खण्ड 3 - मन्त्र 12

स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमाग्ँ हैमवतीं ताग्ँ होवाच किमेतद्यक्षमिति ॥ १२ ॥

sa tasminnevākāśe striyamājagāma bahuśobhamānāmumāg̐ haimavatīṃ tāg̐ hovāca kimetadyakṣamiti .. 12 ..


वह इन्द्र उसी आकाश में [जिसमें कि यक्ष अन्तर्धान हुआ था] एक अत्यन्त शोभामयी स्त्री के पास आया और उस सुवर्णाभूषणभूषिता [अथवा हिमालय की पुत्री] उमा (पार्वतीरूपिणी ब्रह्मविद्या) से बोला—‘यह यक्ष कौन है? ’ ॥ १२ ॥

वाक्य-भाष्य

इन्द्र आदित्य अथवा वज्रधारी देवराज का नाम है, क्योंकि दोनों ही अर्थों में कोई विरोध नहीं है । ब्रह्म जो इन्द्र के समीप आते ही अन्तर्धान हो गया इसमें यह अभिप्राय था कि [ब्रह्म ने देखा—] इसे ‘मैं इन्द्र (देवराज) हूँ’ ऐसा सोचकर सबसे अधिक अभिमान है, अतः मेरे साथ अग्नि आदि को जो वाणी का सम्भाषण-
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इन्द्र आदित्यो वज्रभृद्वा अविरोधात् । इन्द्रोपसर्पणे ब्रह्म तिरोदध इत्यत्रायमभिप्रायः—इन्द्रोऽहमित्यधिकतमोऽभिमानोऽस्य सोऽहमग्न्यादिभिः प्राप्तं वाक्सम्भाषण-

पद-भाष्य

वह यक्ष जिस आकाश में—आकाश के जिस भाग में अपना दर्शन देकर तिरोहित हुआ था और उसके तिरोहित होने के समय इन्द्र जिस आकाश में था, वह इन्द्र यह सोचता हुआ कि ‘यह यक्ष कौन है? ’ उसी आकाश में खड़ा रहा । अग्नि आदि के समान पीछे नहीं लौटा ।

उस इन्द्र की यक्ष में भक्ति जानकर स्त्रीवेषधारिणी उमारूपा विद्यादेवी प्रकट हुई । वह इन्द्र उस अत्यन्त शोभामयी हैमवती उमा के पास गया । समस्त शोभायमानों में विद्या ही सबसे अधिक शोभामयी है; इसलिये उसके लिये ‘बहुशोभमाना’ यह विशेषण उचित ही है ।

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तद्यक्षं यस्मिन्नाकाशे आकाशप्रदेशे आत्मानं दर्शयित्वा तिरोभूतमिन्द्रश्च ब्रह्मणस्तिरोधानकाले यस्मिन्नाकाशे आसीत्, स इन्द्रस्तस्मिन्नेव आकाशे तस्थौ किं तद्यक्षमिति ध्यायन्; न निवृवृतेऽग्न्यादिवत् ।

तस्येन्द्रस्य यक्षे भक्तिं बुद्ध्वा विद्या उमारूपिणी प्रादुर्भूतस्त्रीरूपा । स इन्द्रस्ताम् उमां बहुशोभमानाम्—सर्वेषां हि शोभमानानां शोभनतमा विद्या, तदा बहुशोभमानेति विशेषणमुपपन्नं भवित;

वाक्य-भाष्य

मात्र भी प्राप्त हो गया था उसके लिये भी मैं इसे प्राप्त न हो सका—ऐसा सोचकर यह किसी तरह अपना अभिमान छोड़ दे । अतः उस पर कृपा करने के लिये ही ब्रह्म अन्तर्धान हो गया ॥ ११ ॥
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मात्रमप्यनेन न प्राप्तोऽस्मीत्यभिमानं कथं न नाम जह्यादिति तदनुग्रहायैवान्तर्हितं तद्ब्रह्म बभूव ॥ ११ ॥

वाक्य-भाष्य

इस प्रकार अभिमान शान्त हो जाने पर इन्द्र ब्रह्म का अत्यन्त जिज्ञासु होकर उसी आकाश में, जिसमें कि ब्रह्म का आविर्भाव एवं तिरोभाव हुआ था, एक अत्यन्त रूपवती स्त्री—विद्या-देवी के पास आया । ब्रह्म के गुप्त हो जाने के अभिप्राय को प्रकट करने की
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स शान्ताभिमान इन्द्रोऽत्यर्थं ब्रह्म विजिज्ञासुर्यस्मिन्नाकाशे ब्रह्मणः प्रादुर्भाव आसीत्तिरोधानं च तस्मिन्नेव स्त्रियमतिरूपिणीं विद्यामाजगाम । अभिप्रायोद्बोधहेतुत्वाद्रुद्रपत्युमा हैमवतीव सा

पद-भाष्य

हैमवती अर्थात् हेम (सुवर्ण)-निर्मित आभूषणोंवाली के समान अत्यन्त शोभामयी । अथवा हिमवान् की कन्या होने से उमा (पार्वती) ही हैमवती है । वह सर्वदा उस सर्वज्ञ ईश्वर के साथ वर्तमान रहती है; अतः उसे जानने में समर्थ होगी—यह सोचकर इन्द्र उसके पास गया, और उससे पूछा—‘बतलाइये, इस प्रकार दर्शन देकर छिप जानेवाला यह यक्ष कौन है? ’ ॥ १२ ॥
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हैमवतीं हेमकृताभरणवतीमिव बहुशोभमानामित्यर्थः; अथवा उमैव हिमवतो दुहिता हैमवती नित्यमेव सर्वज्ञेनेश्वरेण सह वर्तत इति ज्ञातुं समर्थेति कृत्वा ताम्—उपजगाम इन्द्रस्तां ह उमां किल उवाच पप्रच्छ—ब्रूहि किमेतद्दर्शयित्वा तिरोभूतं यक्षमिति ॥ १२ ॥

इति तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥

वाक्य-भाष्य

कारण होने से वह रुद्रपत्नी हिमालयपुत्री पार्वती के समान शोभामयी ब्रह्मविद्या ही थी, क्योंकि विद्यावान् पुरुष रूपहीन होने पर भी बहुत शोभा पाता है ॥ १२ ॥
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शोभमाना विद्यैव । विरूपोऽपि विद्यावान्बहु शोभते ॥ १२ ॥

इति तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥


चतुर्थ खण्ड