खण्ड 3 - मन्त्र 11

अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति तदभ्यद्रवत्तस्मात्तिरोदधे ॥ ११ ॥

athendramabruvanmaghavannetadvijānīhi kimetadyakṣamiti tatheti tadabhyadravattasmāttirodadhe .. 11 ..


तदनन्तर देवताओं ने इन्द्र से कहा—‘मघवन्! यह यक्ष कौन है—इस बात को मालूम करो ।’ तब इन्द्र ‘बहुत अच्छा’ कह उस यक्ष के पास गया, किन्तु वह इन्द्र के सामने से अन्तर्धान हो गया ॥ ११ ॥

वाक्य-भाष्य

देवताओं ने उसे जानने के लिये अग्नि से कहा । अग्नि और वायु के सामने तृण रखने में ब्रह्म का यह अभिप्राय था कि एक तिनके को जलाने और ग्रहण करने में असमर्थ होने से इन अत्यन्त प्रतिष्ठित अग्नि और वायु का आत्माभिमान क्षीण हो जाय ॥ ३—१० ॥
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तद्विज्ञानायाग्निमब्रुवन् । तृणनिधानेऽयमभिप्रायोऽत्यन्तसम्भावितयोरग्निमारुतयोस्तृणदहनादानाशक्त्यात्मसम्भावना शातिता भवेदिति ॥ ३—१० ॥

पद-भाष्य

फिर देवताओं ने इन्द्र से ‘हे मघवन्! इसे जानो’ इत्यादि पूर्ववत् कहा । इन्द्र अर्थात् परमेश्वर, जो बलवान् होने के कारण ‘मघवा’ कहा गया है, बहुत अच्छा—ऐसा कहकर उसकी ओर चला । अपने समीप आये हुए उस इन्द्र के सामने से वह ब्रह्म अन्तर्धान हो गया । इन्द्र का सबसे बढ़ा हुआ इन्द्रत्व का अभिमान तोड़ना चाहिये—इसलिये इन्द्र को ब्रह्म ने संवादमात्र का भी अवसर नहीं दिया ॥ ११ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजानीहीत्यादि पूर्ववत् । इन्द्रः परमेश्वरो मघवा बलवत्त्वात् तथेति तदभ्यद्रवत् । तस्माद् इन्द्रादात्मसमीपं गतात् तद्ब्रह्म तिरोदधे तिरोभूतम् । इन्द्रस्येन्द्रत्वाभिमानोऽतितरां निराकर्तव्य इत्यतः संवादमात्रमपि नादाद्ब्रह्मेन्द्राय ॥ ११ ॥