ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त ॥ १ ॥
brahma ha devebhyo vijigye tasya ha brahmaṇo vijaye devā amahīyanta .. 1 ..
यह प्रसिद्ध है कि ब्रह्माने देवताओंके लिये विजय प्राप्त की । कहते हैं, उस ब्रह्मकी विजयमें देवताओंने गौरव प्राप्त किया ॥ १ ॥
पद-भाष्य
यह प्रसिद्ध है कि उपर्युक्त लक्षणोंवाले परब्रह्माने देवताओंके लिये जय प्राप्त की । अर्थात् देवता और असुरोंके
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ब्रह्म यथोक्तलक्षणं परं ह किल देवेभ्योऽर्थाय विजिग्ये जयं लब्धवत् देवानामासुराणां च
वाक्य-भाष्य
इससे प्रत्येक जीवके ज्ञानादि भेदका प्रत्याख्यान हो गया, क्योंकि उन सभीमें सूक्ष्मता, चैतन्य और सर्वगतत्वादि धर्म समानरूपसे रहनेके कारण भेदके हेतुका अभाव है । यदि उन्हें विकारी माना जाय तो वे अनित्य हो जायँगे । इसके सिवा मुक्तावस्थामें किसीने भी आत्माका कोई विशेष भाव नहीं माना, यदि कोई मानेगा तो अनित्यत्वका प्रसंग उपस्थित हो जायगा । तथा भेद तो केवल अविद्यावान्को ही उपलब्ध होता है, अविद्याका क्षय होनेपर उसकी सिद्धि नहीं होती । अतः [जीव और ईश्वरका] एकत्व ही सिद्ध होता है ।
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एतेन प्रत्येकं ज्ञानादिभेदः प्रत्युक्तः सौक्ष्म्यचैतन्यसर्वगतत्वाद्यविशेषे च भेदहेत्वभावात् । विक्रियावत्त्वे चानित्यत्वात् । मोक्षे च विशेषानभ्युपगमादभ्युपगमे चानित्यत्वप्रसङ्गात् । अविद्यावदुपलभ्यत्वाच्च भेदस्य । तत्क्षयेऽनुपपत्तिरिति सिद्धम् एकत्वम् ।
पद-भाष्य
संग्राममें संसारके शत्रु तथा ईश्वरकी मर्यादा भंग करनेवाले असुरोंको जीतकर जगत्की स्थितिके लिये वह जय और उसका फल देवताओंको दे दिया । कहते हैं, ब्रह्मकी उस विजयमें अग्नि आदि देवगण महिमाको प्राप्त हुए ॥ १ ॥
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संग्रामेऽसुराज्जित्वा जगदरातीनीश्वरसेतुभेत्तृन् देवेभ्यो जयं तत्फलं च प्रायच्छज्जगतः स्थेम्ने । तस्य ह किल ब्रह्मणो विजये देवाः, अग्न्यादयः, अमहीयन्त महिमानं प्राप्तवन्तः ॥ १ ॥