तस्मिग्ँस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदग्ँसर्वं दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ५ ॥
tasmig̐stvayi kiṃ vīryamityapīdag̐sarvaṃ daheyaṃ yadidaṃ pṛthivyāmiti .. 5 ..
[फिर यक्ष ने पूछा—] ‘उस [जातवेदारूप] तुझमें सामर्थ्य क्या है? ’ [अग्नि ने कहा—] ‘पृथिवी में यह जो कुछ है उस सभी को जला सकता हूँ’ ॥ ५ ॥
पद-भाष्य
इस प्रकार बोलते हुए उस अग्नि से ब्रह्म ने कहा—‘ऐसे प्रसिद्ध गुण और नामवाले तुझमें क्या वीर्य—सामर्थ्य है? ’ वह बोला—‘पृथिवी पर जो यह चराचररूप जगत् है इस सब को जला सकता हूँ—भस्म कर सकता हूँ ।’ ‘पृथिवी में’ यह केवल उपलक्षण के लिये है, क्योंकि जो वस्तु आकाश में रहती है वह भी अग्नि से जल ही जाती है ॥ ५ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
एवमुक्तवन्तं ब्रह्मावोचत् तस्मिन् एवं प्रसिद्धगुणनामवति त्वयि किं वीर्यं सामर्थ्यम् इति । सोऽब्रवीद् इदं जगत् सर्वं दहेयं भस्मीकुर्यां यद् इदं स्थावरादि पृथिव्याम् इति । पृथिव्यामित्युपलक्षणार्थम्, यतोऽन्तरिक्षस्थमपि दह्यत एवाग्निना ॥ ५ ॥