३.२
त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति ।
तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति ॥ २ ॥
ta aikṣantāsmākamevāyaṃ vijayo’smākamevāyaṃ mahimeti .
taddhaiṣāṃ vijajñau tebhyo ha prādurbabhūva tanna vyajānata kimidaṃ yakṣamiti .. 2 ..
उन्होंने सोचा हमारी ही यह विजय है और हमारी ही यह महिमा है । कहते हैं, वह ब्रह्म देवताओंके अभिप्रायको जान गया और उनके सामने प्रादुर्भूत हुआ । तब देवतालोग [यक्षरूपमें प्रकट हुए] उस ब्रह्मको ‘यह यक्ष कौन है? ’ ऐसा न जान सके ॥ २ ॥
वाक्य-भाष्य
अतः अहंकारके सम्बन्धसे अज्ञानके बीजभूत शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, विषय और इन्द्रियज्ञानके प्रवाहकी, जो नित्यविज्ञानस्वरूप आत्मासे भिन्न किसी अन्य निमित्तसे स्थित है, आत्मतत्त्वके यथार्थ ज्ञानसे निवृत्ति हो जानेपर जो अज्ञानके बीजका उच्छेद हो जाना है वही आत्माका मोक्ष कहलाता है और उससे विपरीतका नाम बन्ध है, क्योंकि वे [बन्ध और मोक्ष] दोनों ही [बुद्ध्यादि उपाधि-विशिष्ट] स्वरूपकी अपेक्षासे हैं ।
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तस्माच्छरीरेन्द्रियमनोबुद्धिबन्धमोक्षविषयवेदनासन्तानस्य व्यवस्था अहङ्कारसम्बन्धादज्ञानबीजस्य नित्यविज्ञानान्यनिमित्तस्यात्मतत्त्वयाथात्म्यविज्ञानाद्विनिवृत्तावज्ञानबीजस्य विच्छेद आत्मनो मोक्षसंज्ञा; विपर्यये च बन्धसंज्ञा, स्वरूपापेक्षत्वादुभयोः ।
पद-भाष्य
तब अन्तःकरण में स्थित, प्रत्यगात्मा, सर्वज्ञ, प्राणियों के सम्पूर्ण कर्मफलों का संयोग करानेवाले, सर्वशक्तिमान् एवं जगत् की रक्षा करने के इच्छुक ईश्वर की ही यह सम्पूर्ण जय और महिमा है यह न जानते हुए आत्मा को अग्नि आदि रूपों से परिच्छिन्न माननेवाले
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तदा आत्मसंस्थस्य प्रत्यगात्मन ईश्वरस्य सर्वज्ञस्य सर्वक्रियाफलसंयोजयितुः प्राणिनां सर्वशक्तेः जगतः स्थितिं चिकीर्षोः अयं जयो महिमा चेत्यजानन्तः ते देवा ऐक्षन्त ईक्षितवन्तः अग्न्यादि
वाक्य-भाष्य
‘ब्रह्म ह’ इसमें ‘ह’ ऐतिह्य (इतिहास)-का द्योतक है । कहते हैं, पूर्वकाल में देवासुरसंग्राम में ब्रह्मा ने जगत्स्थिति (लोक-मर्यादा)-की रक्षा के लिये अपनी आज्ञा में चलनेवाले विजयार्थी देवताओं के लिये असुरों को जीत लिया । अर्थात् ब्रह्म की इच्छारूप निमित्त से देवताओं की विजय हो गयी । ब्रह्म की उस विजय में देवताओं को महत्ता प्राप्त हुई । लोक की स्थिति के हेतुभूत यज्ञादि को नष्ट करनेवाले असुरों के पराजित हो जाने पर देवताओं ने वृद्धि अथवा खूब सत्कार प्राप्त किया ॥ १ ॥
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ब्रह्म ह इत्यैतिह्यार्थः । पुरा किल देवासुरसंग्रामे जगत्स्थितिपरिपालयिषयात्मानुशासनानुवर्तिभ्यो देवेभ्योऽर्थिभ्योऽर्थाय विजिग्येऽजैषीदसुरान् । ब्रह्मण इच्छानिमित्तो विजयो देवानां बभूवेत्यर्थः । तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त । यज्ञादिलोकस्थित्यपहारिष्वसुरेषु पराजितेषु देवा वृद्धिं पूजां वा प्राप्तवन्तः ॥ १ ॥
‘त ऐक्षन्त’ इत्यादि शास्त्रवाक्य मिथ्याप्रत्ययरूप होने के कारण [अभिमान का] हेयत्व प्रतिपादन करने के लिये है ।
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त ऐक्षन्त इति मिथ्याप्रत्ययत्वाद्धेयत्वख्यापनार्थमाम्नायः ।
वाक्य-भाष्य
जो विजय ईश्वर के निमित्त से प्राप्त
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ईश्वरनिमित्ते विजये स्वसामर्थ्य
पद-भाष्य
देवता सोचने लगे कि—हमलोगों की ही यह विजय हुई है, और इस विजय की फलभूत अग्नित्व, वायुत्व एवं इन्द्रत्वरूप यह महिमा भी हमारी ही है; अतः हमारे द्वारा ही इसका अनुभव किया जाता है; यह विजय अथवा महिमा हमारे अन्तरात्मभूत ईश्वर की की हुई नहीं है ।
इस प्रकार मिथ्या अभिमान से विचार करनेवाले उन देवताओं के इस मिथ्या विचार को ब्रह्मा ने जान लिया, क्योंकि समस्त जीवों के अन्तःकरणों का प्रेरक होने के कारण वह सबका साक्षी है । देवताओं के इस मिथ्या ज्ञान को जानकर ‘इस मिथ्या ज्ञान से असुरों की ही भाँति
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स्वरूपपरिच्छिन्नात्मकृतोऽस्माकमेवायं विजयः, अस्माकमेवायं महिमा अग्निवायविन्द्रत्वादिलक्षणो जयफलभूतोऽस्माभिरनुभूयते; नास्मत्प्रत्यगात्मभूतेश्वरकृत इति ।
एवं मिथ्याभिमानेक्षणवतां तद् ह किल एषां मिथ्येक्षणं विजज्ञौ विज्ञातवद्ब्रह्म । सर्वैक्षितृ हि तत् सर्वभूतकरणप्रयोक्तृत्वात् । देवानां च मिथ्याज्ञानमुपलभ्य मैवासुरवद्देवा मिथ्याभि
वाक्य-भाष्य
हुई थी उसमें ‘यह हमारी सामर्थ्य से प्राप्त हुई हमारी ही विजय है, हमारी ही महिमा है’ इस प्रकार [अभिमान करके] अपनी विजय आदि कल्याण के हेतुभूत सर्वात्मा सर्वकल्याणास्पद आत्मस्थ ईश्वर को ही आत्मभाव से न जानकर पिण्डमात्र के अभिमानी होकर उन्होंने जो मिथ्या प्रत्यय कर लिया था वह केवल पिण्डमात्र से सम्बन्ध रखनेवाला होने से मिथ्या ज्ञानस्वरूप था । अतः सर्वात्मा ईश्वर के यथार्थ स्वरूप के
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निमित्तोऽस्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेत्यात्मनो जयादि श्रेयोनिमित्तं सर्वात्मानमात्मस्थं सर्वकल्याणास्पदमीश्वरमेवात्मत्वेनाबुद्ध्वा पिण्डमात्राभिमानाः सन्तो यं मिथ्याप्रत्ययं चक्रुस्तस्य पिण्डमात्रविषयत्वेन मिथ्याप्रत्ययत्वात्सर्वात्मेश्वरयाथात्म्याव
पद-भाष्य
देवताओं का भी पराभव न हो जाय’ इस प्रकार उन पर अनुकम्पा करते हुए यह सोचकर कि ‘देवताओं के मिथ्याज्ञान को निवृत्त करके मैं उन्हें अनुगृहीत करूँ’ वह उन देवताओं के लिये प्रादुर्भूत हुआ अर्थात् अपनी योगमाया के प्रभाव से सबको विस्मित करनेवाले अति अद्भुत रूप से देवताओं की इन्द्रियों का विषय होकर प्रादुर्भूत अर्थात् प्रकट हुआ । उस प्रकट हुए ब्रह्म को देवतालोग यह
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मानात्पराभवेयुरिति तदनुकम्पया देवान्मिथ्याभिमानापनोदनेनानुगृह्णीयामिति तेभ्यो देवेभ्यो ह किलार्थाय प्रादुर्बभूव स्वयोगमाहात्म्यनिर्मितेनात्यद्भुतेन विस्मापनीयेन रूपेण देवानामिन्द्रियगोचरे प्रादुर्बभूव प्रादुर्भूतवत् । तत् प्रादुर्भूतं ब्रह्म न व्यजानत नैव विज्ञातवन्तो
वाक्य-भाष्य
बोध से उसका हेयत्व प्रकट करने के लिये ही यह ‘तद्धैषाम्’ (वह ब्रह्म उन देवताओं के अभिप्राय को जान गया) आदि आख्यायिकारूप आम्नाय (शास्त्र) है ।
कहते हैं, वह ब्रह्म इन देवताओं के मिथ्या अहंकाररूप अभिप्राय को समझ गया—उसे इसका ज्ञान हो गया । उसे जानकर उस मिथ्याभिमान के छेदनद्वारा देवताओं पर अनुग्रह करने की इच्छा से वह देवताओं के ही लिये उनकी इन्द्रियों का विषय होकर उनसे थोड़ी ही दूर पर प्रकट हुआ । वह महेश्वर की मायाशक्ति से ग्रहण किये हुए किसी बड़े ही विचित्र रूपविशेष से प्रकट हुआ, जिसे देखकर भी देवता लोग यह न जान सके—न पहचान सके कि यह यक्ष अर्थात् पूज्य कौन है? ॥ २ ॥
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बोधेन हातव्यताख्यापनार्थस्तद्धैषामित्याद्याख्यायिकाम्नायः ।
तद्ब्रह्म ह किलैषां देवानामाभिप्रायं मिथ्याहङ्काररूपं विजज्ञौ विज्ञातवत् । ज्ञात्वा च मिथ्याभिमानशातनेन तदनुजिघृक्षया देवेभ्योऽर्थाय तेषामेवेन्द्रियगोचरे नातिदूरे प्रादुर्बभूव । महेश्वरशक्तिमायोपात्तेनात्यन्ताद्भुतेन प्रादुर्भूतं किल केनचिद्रूपविशेषेण । तत्किलोपलभमाना अपि देवा न व्यजानत न विज्ञातवन्तः किमिदं यदेतद्यक्षं पूज्यमिति ॥ २ ॥
पद-भाष्य
न जान सके कि यह यक्ष अर्थात् पूजनीय महान् प्राणी कौन है? ॥ २ ॥
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देवाः किमिदं यक्षं पूज्यं महद्भूतमिति ॥ २ ॥