वोक्त प्रकार से जान लिया, तब तो उसके इस मनुष्यजन्म में सत्य—अविनाशिता—सार्थकता—सद्भाव अथवा परमार्थता विद्यमान है । और यदि न जाना अर्थात् इस लोक में जीवित रहते हुए ही उस अधिकारी ने आत्मज्ञान प्राप्त न किया तो उसे महान्—दीर्घ यानी अनन्त विनाश अर्थात् जन्म, जरा और मरण आदि की परम्परा का विच्छेद न होनारूप संसारगति की ही प्राप्ति होती है ।
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इह एव चेत् मनुष्योऽधिकृतः समर्थः सन् यदि अवेदीद् आत्मानं यथोक्तलक्षणं विदितवान् यथोक्तेन प्रकारेण, अथ तदा अस्ति सत्यं मनुष्यजन्मन्यस्मिन्नविनाशोऽर्थवत्ता वा सद्भावो वा परमार्थता वा सत्यं विद्यते । न चेदिहावेदीदिति, न चेद् इह जीवंश्चेद् अधिकृतः अवेदीत् न विदितवान्; तदा महती दीर्घा अनन्ता विनष्टिः विनाशनं जन्मजरामरणादिप्रबन्धाविच्छेदलक्षणा संसारगतिः ।

वाक्य-भाष्य

‘इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति’ यह श्रुति आत्मसाक्षात्कार की अवश्यकर्तव्यता बतलानेवाली है, क्योंकि इसकी विपरीत अवस्था में श्रुति ने विनाश बतलाया है । इह अर्थात् इस मनुष्य-जन्म के रहते हुए आत्मा को अवश्य जान लेना चाहिये—ऐसा विधान किया जाता है ।

किस प्रकार कि यदि इस जन्म में आत्मा को जान लिया तो ठीक है, उसे परमार्थतत्त्व प्राप्त हो गया; अभिप्राय यह कि उसका जन्म सफल हो गया ।

और यदि उसे इस जन्म में न जाना—न

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इह चेदवेदीत् इत्यवश्य कर्तव्यतोक्तिर्विपर्यये विनाशश्रुतेः ।

इह मनुष्यजन्मनि सत्यवश्यमात्मा वेदितव्य इत्येतद्विधीयते ।

कथमिह चेदवेदीद्विदितवान्, अथ सत्यं परमार्थतत्त्वमस्त्यवाप्तं तस्य जन्म सफलमित्यभिप्रायः ।

न चेदिहावेदीन्न विदितवान्

पद-भाष्य

अतः इस प्रकार गुण और दोष को जाननेवाले धीर—बुद्धिमान् ब्राह्मणलोग प्राणी-प्राणी में अर्थात् सम्पूर्ण चराचर जीवों में एक ब्रह्मस्वरूप आत्मतत्त्व को ‘विचित्य’—जानकर अर्थात् साक्षात् कर यहाँ से लौटनेपर अर्थात् ममता-अहंतारूप इस अविद्यात्मक लोक से उपरत होकर सब में आत्मैकत्वरूप अद्वैतभाव को प्राप्त होकर
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तस्मादेवं गुणदोषौ विजानन्तो ब्राह्मणाः भूतेषु भूतेषु सर्वभूतेषु स्थावरेषु चरेषु च एकमात्मतत्त्वं ब्रह्म विचित्य विज्ञाय साक्षात्कृत्य धीराः धीमन्तः प्रेत्य व्यावृत्य ममाहंभावलक्षणादविद्यारूपादस्माल्लोकाद् उपरम्य सर्वात्मैकभावमद्वैतमापन्नाः सन्तः

वाक्य-भाष्य

समझा तो उसका जन्म वृथा ही गया । यही नहीं, जन्म-मरण-परम्परा की अविच्छिन्नतारूप बड़ी भारी हानि भी है । अतः उस परम्परा के विच्छेद के लिये आत्मा को अवश्य जान लेना चाहिये ।

आत्मज्ञान से होगा क्या सो [भूतेषु भूतेषु आदि वाक्य से] बतलाते हैं । भूत-भूत में अर्थात् सम्पूर्ण चराचर प्राणियों में आत्मा का शोधनकर—उसे उनसे अलग निकालकर यानी संसार-धर्मों से अस्पृष्ट एकमात्र आत्मतत्त्व को आत्मभाव से उपलब्ध कर धीर—बुद्धिमान् अर्थात् विवेकी पुरुष—जिनकी बाह्य विषयों की अभिलाषा निवृत्त हो गयी है—मरकर अर्थात् इस शरीरादि अनात्मस्वरूप लोक से जिनका ममत्व और अहंकार निवृत्त हो गया है, ऐसे होकर अमृत—अमरण

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वृथैव जन्म । अपि च महती विनष्टिर्महान्विनाशो जन्ममरणप्रबन्धाविच्छेदप्राप्तिलक्षणः स्याद्यतस्तस्मादवश्यं तद्विच्छेदाय ज्ञेय आत्मा ।

ज्ञानेन तु किं स्यादित्युच्यते भूतेषु भूतेषु चराचरेषु सर्वेषु इत्यर्थः । विचित्य पृथङ्निष्कृष्य एकमात्मतत्त्वं संसारधर्मैरस्पृष्टमात्मभावेनोपलभ्येत्यर्थः अनेकार्थत्वाद्धातूनां न पुनश्चित्वेति सम्भवति विरोधात्; धीराः धीमन्तो विवेकिनो विनिवृत्त-

पद-भाष्य

अमर अर्थात् ब्रह्म ही हो जाते हैं, जैसा कि ‘जो पुरुष निश्चयपूर्वक उस परमब्रह्म को जानता है वह ब्रह्म ही हो जाता है’ इस श्रुति से सिद्ध होता है ॥ ५ ॥
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अमृता भवन्ति ब्रह्मैव भवन्तीत्यर्थः । ‘स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’ (मु० उ० ३ । २ । ९) इति श्रुतेः ॥ ५ ॥

इति द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥


वाक्य-भाष्य

धर्मा यानी नित्यविज्ञानामृतस्वभाववाले ही हो जाते हैं । धातुओं के अनेक अर्थ होते हैं [इसीलिये यहाँ ‘विचित्य’ क्रिया का उपर्युक्त अर्थ ठीक है] यहाँ इसका ‘चयन करके’ ऐसा अर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि आत्मा के सम्बन्ध में ऐसा अर्थ करने से विरोध आता है ॥ ५ ॥
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बाह्यविषयाभिलाषाः प्रेत्य मृत्वास्माल्लोकाच्छरीराद्यनात्मलक्षणात् व्यावृत्तममत्वाहंकाराः सन्त इत्यर्थः, अमृता अमरणधर्माणो नित्यविज्ञानामृतत्वस्वभावा एव भवन्ति ॥ ५ ॥

इति द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥


तृतीय खण्ड

यक्षोपाख्यान

वाक्य-भाष्य

‘ब्रह्म ह देवेभ्यः’ इत्यादि वाक्य से [आरम्भ होनेवाली आख्यायिका के द्वारा] जो ब्रह्म की दुर्विज्ञेयता बतलायी गयी है, वह ब्रह्मप्राप्ति के लिये अधिक यत्न करना चाहिये—इस प्रयोजन के लिये है । जिसके अधीन पुरुषार्थ है वह ब्रह्मविद्या तो समाप्त हो गयी ।
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यक्षोपाख्यानस्य ब्रह्म ह देवेभ्य इति प्रयोजने ब्रह्मणो दुर्विज्ञेयतोक्तिविकल्पाः र्यत्नाधिक्यार्था । समाप्ता ब्रह्मविद्या यदधीनः पुरुषार्थः ।

वाक्य-भाष्य

अब आगे अर्थवाद द्वारा ब्रह्म की दुर्विज्ञेयता बतलायी जाती है, जिससे कि उसे प्राप्त करने के लिये मनुष्य किसी-न-किसी तरह अधिक यत्न करे ।

अथवा यह श्रुतिभाग अभिमान का नाश करनेवाला होने से शमादि की प्राप्ति के लिये हो सकता है । या शमादि को ब्रह्मविद्या का साधन बतलाना इष्ट है, अतः उसी के लिये यह अर्थवाद-श्रुति है । जो पुरुष शमादि साधन से रहित तथा अभिमान और राग-द्वेषादि से युक्त है उसका ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति में सामर्थ्य नहीं हो सकता, क्योंकि ब्रह्म बाह्य मिथ्या प्रतीतियों के निरसन द्वारा ही ग्रहण किया जानेयोग्य है । क्योंकि यह आख्यायिका अग्नि आदि के विजयसम्बन्धी अभिमान को नष्ट करती है, इसलिये अभिमान के शान्त होनेपर ही ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति दिखलाती है । अतः इसका सारांश यह हुआ कि यह अर्थवाद शमादि साधनों का विधान करने के लिये ही है ।

अथवा यह सगुणोपासना का विधान करने के लिये भी हो सकता है, क्योंकि पहले ब्रह्म के उपास्यत्व का निषेध कर चुके हैं । पहले ‘नेदं यदिदमुपासते’ इस श्रुति से ब्रह्म के उपास्यत्व का निषेध हो चुका है; इस प्रकार निषिद्ध हो जाने से ब्रह्म की अनुपास्यता प्राप्त होनेपर उसी ब्रह्म की सगुणभाव से अधिदैव या

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अत ऊर्ध्वमर्थवादेन ब्रह्मणो दुर्विज्ञेयतोच्यते । तद्विज्ञाने कथं नु नाम यत्नमधिकं कुर्यादिति ।

शमाद्यर्थो वाम्नायोऽभिमानशातनात् । शमादि वा ब्रह्मविद्यासाधनं विधित्सितं तदर्थोऽयमर्थवादाम्नायः । न हि शमादिसाधनरहितस्याभिमानरागद्वेषादियुक्तस्य ब्रह्मविज्ञाने सामर्थ्यमस्ति, व्यावृत्तबाह्यमिथ्याप्रत्ययग्राह्यत्वाद्वह्मणः । यस्माच्चाग्न्यादीनां जयाभिमानं शातयति ततश्च ब्रह्मविज्ञानं दर्शयत्यभिमानोपशमे । तस्माच्छमादिसाधनविधानार्थोऽयमर्थवाद इत्यवसीयते ।

सगुणोपासनार्थो वापोदितत्वात् । नेदं यदिदमुपासत इत्युपास्यत्वं ब्रह्मणोऽपोदितमपोदितत्वादनुपास्यत्वे प्राप्ते तस्यैव ब्रह्मणः सगुणत्वेनाधिदैव-

पद-भाष्य

अमर अर्थात् ब्रह्म ही हो जाते हैं, जैसा कि ‘जो पुरुष निश्चयपूर्वक उस परमब्रह्म को जानता है वह ब्रह्म ही हो जाता है’ इस श्रुति से सिद्ध होता है ॥ ५ ॥
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अमृता भवन्ति ब्रह्मैव भवन्तीत्यर्थः । ‘स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’ (मु० उ० ३ । २ । ९) इति श्रुतेः ॥ ५ ॥

इति द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥


वाक्य-भाष्य

धर्मा यानी नित्यविज्ञानामृतस्वभाववाले ही हो जाते हैं । धातुओं के अनेक अर्थ होते हैं [इसीलिये यहाँ ‘विचित्य’ क्रिया का उपर्युक्त अर्थ ठीक है] यहाँ इसका ‘चयन करके’ ऐसा अर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि आत्मा के सम्बन्ध में ऐसा अर्थ करने से विरोध आता है ॥ ५ ॥
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बाह्यविषयाभिलाषाः प्रेत्य मृत्वास्माल्लोकाच्छरीराद्यनात्मलक्षणात् व्यावृत्तममत्वाहंकाराः सन्त इत्यर्थः, अमृता अमरणधर्माणो नित्यविज्ञानामृतत्वस्वभावा एव भवन्ति ॥ ५ ॥

इति द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥


तृतीय खण्ड

यक्षोपाख्यान

वाक्य-भाष्य

‘ब्रह्म ह देवेभ्यः’ इत्यादि वाक्य से [आरम्भ होनेवाली आख्यायिका के द्वारा] जो ब्रह्म की दुर्विज्ञेयता बतलायी गयी है, वह ब्रह्मप्राप्ति के लिये अधिक यत्न करना चाहिये—इस प्रयोजन के लिये है । जिसके अधीन पुरुषार्थ है वह ब्रह्मविद्या तो समाप्त हो गयी ।
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यक्षोपाख्यानस्य ब्रह्म ह देवेभ्य इति प्रयोजने ब्रह्मणो दुर्विज्ञेयतोक्तिविकल्पाः र्यत्नाधिक्यार्था । समाप्ता ब्रह्मविद्या यदधीनः पुरुषार्थः ।

वाक्य-भाष्य

अब आगे अर्थवाद द्वारा ब्रह्म की दुर्विज्ञेयता बतलायी जाती है, जिससे कि उसे प्राप्त करने के लिये मनुष्य किसी-न-किसी तरह अधिक यत्न करे ।

अथवा यह श्रुतिभाग अभिमान का नाश करनेवाला होने से शमादि की प्राप्ति के लिये हो सकता है । या शमादि को ब्रह्मविद्या का साधन बतलाना इष्ट है, अतः उसी के लिये यह अर्थवाद-श्रुति है । जो पुरुष शमादि साधन से रहित तथा अभिमान और राग-द्वेषादि से युक्त है उसका ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति में सामर्थ्य नहीं हो सकता, क्योंकि ब्रह्म बाह्य मिथ्या प्रतीतियों के निरसन द्वारा ही ग्रहण किया जानेयोग्य है । क्योंकि यह आख्यायिका अग्नि आदि के विजयसम्बन्धी अभिमान को नष्ट करती है, इसलिये अभिमान के शान्त होनेपर ही ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति दिखलाती है । अतः इसका सारांश यह हुआ कि यह अर्थवाद शमादि साधनों का विधान करने के लिये ही है ।

अथवा यह सगुणोपासना का विधान करने के लिये भी हो सकता है, क्योंकि पहले ब्रह्म के उपास्यत्व का निषेध कर चुके हैं । पहले ‘नेदं यदिदमुपासते’ इस श्रुति से ब्रह्म के उपास्यत्व का निषेध हो चुका है; इस प्रकार निषिद्ध हो जाने से ब्रह्म की अनुपास्यता प्राप्त होनेपर उसी ब्रह्म की सगुणभाव से अधिदैव या अध्यात्म उपासना करनी चाहिये, इसी को बतलाने के लिये यह अर्थवाद हो सकता है, जैसा कि आगे चलकर ‘तद्वनमित्युपासितव्यम्’ इस [४ । ६ मन्त्र] से उसके अधिदैवरूप के उपास्यत्व का वर्णन करेंगे ।

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अत ऊर्ध्वमर्थवादेन ब्रह्मणो दुर्विज्ञेयतोच्यते । तद्विज्ञाने कथं नु नाम यत्नमधिकं कुर्यादिति ।

शमाद्यर्थो वाम्नायोऽभिमानशातनात् । शमादि वा ब्रह्मविद्यासाधनं विधित्सितं तदर्थोऽयमर्थवादाम्नायः । न हि शमादिसाधनरहितस्याभिमानरागद्वेषादियुक्तस्य ब्रह्मविज्ञाने सामर्थ्यमस्ति, व्यावृत्तबाह्यमिथ्याप्रत्ययग्राह्यत्वाद्वह्मणः । यस्माच्चाग्न्यादीनां जयाभिमानं शातयति ततश्च ब्रह्मविज्ञानं दर्शयत्यभिमानोपशमे । तस्माच्छमादिसाधनविधानार्थोऽयमर्थवाद इत्यवसीयते ।

सगुणोपासनार्थो वापोदितत्वात् । नेदं यदिदमुपासत इत्युपास्यत्वं ब्रह्मणोऽपोदितमपोदितत्वादनुपास्यत्वे प्राप्ते तस्यैव ब्रह्मणः सगुणत्वेनाधिदैव- मध्यात्मं चोपासनं विधातव्यमित्येवमर्थो वा । इत्यधिदैवतं तद्धनमित्युपासितव्यमिति हि वक्ष्यति ।

वाक्य-भाष्य

‘ब्रह्म’ इस शब्द से यहाँ परमात्मा (ईश्वर) समझना चाहिये, क्योंकि यहाँ उसी की सूचना देनेवाले लिंग (चिह्न) देखे जाते हैं । नित्यसर्वज्ञ परमेश्वर को छोड़कर और किसी में अग्नि आदि देवताओं का पराभव करके तृण को वज्र बना देने की शक्ति नहीं हो सकती । अतः ‘तन्न शशाक दग्धुम्’ (उसे अग्नि नहीं जला सका) इत्यादि लिंग से ब्रह्मशब्द का वाच्य ईश्वर ही है—ऐसा निश्चित होता है । इसके सिवा और किसी कारण से अग्नि तृण को जलाने में और वायु उसे उड़ाने में असमर्थ नहीं हो सकते थे । हाँ, यह ठीक है कि ईश्वर की इच्छा से तो तृण भी वज्र हो जाता है । उस ईश्वर की सिद्धि संसार की नियमित प्रवृत्ति से होती है ।

यद्यपि नित्यसर्वविज्ञानस्वरूप, सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान् ईश्वर श्रुति, स्मृति और प्रसिद्धि से सिद्ध भी है तो भी शास्त्र के अर्थ को निश्चय करने के लिये यहाँ यह [अनुमान] कहा जाता है । उस ईश्वर के सद्भाव की सिद्धि किस प्रकार होती है? इसपर कहते हैं—

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ब्रह्मेति परो लिङ्गात् । न ब्रह्मपदाभिप्रायः ह्यन्यत्र परादीश्वरात् नित्यसर्वज्ञात् परिभूयाग्न्यादींस्तृणं वज्रीकर्तुं सामर्थ्यमस्ति तन्न शशाक दग्धुमित्यादिलिङ्गाद्ब्रह्मशब्दवाच्य ईश्वर इत्यवसीयते । न ह्यन्यथाग्निस्तृणं दग्धुं नोत्सहते वायुर्वादातुम् । ईश्वरेच्छया तृणमपि वज्रीभवतीत्युपपद्यते । तत्सिद्धिर्जगतो नियतप्रवृत्तेः ।

श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धिभिर्नित्यसर्वविज्ञान ईश्वरे सर्वात्मनि सर्वशक्तौ सिद्धेऽपि शास्त्रार्थनिश्चयार्थमुच्यते । तस्येश्वरस्य सद्भावसिद्धिः कुतो भवतीत्युच्यते ।

वाक्य-भाष्य

स्वर्ग, आकाश, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र, ग्रह और नक्षत्रों के कारण विचित्र दीखनेवाला तथा नाना प्रकार के प्राणियों के उपभोगयोग्य स्थान और साधनों से सम्बन्ध रखनेवाला यह जितना देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितृगण और पिशाचादिरूप जगत् है वह अत्यन्त कुशल शिल्पियों द्वारा भी बनाया जाना कठिन है । अतः यह देश, काल और निमित्त के अनुरूप नियमित प्रवृत्ति-निवृत्ति के क्रमवाला जगत् भोक्ता और कर्म के विभाग को जाननेवाले किसी चेतन के प्रयत्नपूर्वक ही हो सकता है, क्योंकि कार्यरूप होने के कारण यह उपर्युक्त लक्षणोंवाला है । जैसे कि गृह, प्रासाद, रथ, शय्या और आसन आदि [सभी कार्यरूप अनित्य पदार्थ देखे जाते हैं]; तथा इसके विपरीत [व्यतिरेकी दृष्टान्तस्वरूप] आत्मा, आकाश आदि [नित्य पदार्थ हैं] ।

यदि कहो कि जगत् की उत्पत्ति कर्म से ही है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि कर्म परतन्त्र होने के कारण केवल उसका निमित्त हो सकता है । [मीमांसक की युक्ति को स्पष्ट करके दिखलाते हैं] यह जो प्राणियों के उपभोग की विचित्रता है तथा उनके साधनों की विभिन्नता और देश, काल तथा निमित्त के अनुरूप प्रवृत्ति-निवृत्ति का नियमित क्रम है वह किसी नित्य सर्वज्ञ का रचा हुआ नहीं है ।

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यदीदं जगद्देवगन्धर्वयक्षरक्षःईश्वरस्य पितृपिशाचादिलक्षणं जगन्नियन्तृत्व- द्युवियत्पृथिव्यानिरूपणम् दित्यचन्द्रग्रहनक्षत्रविचित्रं विविधप्राण्युपभोगयोग्यस्थानसाधनसम्बन्धि तदत्यन्तकुशलशिल्पिभिरपि दुर्निर्माणं देशकालनिमित्तानुरूपनियतप्रवृत्तिनिवृत्तिक्रममेतद्भुक्तृकर्मविभागज्ञप्रयत्नपूर्वकं भवितुमर्हति; कार्यत्वे सति यथोक्तलक्षणत्वात् । गृहप्रासादरथशयनासनादिवत् । विपक्ष आत्मादिवत् ।

कर्मण एवेति चेत्? न परकर्मणा- तन्त्रस्य निमित्तमात्रमस्वातन्त्र्यम् त्वात् । यदिदमुपभोगवैचित्र्यं प्राणिनां तत्साधनवैचित्र्यं च देशकालनिमित्तानुरूपनियतप्रवृत्तिनिवृत्तिक्रमं च तन्न नित्यसर्वज्ञकर्तृकम् किं तर्हि? कर्मण एव तस्याचिन्त्यप्रभावत्वात् सर्वैश्च फलहेतुत्वाभ्युपगमात् । सति कर्मणः फलहेतुत्वे किमीश्वराधिककल्पनयेति न नित्यस्येश्वरस्य नित्यसर्वज्ञशक्तेः फलहेतुत्वं चेति चेत् ।

वाक्य-भाष्य

तो किसका रचा हुआ है? [इसपर कहते हैं—] यह केवल कर्मका ही फल है, क्योंकि वह अचिन्त्य प्रभाववाला है तथा सभीने उसे फलके हेतुरूपसे स्वीकार किया है । इस प्रकार फलके हेतुरूपसे कर्मके रहते हुए ईश्वरकी अधिक कल्पना करनेसे क्या लाभ है? अतः नित्य, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् ईश्वरमें फलका हेतुत्व नहीं ।

सिद्धान्ती—केवल कर्मसे ही उपभोग आदिकी विचित्रता सम्भव नहीं है । किस कारणसे? क्योंकि कर्म कर्ताके अधीन है । चेतन पुरुषके यत्नसे निष्पन्न होनेवाला कर्म उसके प्रयत्नके निवृत्त होनेसे निवृत्त होकर देशान्तर या कालान्तरमें किसी नियत निमित्तविशेषकी अपेक्षासे ही कर्ताको फलकी प्राप्ति करावेगा—ऐसी व्यवस्था होनेके कारण यह कहना उचित नहीं कि वह अपने किसी दूसरे प्रवर्तककी अपेक्षा न करके ही फल दे देता है । यदि कर्म करनेवाले जीवको ही फलकालमें उसका प्रवर्तक माना जाय तो [उस समय वह कर्मसे कहेगा—] ‘अरे कर्म! मैंने तुझे किया था, अब मैं ही तुझे फल देनेके लिये प्रवृत्त करता हूँ, अतः मुझे अपने अनुरूप फल दे ।’

किन्तु ऐसा होना सम्भव नहीं है, क्योंकि जीव देश, काल और निमित्तविशेषसे अनभिज्ञ है । यदि कर्ता ही देशादि विशेषका ज्ञाता होकर स्वतन्त्रतापूर्वक कर्मको प्रवृत्त करता तो अनिष्ट फलके लिये तो उसे प्रेरित ही न किया करता । इसके सिवा, किसी अन्य निमित्तकी अपेक्षा न रखकर कर्ताकी इच्छाके बिना ही, आत्माके साथ नित्यसम्बद्ध हुआ कर्म अपने-आप ही चमड़ेके समान विकारको प्राप्त नहीं होता ।

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न कर्मण एवोपभोगवैचित्र्याद्युपपद्यते । कस्मात्? कर्तृतन्त्रत्वात्कर्मणः । चितिमत्प्रयत्ननिर्वृत्तं हि कर्म तत्प्रयत्नोपरमाद् उपरतं सदेशान्तरे कालान्तरे वा नियतनिमित्तविशेषापेक्षं कर्तुः फलं जनयिष्यतीति न युक्तमनपेक्ष्यान्यदात्मनः प्रयोक्तृ । कर्त्तैव फलकाले प्रयोक्तेति चेन्मया निर्वर्तितोऽसि त्वां प्रयोक्ष्ये फलाय यदात्मानुरूपं फलमिति ।

न, देशकालनिमित्तविशेषानभिज्ञत्वात् । यदि हि कर्त्ता देशविशेषाभिज्ञः सन्स्वातन्त्र्येण कर्म नियुञ्ज्यात्ततोऽनिष्टफलस्याप्रयोक्ता स्यात् । न च निर्निमित्तं तदनिच्छयात्मसमवेतं तच्चर्मवद्विकरोति कर्म ।

वाक्य-भाष्य

[क्षणिक-विज्ञानरूप] आत्माका किया हुआ कर्म कर्तासे नित्य सम्बद्ध न होकर चुम्बक-पत्थरके समान अपने-आप ही फलका आकर्षण नहीं कर सकता, क्योंकि कर्मका प्रधान कर्तासे नित्यसम्बन्ध है । यदि कहो कि कर्म भूतोंके आश्रयसे रहता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वे तो केवल उसके साधन हैं । कर्ताकी क्रियाके साधनरूप भूत, जो केवल क्रियाकालमें उसके व्यापारका अनुभव करते हैं और व्यापारके समाप्त हो जानेपर हल आदिके समान कर्ताद्वारा त्याग दिये जाते हैं, कालान्तरमें उसका फल देनेमें समर्थ नहीं हो सकते । हल धान्योंको खेतसे ले जाकर घरमें नहीं पहुँचा सकता । अतः अचेतन होनेके कारण भूत और कर्मोंकी स्वतः प्रवृत्ति असम्भव है । यदि कहो कि [अचेतन होनेपर भी] वायुके समान इनकी स्वतः प्रवृत्ति हो सकती है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वह असिद्ध है । अचेतन वायुकी स्वतः प्रवृत्ति सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि रथादि अन्य अचेतन पदार्थोंमें वह देखी नहीं जाती ।
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न चात्मकृतमकर्तृसमवेतमयस्कान्तमणिवदाकृष्टृ भवति प्रधानकर्तृसमवेतत्वात्कर्मणः । भूताश्रयमिति चेन्न साधनत्वात् । कर्तृक्रियायाः साधनभूतानि भूतानि क्रियाकालेऽनुभूतव्यापाराणि समाप्तौ च हलादिवत्कर्त्रा परित्यक्तानि न फलं कालान्तरे कर्तुमुत्सहन्ते न हि हलं क्षेत्राद् व्रीहीन्गृहं प्रवेशयति । भूतकर्मणोश्चाचेतनत्वात्स्वतः प्रवृत्त्यनुपपत्तिः । वायुवदिति चेन्नासिद्धत्वात् । न हि वायोरचितिमतः स्वतःप्रवृत्तिः सिद्धा रथादिष्वदर्शनात् ।

वाक्य-भाष्य

मीमांसक—किन्तु शास्त्रानुसार तो कर्मसे ही फल मिलता है? ‘स्वर्गकामो यजेत’ इत्यादि शास्त्र तो कर्मसे ही फलकी सिद्धि बतलाता है, ईश्वरादिसे नहीं । इस प्रकार जो बात प्रमाणसिद्ध है उसको व्यर्थ बतलाना भी ठीक नहीं है, और ईश्वरकी सत्तामें भी [अर्थापत्तिको छोड़कर] और कोई प्रमाण नहीं है ।

सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि दृष्ट न्यायको त्यागना उचित नहीं है । क्रिया दो प्रकारकी है—दृष्टफला और अदृष्टफला । दृष्टफलाके भी दो भेद हैं—अनन्तरफला और आगामिफला[ २ ] । गमन और भोजन इत्यादि क्रियाएँ अनन्तरफला हैं तथा कृषि और सेवा आदि कालान्तरफला हैं । उनमें जो अनन्तरफला हैं वे फलोदयके समय ही नष्ट हो जाती हैं तथा कालान्तरफला उत्पन्न होकर [फल देनेसे पूर्व ही] नष्ट हो जानेवाली हैं ।

क्योंकि कृषिका फल अपने अधीन है और सेवा आदिका फल अपने सेव्यके अधीन है । इस दो प्रकारके न्यायको छोड़कर कर्म या उससे प्राप्त होनेवाला फल स्वतन्त्र देखा भी नहीं जाता; तथा कर्मफलकी प्राप्तिमें इस स्पष्ट दीखनेवाले न्यायको छोड़ना उचित भी नहीं है, इसलिये यागादि कर्मोंके समाप्त हो जानेपर उन यागादिके अनुरूप फल देनेवाला तथा कर्ता, कर्म और फलके विभागको जाननेवाला ईश्वर सेव्य आदिके समान होना ही चाहिये और वह सबका अन्तरात्मा, सम्पूर्ण कर्मफल और प्रतीतियोंका साक्षी, नित्यविज्ञानस्वरूप तथा सांसारिक धर्मोंसे अछूता होना चाहिये ।

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शास्त्रात्कर्मण एवेति चेच्छास्त्रं हि क्रियातः फलसिद्धिमाह नेश्वरादेः स्वर्गकामो यजेतेत्यादि । न च प्रमाणाधिगतत्वादानर्थक्यं युक्तम् । न चेश्वरास्तित्वे प्रमाणान्तरमस्तीति चेत् ।

न, दृष्टन्यायहानानुपपत्तेः ।

क्रिया हि द्विविधा दृष्टक्रियाभेद- फलादृष्टफला च, दृष्टनिरूपणम् फलापि द्विविधानन्तरफलागामिफला च, अनन्तरफला गतिभुजिलक्षणा । कालान्तरफला च कृषिसेवादिलक्षणा तत्रानन्तरफला फलापवर्गिण्येव कालान्तरफला तूत्पन्नप्रध्वंसिनी ।

आत्मसेव्याद्यधीनं हि कृषिसेवादेः फलं यतः । न चोभयन्यायव्यतिरेकेण स्वतन्त्रं कर्म ततो वा फलं दृष्टम् । तथा च कर्मफलप्राप्तौ न दृष्टन्यायहानमुपपद्यते । तस्माच्छान्ते यागादिकर्मणि नित्यः कर्तृकर्मफलविभागज्ञ ईश्वरः सेव्यादिवद्यागाद्यनुरूपफलदातोपपद्यते । स चात्मभूतः सर्वस्य सर्वक्रियाफलप्रत्ययसाक्षी नित्यविज्ञानस्वभावः संसारधर्मैरसंस्पृष्टः ।

वाक्य-भाष्य

यही बात श्रुतिसे भी सिद्ध होती है । ‘सम्पूर्ण लोकोंसे विलक्षण परमात्मा लोकके दुःखसे लिप्त नहीं होता’ ‘वह जरा और मृत्युको पार किये हुए है’ ‘जरा और मृत्युसे रहित है’ ‘वह सत्यकाम सत्यसंकल्प है’ ‘यह सर्वेश्वर है’ ‘वह शुभ कर्म कराता है’ ‘दूसरा [पक्षी] कर्मफलको न भोगता हुआ केवल उसे देखता है’ ‘इस अक्षर ब्रह्मकी आज्ञामें [सूर्य और चन्द्रमा स्थित हैं]’ इत्यादि श्रुतियाँ संसारधर्मोंसे रहित एक नित्यमुक्त आत्माकी सिद्धिमें ही प्रमाणभूत हैं । इसी प्रकार सहस्रों स्मृतियाँ भी मौजूद हैं । ये सब अर्थवाद हैं—ऐसी भी कल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि वे किसी अन्य विधिके शेषभूत न होनेके कारण स्वतन्त्र ज्ञान उत्पन्न करनेवाले हैं और उनसे उत्पन्न हुआ ज्ञान [किसी प्रमाणान्तरसे] बाधित भी नहीं होता ।

[ईश्वरका] निषेध न होनेके कारण भी [पूर्वोक्त श्रुतियाँ अर्थवाद नहीं हैं] । ईश्वर नहीं है—ऐसा निषेध कहीं भी नहीं मिलता । यदि कहो कि ईश्वरकी प्राप्ति (सिद्धि) न होनेके कारण निषेध नहीं है, तो ऐसा कहना उचित नहीं; क्योंकि उसके विषयमें कहा जा चुका है । अर्थात् यदि ऐसा कहो कि [शास्त्रमें] ईश्वरका कोई प्रसंग ही नहीं आता, इसीलिये ‘न हिंस्यात्सर्वा भूतानि’ इस वाक्यके समान ईश्वरके निषेधका भी आरम्भ नहीं किया गया, तो ऐसी बात भी नहीं है, क्योंकि ईश्वरकी सत्तामें उपर्युक्त न्याय कहा गया है । अथवा ‘अप्रतिषेधात्’ इस हेतुका यह तात्पर्य समझना चाहिये कि कर्मका फल देनेमें ईश्वर और काल आदिका प्रतिषेध नहीं किया गया है । कर्मको, किसी अन्य निमित्तकी अपेक्षा न करके केवल कर्तासे ही प्रेरित होकर फल देते देखा भी नहीं है । सर्वथा नष्ट हुआ याग कालान्तरमें फल देनेवाला कभी नहीं होता ।

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श्रुतेश्च । ‘न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः’ (क० उ० ईश्वरास्तित्व- २ । २ । ११) ‘जरां साधनम् मृत्युमत्येति’ (बृ० उ० ३ । ५ । १) ‘विजरो विमृत्युः’ (छा० उ० ८ । ७ । १) ‘सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः’ (छा० उ० ८ । ७ । १) ‘एष सर्वेश्वरः’ (मा० उ० ६) ‘साधु कर्म कारयति’ (कौषी० उ० ३ । ९) ‘अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति’ (श्वे० उ० ४ । ६) ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने’ (बृ० उ० ३ । ८ । ९) इत्याद्या असंसारिण एकस्यात्मनो नित्यमुक्तस्य सिद्धौ श्रुतयः । स्मृतयश्च सहस्रशो विद्यन्ते । न चार्थवादाः शक्यन्ते कल्पयितुम् । अनन्ययोगित्वे सति विज्ञानोत्पादकत्वात् । न चोत्पन्नं विज्ञानं बाध्यते ।

अप्रतिषेधाच्च न चेश्वरो नास्तीति निषेधोऽस्ति ।

वाक्य-भाष्य

जिस प्रकार सेवककी सेवासे सेव्य (स्वामी)-की बुद्धिपर संस्कार पड़ जाता है उसी प्रकार यागादि कर्मसे सर्वज्ञ ईश्वरकी बुद्धिके संस्कारयुक्त हो जानेसे, फिर उस कर्मके नष्ट हो जानेपर भी, जैसे सेवकको स्वामीसे वैसे ही कर्ताको ईश्वरसे फल मिल जाता है—ऐसा विचार ही ठीक है । पदार्थ तो सैकड़ों प्रमाणभूत वाक्य होनेपर भी देशान्तर या कालान्तरमें अपने स्वभावको नहीं छोड़ते । अग्नि किसी भी देश या कालान्तरमें शीतल नहीं हो सकता । इस प्रकार कर्मोंका भी कालान्तरमें दो ही प्रकार फल मिलता देखा जाता है ।
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प्राप्त्यभावादिति चेन्नोक्तत्वात् । न हिंस्यादितिवत्प्राप्त्यभावात्प्रतिषेधो नारभ्यत इति चेन्न । ईश्वरसद्भावे न्यायस्योक्तत्वात् । अथवाप्रतिषेधादिति कर्मणः फलदान ईश्वरकालादीनां न प्रतिषेधोऽस्ति । न च निमित्तान्तरनिरपेक्षं केवलेन कर्त्रैव प्रयुक्तं फलं दृष्टम् । न विनष्टोऽपि यागः कालान्तरे फलदो भवति ।

सेव्यबुद्धिवत्सेवकेन सर्वज्ञेश्वरबुद्धौ तु कर्मफलप्रदाने संस्कृतायां यागादिईश्वरस्य कर्मणा विनष्टेऽपि । प्राधान्यम् कर्मणि सेव्यादिव ईश्वरात्फलं कर्तुर्भवतीति युक्तम् । न तु पुनः पदार्था वाक्यशतेनापि देशान्तरे कालान्तरे वा स्वं स्वं स्वभावं जहति । न हि देशकालान्तरेषु चाग्निरनुष्णो भवति । एवं कर्मणोऽपि कालान्तरे फलं द्विप्रकारमेवोपलभ्यते ।

पद-भाष्य

‘ब्रह्म जाननेवालोंके लिये अविज्ञात है और न जाननेवालोंके लिये ज्ञात है’ इस श्रुतिसे मन्दबुद्धि पुरुषोंको ऐसा भ्रम न हो जाय कि ‘जो वस्तु है वह तो प्रमाणोंसे जान ही ली जाती है और जो
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‘अविज्ञातं विजानतां विज्ञातवक्ष्य- मविजानताम्’ इत्यादिमाणाख्यायिकायाः श्रवणाद् यदस्ति तद्धिप्रयोजनम् ज्ञातं प्रमाणैः यन्नास्ति तदविज्ञातं शशविषाणकल्पमत्यन्त-

वाक्य-भाष्य

कृषि आदि कर्म ऐसे कर्ताकी अपेक्षासे फल देनेवाले हैं जिसे बीज, क्षेत्रसंस्कार तथा खेतीकी रक्षा आदिका ज्ञान हो और सेवा आदि कर्म विज्ञानवान् सेव्यकी बुद्धिके संस्कारकी अपेक्षासे फलदायक हैं । यागादि कर्म कालान्तरमें फल देनेवाले हैं, इसलिये उनकी फलप्राप्तिको अज्ञानी कर्ताकी अपेक्षासे मानना तो ठीक नहीं है । अतः उनका फल कर्म, देश, काल, निमित्त और कर्मविपाकके विभागको जाननेवाले किसी चेतनकी बुद्धिके संस्कारकी अपेक्षासे ही हो सकता है, जैसे कि सेवा आदि कर्मोंका फल उसके अनुरूप फलको जाननेवाले सेव्यकी बुद्धिपर हुए संस्कारकी अपेक्षासे मिलता है । इससे सम्पूर्ण जीवोंकी बुद्धि कर्म और फलके विभागका साक्षी, सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ ईश्वर सिद्ध हुआ । “जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है”, “जो सर्वान्तर आत्मा है” इस श्रुतिसे भी यही प्रमाणित होता है ।
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बीजक्षेत्रसंस्कारापरिरक्षाविज्ञानवत्कर्त्रपेक्षफलं कृष्यादि विज्ञानवत्सेव्यबुद्धिसंस्कारापेक्षफलं च सेवादि । यागादेः कर्मणस्तथाविज्ञानवत्कर्त्रपेक्षफलत्वानुपपत्तौ कालान्तरफलत्वात्कर्मदेशकालनिमित्तविपाकविभागबुद्धिसंस्कारापेक्षं फलं भवितुमर्हति; सेवादिकर्मानुरूपफलज्ञ सेव्यबुद्धिसंस्कारापेक्षफलस्येव । तस्मात्सिद्धः सर्वज्ञ ईश्वरः सर्वजन्तुबुद्धिकर्मफलविभागसाक्षी सर्वभूतान्तरात्मा । “यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः” (बृ० उ० ३ । ४ । १) इति श्रुतेः ।

पद-भाष्य

नहीं है वह अविज्ञात वस्तु तो खरगोशके सींगके समान अत्यन्त अभावरूप ही देखी गयी है, अतः यह ब्रह्म भी अविज्ञात होनेके कारण असत् ही है’ इसीलिये यह आख्यायिका आरम्भ की जाती है ।

वह ब्रह्म ही सब प्रकारसे शासन करनेवाला, देवताओंका भी परम देव, ईश्वरोंका भी परम ईश्वर, दुर्विज्ञेय तथा देवताओंकी जयका कारण और असुरोंकी पराजयका हेतु है । तब वह है किस प्रकार नहीं? [अर्थात् अवश्य ही है] । इस अर्थके अनुकूल ही इस खण्डके आगेके वाक्य देखे जाते हैं ।

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मेवासददृष्टम्; तथेदं ब्रह्माविज्ञातत्वादसदेवेति मन्दबुद्धीनां व्यामोहो मा भूदिति तदर्थेयमाख्यायिका आरभ्यते ।

तदेव हि ब्रह्म सर्वप्रकारेण प्रशास्तृ देवानामपि परो देवः; ईश्वराणामपि परमेश्वरः, दुर्विज्ञेयो देवानां जयहेतुः, असुराणां पराजयहेतुः; तत्कथं नास्तीत्येत स्यार्थस्यानुकूलानि ह्युत्तराणि वचांसि दृश्यन्ते ।

वाक्य-भाष्य

और वही इस सृष्टिमें जीवोंका आत्मा है । उससे भिन्न और कोई द्रष्टा, श्रोता मन्ता अथवा विज्ञाता नहीं है, जैसा कि ‘इससे भिन्न और कोई विज्ञाता नहीं है’ इत्यादि भिन्न आत्माका प्रतिषेध करनेवाली श्रुतिसे, तथा ‘तत्त्वमसि’ इस महावाक्यद्वारा ब्रह्मका आत्मत्व उपदेश करनेसे सिद्ध होता है । मिट्टीके ढेलेका सुवर्णरूपसे कभी उपदेश नहीं किया जाता ।

यदि कहो कि ज्ञान, शक्ति, कर्म, उपास्य-उपासक, शुद्ध-अशुद्ध तथा मुक्त-अमुक्त इत्यादि भेदोंके कारण आत्माका भेद ही है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि यहाँ भेददृष्टि अपवादस्वरूप है ।

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स एव चात्रात्मा जन्तूनां ईश्वरस्य नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा सर्वात्म्य- श्रोता मन्ता विज्ञाता स्थापनम् “नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ” (बृ० उ० ३ । ८ । ११) इत्याद्यात्मान्तरप्रतिषेधश्रुतेः । “तत्त्वमसि” (छा० उ० ६ । ८—१६) इति चात्मत्वोपदेशात् । न हि मृत्पिण्डः काञ्चनात्मत्वेनोपदिश्यते ।

ज्ञानशक्तिकर्मोपास्योपासकशुद्धाशुद्धमुक्तामुक्तभेदादात्मभेद एवेति चेन्न, भेददृष्ट्यपवादात् ।

पद-भाष्य

अथवा इस (आख्यायिका)-का आरम्भ ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके लिये है । किस प्रकार? क्योंकि ब्रह्मज्ञानसे ही अग्नि आदि देवगण देवताओंमें श्रेष्ठत्वको प्राप्त हुए थे और उनमें भी इन्द्र सबसे बढ़कर हुआ ।

अथवा इससे यह दिखलाया गया है कि ब्रह्म दुर्विज्ञेय है, क्योंकि अग्नि आदि परम तेजस्वी होनेपर भी कठिनतासे ही ब्रह्मको जान सके थे तथा देवताओंका स्वामी होनेपर भी इन्द्रने उसे बड़ी कठिनतासे पहचाना था ।

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अथवा ब्रह्मविद्यायाः स्तुतये । कथम्? ब्रह्मविज्ञानाद्धि अग्न्यादयो देवा देवानां श्रेष्ठत्वं जग्मुः, ततोऽप्यतितरामिन्द्र इति ।

अथवा दुर्विज्ञेयं ब्रह्मेत्येतत् प्रदर्श्यते—येनाग्न्यादयोऽतितेजसोऽपि क्लेशेनैव ब्रह्म विदितवन्तस्तथेन्द्रो देवानामीश्वरोऽपि सन्निति ।

वाक्य-भाष्य

पूर्व०—तुमने जो कहा कि संसारी जीवोंका ईश्वरसे अभेद है सो ठीक नहीं ।

सिद्धान्ती—तो फिर क्या बात है?

पूर्व०—संसारी जीव और परमात्माका तो परस्पर भेद ही है ।

सिद्धान्ती—क्यों?

पूर्व०—घोड़े और भैंसके समान उनके लक्षणोंमें भेद होनेके कारण; और यदि कहो कि उनके लक्षणोंमें किस प्रकार भेद है तो बतलाते हैं [सुनो, ] सूर्यके प्रकाशके समान ईश्वरको सब विषयोंका सर्वदा ज्ञान रहता है, उसके विपरीत संसारी जीवोंको खद्योत (जुगनू)-के समान अल्प ज्ञान है । इसी प्रकार दोनोंकी शक्तियोंमें

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यदुक्तं संसारिण ईश्वरादनन्या इति तन्न ।

किं तर्हि?

भेद एव संसार्यात्मनाम् ।

कस्मात्?

लक्षणभेदादश्वमहिषवत् । कथं लक्षणभेद इत्युच्यते—ईश्वरस्य तावन्नित्यं सर्वविषयं ज्ञानं सवितृप्रकाशवत् । तद्विपरीतं संसारिणां खद्योतस्येव । तथैव शक्तिभेदोऽपि ।

पद-भाष्य

अथवा आगे कही जानेवाली समस्त उपनिषद् विधिपरक है । और ब्रह्मविद्यासे अतिरिक्त प्राणियोंका जो कर्तृत्व-भोक्तृत्वादिका
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वक्ष्यमाणोपनिषद्विधिपरं वा सर्वं ब्रह्मविद्याव्यतिरेकेण प्राणिनां कर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यभिमानो मिथ्या,

वाक्य-भाष्य

भी भेद है । ईश्वरकी शक्ति नित्य और सर्वतोमुखी है तथा जीवकी इसके विपरीत है । ईश्वरका कर्म भी उसके चित्स्वरूपकी सत्तामात्रसे ही होनेवाला है, जैसे कि उष्णतारूप [सूर्यकान्तमणि आदि] द्रव्योंकी सत्तामात्रसे दहनकार्य निष्पन्न हो जाता है, अथवा जैसे राजा, चुम्बक और प्रकाशसे होनेवाले कार्य [उनकी सन्निधिमात्रसे] होते हैं उसी प्रकार ईश्वरके कर्म उसके स्वरूपमें विकार उत्पन्न करनेवाले नहीं हैं, किन्तु जीवके कर्म इससे विपरीत हैं । ‘उपासीत’ इस श्रुतिके अनुसार ईश्वर गुरु एवं राजाके समान उपासनीय है तथा जीव शिष्य और सेवकके समान उपासक है । ‘अपहतपाप्मा’ आदि श्रुतियोंके अनुसार ईश्वर नित्यशुद्ध है तथा ‘पुण्यो वै पुण्येन’ आदि श्रुतिवाक्योंसे जीव इसके विपरीत स्वभाववाला है ।

अतः ईश्वर तो नित्यमुक्त ही है, किन्तु जीव नित्य अशुद्धिके योगके कारण संसारी है । तथा जहाँ ज्ञानादि लक्षणोंमें भेद रहता है वहाँ सर्वदा भेद ही देखा गया है; जैसे घोड़े और भैंसमें । अतः इसी प्रकार ज्ञानादि लक्षणोंमें भेद रहनेके कारण ईश्वर और जीवोंमें भेद ही है ।

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नित्या सर्वविषया चेश्वरशक्तिर्विपरीतेतरस्य । कर्म च चित्स्वरूपमात्मसत्तामात्रनिमित्तमीश्वरस्य औष्ण्यस्वरूपद्रव्यसत्तामात्रनिमित्तदहनकर्मवत् । राजायस्कान्तप्रकाशकर्मवच्च स्वात्माविक्रियारूपम् । विपरीतमितरस्य । उपासीतेति वचनादुपास्य ईश्वरो गुरुराजवत् । उपासकश्चेतरः शिष्यभृत्यवद् अपहतपाप्मादिश्रवणान्नित्यशुद्ध ईश्वरः । पुण्यो वै पुण्येनेति वचनाद्विपरीत इतरः ।

अत एव नित्यमुक्त एवेश्वरो नित्याशुद्धियोगात्संसारीतरः । अपि च यत्र ज्ञानादिलक्षणभेदोऽस्ति तत्र भेदो दृष्टः; यथाश्वमहिषयोः । तथा ज्ञानादिलक्षणभेदादीश्वरादात्मनां भेदोऽस्तीति चेत् ।

पद-भाष्य

अभिमान है वह देवताओंके जय आदिके अभिमानके समान मिथ्या है—यह बात दिखानेके लिये ही प्रस्तुत आख्यायिका है ।
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इत्येतद्दर्शनार्थं वा आख्यायिका, यथा देवानां जयाद्यभिमानः तद्वदिति ।

वाक्य-भाष्य

सिद्धान्ती—यह बात नहीं है ।

पूर्व०—कैसे?

सिद्धान्ती—क्योंकि ‘यह (ब्रह्म) अन्य है और मैं अन्य हूँ—ऐसा जो जानता है वह [ब्रह्मके यथार्थ स्वरूपको] नहीं जानता’ ‘वे नाशवान् लोकोंको प्राप्त होते हैं’ ‘वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है’ इत्यादि वाक्योंसे भेददृष्टिका निषेध किया जाता है और एकत्वका प्रतिपादन करनेवाली तो सहस्रों श्रुतियाँ विद्यमान हैं ।

तथा तुमने जो कहा कि ज्ञानादि लक्षणोंमें भेद होनेके कारण जीव और ईश्वरका भेद ही है, सो इस विषयमें मेरा यह कथन है कि उनमें कुछ भी भेद नहीं है, क्योंकि हमें उनके ज्ञानादिका भेद मान्य नहीं है । बुद्धि आदि उपाधियोंसे व्यतिरिक्त और विलक्षण ऐसे कोई जीव नहीं हैं जो ईश्वरसे भिन्न लक्षणवाले हों । एक ही नित्यमुक्त ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा माना जाता है; क्योंकि चक्षु और बुद्धि आदि संघातकी परम्परासे प्राप्त हुए अहंकार और ममतारूप विपरीत ज्ञानका विच्छेद न होना ही जिसका लक्षण है, नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त विज्ञानस्वरूप ईश्वर ही जिसका अन्तर्यामी है, जो स्वयं नित्यविज्ञानका अवभास (प्रतिबिम्ब) चित्त, चैत्य (सुखादि विषय), बीज (अविद्यादि) और बीजी (शरीरादि)-से तादात्म्यको प्राप्त होकर तद्रूप हो गया है तथा जो कल्पित, अनित्य विज्ञानवान् और ईश्वरके लक्षणसे विपरीत है वही बाह्य जीव माना गया है; जिसके इस औपाधिक स्वरूपका विच्छेद न होनेसे संसारका व्यवहार होता है तथा विच्छेद हो जानेपर मोक्षव्यवहार होता है ।

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न ।

कस्मात्?

‘अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद’ (बृ० उ० १ । ४ । १०) ‘ते क्षय्यलोका भवन्ति’ (छा० उ० ७ । २५ । २) ‘मृत्योः स मृत्युमाप्नोति’ (क० उ० २ । १ । १०) इति भेददृष्टिर्ह्यपोह्यते । एकत्वप्रतिपादिन्यश्च श्रुतयः सहस्रशो विद्यन्ते ।

यदुक्तं ज्ञानादिलक्षणभेदादिअनादिभेदस्य त्यत्रोच्यते—न औपाधिकत्वम् अनभ्युपगमात् । बुद्ध्यादिभ्यो व्यतिरिक्ता विलक्षणाश्चेश्वराद्भिन्नलक्षणा आत्मनो न सन्ति । एक एवेश्वरश्चात्मा सर्वभूतानां नित्यमुक्तोऽभ्युपगम्यते । बाह्यश्चचक्षुर्बुद्ध्यादिसमाहारसन्तानाहंकारममत्वादिविपरीतप्रत्ययप्रबन्धाविच्छेदलक्षणो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तविज्ञानात्मेश्वरगर्भो नित्यविज्ञानाभासश्चित्तचैत्यबीजबीजिस्वभावः कल्पितोऽनित्यविज्ञान ईश्वरलक्षणविपरीतोऽभ्युपगम्यते; यस्याविच्छेदे संसारव्यवहारो विच्छेदे च मोक्षव्यवहारः ।

वाक्य-भाष्य

इसमें जो देव, पितृ और मनुष्यरूप भूतोंका संघातविशेष है वह मृत्तिकाके लेपके समान प्रत्यक्ष नष्ट हो जानेवाला और [चेतन आत्मासे] सर्वथा भिन्न है; किन्तु जो [स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों प्रकारके शरीरोंसे] विलक्षण चौथा आत्मा है वह ईश्वरसे भिन्न लक्षणोंवाला नहीं माना जा सकता ।

यदि कहो कि बुद्धि आदि कल्पित आत्मासे [निरुपाधिक चेतनस्वरूप] आत्मा भिन्न है इस अभिप्रायसे हमने ‘लक्षणभेद होनेके कारण’ ऐसा हेतु दिया है, तो तुम्हारा यह हेतु आश्रयासिद्ध* है, क्योंकि ईश्वरसे भिन्न और किसी आत्माकी सत्ता नहीं है ।

[ * ]: जहाँ पक्षमें पक्षतावच्छेदकालका अभाव होता है वहाँ आश्रयासिद्ध हेत्वाभास माना जाता है; जैसे—‘आकाशकुसुम सुगन्धिमान् है कुसुम होनेके कारण, अन्यकुसुमवत् । इस

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अन्यश्च मृत्प्रलेपवत्प्रत्यक्षप्रध्वंसो देवपितृमनुष्यादिलक्षणो भूतविशेषसमाहारो न पुनश्चतुर्थोऽन्यो भिन्नलक्षण ईश्वरादभ्युपगम्यते ।

बुद्ध्यादिकल्पितात्मव्यतिरेकाभिप्रायेण तु लक्षणभेदाद् इत्याश्रयासिद्धो हेतुरीश्वराद् अन्यस्यात्मनोऽसत्त्वात् ।

वाक्य-भाष्य

पूर्व०—[यदि ईश्वरसे भिन्न और कोई आत्मा नहीं है तो] ईश्वरमें ही विरुद्धलक्षणत्व तथा सुख-दुःख आदिका योग होना तो ठीक नहीं है । सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि आत्मा सूर्यके समान केवल निमित्तमात्र है; लोगोंकी उसमें जो विपरीत बुद्धि है वह केवल आरोपके कारण है । जिस प्रकार सूर्य नित्यप्रकाशस्वरूप होनेके कारण लौकिक पदार्थोंकी अभिव्यक्ति और अनभिव्यक्तिका निमित्तमात्र होता है तथापि लोगोंकी दृष्टिमें विपरीत भाव आ जानेके कारण इस अध्यारोपका पात्र बनता है कि वह उदय-अस्त और दिन-रात्रि आदिका कर्ता है, उसी प्रकार नित्यविज्ञानशक्तिस्वरूप ईश्वरमें भी लोगोंके ज्ञानका विनाश तथा सुख, दुःख और स्मृति आदिकी निमित्तता उपस्थित होनेपर लोगोंकी विपरीत बुद्धिसे विपरीतलक्षणत्व तथा सुख-दुःखाश्रयत्वका आरोप कर लिया जाता है, उसमें स्वतः ऐसा कोई भाव नहीं है ।

[ * ]: अनुमानमें ‘आकाशकुसुम’ जो पक्ष है उसमें पक्षतावच्छेदकाल यानी कुसुमत्वका अभाव है, क्योंकि आकाशकुसुम कभी किसीने नहीं देखा । इसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये ।’

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ईश्वरस्यैव विरुद्धलक्षणत्वमयुक्तमिति चेत्सुखदुःखादियोगश्च । न । निमित्तत्वे सति लोकविपर्ययाध्यारोपणात्सवितृवत् । यथा हि सविता नित्यप्रकाशरूपत्वाल्लोकाभिव्यक्त्यनभिव्यक्तिनिमित्तत्वे सति लोकदृष्टिविपर्ययेणोदयास्तमयाहोरात्रादिकर्तृत्वाध्यारोपभाग्भवत्येवमीश्वरे नित्यविज्ञानशक्तिरूपे लोकज्ञानापोहसुखदुःखस्मृत्यादिनिमित्तत्वे सति लोकविपरीतबुद्ध्याध्यारोपितंविपरीतलक्षणत्वं सुखदुःखाश्रयश्च न स्वतः ।

वाक्य-भाष्य

इसके सिवा सभी जीव अपनी-अपनी दृष्टिके अनुरूप ही उसमें आरोप करते हैं [इसलिये भी वह उन सब आरोपोंसे अछूता है] । जिस प्रकार आकाशके मेघ आदिसे आच्छादित हो जानेपर जिस-जिसको सूर्यका प्रकाश दिखलायी नहीं देता वही-वही अन्यत्र प्रकाश रहनेपर भी भ्रान्तिवश अपनी दृष्टिके अनुसार ऐसा आरोप करता है कि ‘इस समय यहाँ सूर्य प्रकाशमान नहीं है ।’ इसी प्रकार इस आत्मतत्त्वमें भी बुद्धि आदिकी वृत्तियोंके उदय और अस्तसे वैचित्र्यको प्राप्त हुई भ्रान्तिसे आरोपित सुख-दुःखादिका योग हो सकता है ।

इस विषयमें उसीकी स्मृति भी है अर्थात् उस ईश्वरके ही स्मृतिवाक्य भी हैं; जैसे—‘मुझहीसे प्राणियोंको स्मृति, ज्ञान और अज्ञान प्राप्त होते हैं’ ‘ईश्वर किसीके पापको स्वीकार नहीं करता’ इत्यादि । अतः सूर्यके समान एक ही नित्यमुक्त ईश्वरमें लोकने अविद्यावश संसारित्वका आरोप कर रखा है, तथा शास्त्रादि प्रमाणोंसे उसका असंसारित्व जाना गया है; इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं है ।

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आत्मदृष्ट्यनुरूपाध्यारोपाच्च । यथा घनादिविप्रकीर्णेऽम्बरे येनैव सवितृप्रकाशो न दृश्यते स आत्मदृष्ट्यनुरूपमेवाध्यस्यति सवितेदानीमिह न प्रकाशयतीति सत्येव प्रकाशेऽन्यत्र भ्रान्त्या । एवमिह बौद्धादिवृत्त्युद्भवाभिभवाकुलभ्रान्त्याध्यारोपितः सुखदुःखादियोग उपपद्यते ।

तत्स्मरणाच्च । तस्यैवेश्वरस्यैव हि स्मरणम्—‘मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च’ (गीता १५ । १५) ‘नादत्ते कस्यचित्पापम्’ (गीता ५ । १५) इत्यादि । अतो नित्यमुक्त एकस्मिन्सवितरीव लोकाविद्याध्यारोपितमीश्वरे संसारित्वम् । शास्त्रादिप्रामाण्यादभ्युपगतमसंसारित्वमित्यविरोध इति ।