तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान्देवान्यदग्निर्वायुरिन्द्रस्ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुस्ते ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ २ ॥
tasmādvā ete devā atitarāmivānyāndevānyadagnirvāyurindraste hyenannediṣṭhaṃ paspṛśuste hyenatprathamo vidāñcakāra brahmeti .. 2 ..
क्योंकि अग्नि, वायु और इन्द्र—इन देवताओं ने ही इस समीपस्थ ब्रह्म का स्पर्श किया था और उन्होंने ही उसे पहले-पहल ‘यह ब्रह्म है’ ऐसा जाना था, अतः वे अन्य देवताओं से बढ़कर हुए ॥ २ ॥
पद-भाष्य
इसलिये निश्चय ही ये देवगण अपने शक्ति एवं गुण आदि महान् सौभाग्यों के कारण अन्य देवताओं से बढ़कर हुए । ‘इव’ शब्द निरर्थक अथवा निश्चयार्थक है । क्योंकि अग्नि, वायु और इन्द्र—इन देवताओं ने इस ब्रह्म का पूर्वोक्त संवाद आदि प्रकारों से नेदिष्ठ अर्थात् अत्यन्त निकटवर्ती एवं प्रियतम भाव से स्पर्श किया था ।
तात्पर्य पढ़ें
तस्मात् स्वैर्गुणैः अतितरामिव शक्तिगुणादिमहाभाग्यैः, अन्यान् देवान् अतितराम् अतिशेरत इव एते देवाः । इव शब्दोऽनर्थकोऽवधारणार्थो वा । यद् अग्निः, वायुः, इन्द्रस्ते हि देवा यस्माद् एनद् ब्रह्म नेदिष्ठम् अन्तिकतमं प्रियतमं पस्पृशुः स्पृष्टवन्तो यथोक्तैर्ब्रह्मणः संवादादिप्रकारैः, ते हि यस्माच्च
वाक्य-भाष्य
पद-भाष्य
और उन्होंने ही इस ब्रह्म को प्रथम अर्थात् प्रधानरूप से ‘यह ब्रह्म है’ ऐसा जाना था ॥ २ ॥
क्योंकि अग्नि और वायु ने भी इन्द्र के वाक्य से ही उसे जाना था, कारण कि उमा के वाक्य से तो इन्द्र ने ही पहले सुना था कि ‘यह ब्रह्म है’—
तात्पर्य पढ़ें
हेतो, एनद् ब्रह्म प्रथमः प्रथमाः प्रधानाः सन्त इत्येतत्, विदाञ्चकार विदाञ्चकुरित्येद्ब्रह्मेति ॥ २ ॥
यस्मादग्निवायू अपि इन्द्रवाक्यादेव विदाञ्चक्रतुः, इन्द्रेण हि उमावाक्यात्प्रथमं श्रुतं ब्रह्मेति—