खण्ड 3 - मन्त्र 6

तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति ।
तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निवृवृते, नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ ६ ॥

tasmai tṛṇaṃ nidadhāvetaddaheti .
tadupapreyāya sarvajavena tanna śaśāka dagdhuṃ sa tata eva nivṛvṛte, naitadaśakaṃ vijñātuṃ yadetadyakṣamiti .. 6 ..


तब यक्ष ने उस अग्नि के लिये एक तिनका रख दिया और कहा—‘इसे जला’ । अग्नि उस तृण के समीप गया, परन्तु अपने सारे वेग से भी उसे जलाने में समर्थ नहीं हुआ । वह उसके पास से ही लौट आया और बोला— ‘यह यक्ष कौन है—इस बात को मैं नहीं जान सका’ ॥ ६ ॥

पद-भाष्य

इस प्रकार अभिमान करनेवाले उस अग्नि के लिये ब्रह्म ने एक तृण रखा अर्थात् उसके आगे तृण डाल दिया । ब्रह्म के ऐसा कहने पर कि ‘तू मेरे सामने इस तिनके को जला; यदि तू इसे जलाने में समर्थ नहीं है तो सर्वत्र जलानेवाला होने का अभिमान छोड़ दे’ वह अपने सारे बल अर्थात् उत्साहकृत सम्पूर्ण वेग से उस तृण के पास गया । किन्तु वह वहाँ जाकर भी उसे जलाने में समर्थ न हुआ ।

इस प्रकार उस तिनके को जलाने में असमर्थ वह अग्नि हतप्रतिज्ञ होने के कारण लज्जित होकर उस यक्ष के पास से चुपचाप देवताओं के प्रति निवृत्त हुआ—अर्थात् उनके पास लौट आया [और बोला—] ‘इस यक्ष को मैं विशेषरूप से ऐसा नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है? ’ ॥ ६ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

तस्मै एवमभिमानवते ब्रह्म तृणं निदधौ पुराग्नेः स्थापितवत् ब्रह्मणा ‘एतत् तृणमात्रं ममाग्रतः दह; न चेदसि दग्धुं समर्थः, मुञ्च दग्धृत्वाभिमानं सर्वत्र’ इत्युक्तस्तत् तृणम् उपप्रेयाय तृणसमीपं गतवान् सर्वजवेन सर्वोत्साहकृतेन वेगेन गत्वा तत् न शशाक नाशकद्दग्धुम् ।

स जातवेदाः तृणं दग्धुमशक्तो व्रीडितो हतप्रतिज्ञस्तत एव यक्षादेव तूष्णीं देवान्प्रति निवृवृते निवृत्तः प्रतिगतवान् न एतद् यक्षम् अशकं शक्तवानहं विज्ञातुं विशेषतः यदेतद्यक्षमिति ॥ ६ ॥