खण्ड 4 - मन्त्र 3

तस्माद्वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान्देवान्स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श स ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ ३ ॥

tasmādvā indro’titarāmivānyāndevānsa hyenannediṣṭhaṃ pasparśa sa hyenatprathamo vidāñcakāra brahmeti .. 3 ..


इसलिये इन्द्र अन्य सब देवताओं से बढ़कर हुआ; क्योंकि उसने ही इस समीपस्थ ब्रह्म का स्पर्श किया था—उसने ही पहले-पहल ‘यह ब्रह्म है’ इस प्रकार इसे जाना था ॥ ३ ॥

पद-भाष्य

अतः इन्द्र इन अन्य देवताओं की अपेक्षा भी बढ़कर हुआ, क्योंकि उसीने इसका सबसे समीप से स्पर्श किया था—उसीने इसे सबसे पहले
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तस्माद्वै इन्द्रः, अतितरामिव अतिशेरत इव अन्यान् देवान् । स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श यस्मात्

वाक्य-भाष्य

दीप्तिमान् है, क्योंकि सबसे पहले उसे ही ब्रह्म का ज्ञान हुआ था ॥ १—३ ॥
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अन्यान्देवांस्ततोऽपीन्द्रोऽतितरां दीप्यते । आदौ ब्रह्मविज्ञानात् ॥ १—३ ॥

पद-भाष्य

जाना था कि ‘यह ब्रह्म है’ इस प्रकार इस वाक्य का अर्थ पहले ही कहा जा चुका है ॥ ३ ॥
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स ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेत्युक्तार्थं वाक्यम् ॥ ३ ॥