सा ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ १ ॥
sā brahmeti hovāca brahmaṇo vā etadvijaye mahīyadhvamiti tato haiva vidāñcakāra brahmeti .. 1 ..
उस विद्यादेवी ने स्पष्टतया कहा—‘यह ब्रह्म है’ तुम ब्रह्म के ही विजय में इस प्रकार महिमान्वित हुए हो’ । कहते हैं, तभी से इन्द्र ने यह जाना कि यह ब्रह्म है ॥ १ ॥
पद-भाष्य
उसने ‘यह ब्रह्म है’ ऐसा कहा । ‘निस्सन्देह ब्रह्म—ईश्वर के विजय में ही [तुम महिमा को प्राप्त हुए हो] । असुरों को ईश्वर ने ही जीता था; तुम तो उसमें निमित्तमात्र थे । अतः उसके ही विजय में तुम्हें यह महिमा मिली है ।’ मूल में ‘एतत्’ यह क्रियाविशेषण के लिये है । ‘यह हमारी ही विजय है, यह हमारी ही महिमा है’ यह तो तुम्हारा मिथ्या अभिमान ही है । तब उमादेवी के उस वाक्य से ही इन्द्र ने जाना कि ‘यह ब्रह्म है’ । ‘ततः’ पद के साथ ‘ह’ और ‘एव’ ये अव्यय निश्चय कराने के लिये ही प्रयुक्त हुए हैं । [अर्थात् उमा-
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सा ब्रह्मेति होवाच ह किल ब्रह्मणो वै ईश्वरस्यैव विजये—ईश्वरेणैव जिता असुराः; यूयं तत्र निमित्तमात्रम्; तस्यैव विजये—यूयं महीयध्वं महिमानं प्राप्नुथ । एतदिति क्रियाविशेषणार्थम् । मिथ्याभिमानस्तु युष्माकम्—अस्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति । ततः तस्मादुमावाक्याद् ह एव विदाञ्चकार ब्रह्मेति इन्द्रः; अवधारणात्
वाक्य-भाष्य
इन्द्र ने उस उमा से पूछकर उसी के वचन से [ब्रह्म को] जाना था; अतः इन्द्र के बोध की हेतुभूता होने से उमा विद्या ही है । ‘ईश्वर विद्यासहायवान् है’ ऐसी स्मृति भी है । क्योंकि इन्द्र के विज्ञानपूर्वक अग्नि, वायु और इन्द्र—इन देवताओं ने ही ब्रह्म का, उसके नेदिष्ठ अर्थात् अत्यन्त समीप पहुँचकर ब्रह्मविद्याद्वारा स्पर्श किया था—उन्होंने प्रथम यानी पहले-पहल उसे जाना था, इसलिये वे अन्य देवताओं से बढ़े हुए हैं—उनसे अधिक देदीप्यमान होते हैं;
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तां च पृष्ट्वा तस्या एव वचनाद् विदाञ्चकार विदितवान् । अत इन्द्रस्य बोधहेतुत्वाद्विद्यैवोमा । विद्यासहायवानीश्वर इति स्मृतिः । यस्मादिन्द्रविज्ञानपूर्वकम् अग्निवाय्विन्द्रास्ते ह्येनन्नेदिष्ठमतिसमीपं ब्रह्मविद्यया ब्रह्म प्राप्ताः सन्तः पस्पृशुः स्पृष्टवन्तः—ते हि प्रथमः प्रथमं विदाञ्चकार विदाञ्चकुरित्येतत्—तस्मादतितराम्
पद-भाष्य
देवी के वाक्य से ही इन्द्र ने ब्रह्म को जाना] स्वतन्त्रता से नहीं ॥ १ ॥
क्योंकि अग्नि, वायु और इन्द्र—ये देवता ही ब्रह्म के साथ संवाद और दर्शनादि करने के कारण उसकी समीपता को प्राप्त हुए थे—
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ततो हैव इति, न स्वातन्त्र्येण ॥ १ ॥
यस्मादग्निवाय्विन्द्रा एते देवा ब्रह्मणः संवाददर्शनादिना सामीप्यमुपगताः—