खण्ड 3 - मन्त्र 4

तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥ ४ ॥

tadabhyadravattamabhyavadatko’sītyagnirvā ahamasmītyabravījjātavedā vā ahamasmīti .. 4 ..


अग्नि उस यक्ष के पास गया । उसने अग्नि से पूछा—‘तू कौन है? उसने कहा—‘मैं अग्नि हूँ, मैं निश्चय जातवेदा ही हूँ’ ॥ ४ ॥

पद-भाष्य

तब ‘बहुत अच्छा’ ऐसा कहकर अग्नि उस यक्ष की ओर अभिद्रुत हुआ अर्थात् उसके पास गया । इस प्रकार गये हुए और धृष्ट न होने के कारण अपने समीप चुपचाप खड़े हुए प्रश्न करने की इच्छावाले उस अग्नि से यक्ष ने कहा—‘तू कौन है? ’ ब्रह्म के इस प्रकार पूछने पर—‘मैं अग्नि हूँ—मैं अग्नि नाम से प्रसिद्ध जातवेदा हूँ’—इस प्रकार अग्नि ने दो नाम से प्रसिद्ध होने के कारण अपनी प्रशंसा करते हुए कहा ॥ ४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
तथा अस्तु इति तद् यक्षम् अभि अद्रवत् तत्प्रति गतवानग्निः । तं च गतवन्तं पिपृच्छिषुं तत्समीपेऽप्रगल्भत्वात्तूष्णीं भूतं तद्यक्षम् अभ्यवदद् अग्निं प्रति अभाषत कोऽसीति । एवं ब्रह्मणा पृष्टोऽग्निरब्रवीत्—अग्निर्वा अग्निनामाहं प्रसिद्धो जातवेदा इति च नामद्वयेन प्रसिद्धतयात्मानं श्लाघयन्निति ॥ ४ ॥

पद-भाष्य