खण्ड 3 - मन्त्र 10

तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं स तत एव निवृवृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ १० ॥

tasmai tṛṇaṃ nidadhāvetadādatsveti tadupapreyāya sarvajavena tanna śaśākādātuṃ sa tata eva nivṛvṛte naitadaśakaṃ vijñātuṃ yadetadyakṣamiti .. 10 ..


तब यक्ष ने उस वायु के लिये एक तिनका रखा और कहा—‘इसे ग्रहण कर ।’ वायु उस तृण के समीप गया । परन्तु अपने सारे वेग से भी वह उसे ग्रहण करने में समर्थ न हुआ । तब वह उसके पास से लौट आया और बोला—‘यह यक्ष कौन है—इस बात को मैं नहीं जान सका’ ॥ १० ॥

पद-भाष्य

तदनन्तर उन्होंने वायु से कहा—‘हे वायो! इसे जानो’ इत्यादि सब अर्थ पहलेही के समान है । [वायु को] वान अर्थात् गमन या गन्ध ग्रहण करने के कारण ‘वायु’ कहा जाता है । ‘मातरि’ अर्थात् अन्तरिक्ष में श्वयन (विचरण) करने के कारण वह ‘मातरिश्वा’ है । पृथिवी में जो कुछ है मैं इस सभी को ग्रहण कर सकता हूँ—इत्यादि शेष अर्थ पहलेही के समान है ॥ ७—१० ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अथ अनन्तरं वायुमब्रुवन् हे वायो एतद्विजानीहीत्यादि समानार्थं पूर्वेण । वानाद्गमनाद्गन्धनाद्वा वायुः । मातर्यन्तरिक्षे श्वयतीति मातरिश्वा । इदं सर्वमपि आददीय गृह्णीयां यदिदं पृथिव्यामित्यादि समानमेव ॥ ७—१० ॥

पद-भाष्य