खण्ड 4 - मन्त्र 4

तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतो व्यद्युतदा ३ इतीन्न्यमीमिषदा ३ इत्यधिदैवतम् ॥ ४ ॥

tasyaiṣa ādeśo yadetadvidyuto vyadyutadā 3 itīnnyamīmiṣadā 3 ityadhidaivatam .. 4 ..


उस ब्रह्म का यह [उपासनासम्बन्धी] आदेश है । जो बिजली के चमकने के समान तथा पलक मारने के समान प्रादुर्भूत हुआ वह उस ब्रह्म का अधिदैवत रूप है ॥ ४ ॥

पद-भाष्य

उस प्रस्तावित ब्रह्म के विषय में यह आदेश यानी उपमोपदेश है । जिस उपमा से उस निरुपम ब्रह्म का उपदेश किया जाता है वह ‘आदेश’ कहा जाता है । वह आदेश क्या है? यह जो लोक में प्रसिद्ध बिजली का चमकना है । यहाँ ‘व्यद्युतत्’ शब्द का ‘प्रकाश किया’ ऐसा अर्थ अनुपपन्न होने के कारण ‘विद्युतो विद्योतनम्—विद्युत्-
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तस्य प्रकृतस्य ब्रह्मण एष आदेश उपमोपदेशः । निरुपमस्य ब्रह्मणो येनोपमानेनोपदेशः सोऽयमादेशः इत्युच्यते । किं तत्? यदेतत् प्रसिद्धं लोके विद्युतो व्यद्युतद् विद्योतनं कृतवदित्येतदनुपपन्नमिति विद्युतो विद्योतन-

वाक्य-भाष्य

उसका यह आदेश है । अर्थात् उस ब्रह्म का यह आगे कहा जानेवाला आदेश—उपासनासम्बन्धी उपदेश है । क्योंकि ब्रह्म देवताओं के सामने विद्युत्के समान सहसा (अकस्मात्) ही प्रकट हो गया था, इसलिये जो यह ब्रह्म प्रकाशमय है वह विद्युत्के प्रकाशके समान प्रकाशित हुआ । ‘आ’ का अर्थ ‘इव’ है; यह ‘आ’ शब्द उपमाके लिये है । जिस प्रकार बिजली सघन अन्धकारको विदीर्ण करके सब ओर प्रकाशित होती है उसी प्रकार वह ब्रह्म देवताओंके सामने सब ओर प्रकाशयुक्त होकर व्यक्त हुआ; इसलिये ‘वह
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तस्यैष आदेशः । तस्य ब्रह्मण एष वक्ष्यमाण आदेश उपासनोपदेश इत्यर्थः । यस्माद्देवेभ्यो विद्युदिव सहसैव प्रादुर्भूतं ब्रह्म द्युतिमत्तस्माद्विद्युतो विद्योतनं यथा यदेतद्ब्रह्म व्यद्युतद्विद्योतितवत् । आ इवेत्युपमार्थ आशब्दः । यथा घनान्धकारं विदार्य विद्युत्सर्वतः प्रकाशत एवं तद्ब्रह्म देवानां पुरतः सर्वतः प्रकाशवद्व्यक्तीभूतमतो

पद-भाष्य

का चमकना’ ऐसा अर्थ माना जाता है । ‘आ’ यह अव्यय उपमाके लिये है । अर्थात् बिजली चमकनेके समान [ऐसा तात्पर्य है] । जैसा कि ‘यथा सकृद्विद्युतम्’ इस अन्य श्रुतिसे भी देखा जाता है, क्योंकि ब्रह्म विद्युत्के समान ही अपनेको एक बार प्रकाशित करके देवताओंके सामनेसे तिरोभूत हो गया था ।

अथवा ‘विद्युतः’ इस पदके आगे ‘तेजः’ पदका अध्याहार करना चाहिये । ‘व्यद्युतत्’ का अर्थ है ‘प्रकाशित हुआ’ तथा ‘आ’ का अर्थ ‘समान’ है । अतः इसका अभिप्राय यह हुआ कि ‘जो बिजलीके तेजके समान एक बार प्रकाशित हुआ ।’

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मिति कल्प्यते । आ ३ इत्युपमार्थः । विद्युतो विद्योतनमिवेत्यर्थः, ‘यथा सकृद्विद्युतम्’ इति श्रुत्यन्तरे च दर्शनात् विद्युदिव हि सकृदात्मानं दर्शयित्वा तिरोभूतं ब्रह्म देवेभ्यः ।

अथवा विद्युतः ‘तेजः’ इत्यध्याहार्यम् । व्यद्युतद् विद्योतितवत् आ ३ इव । विद्युतस्तेजः सकृद्विद्योतितवदिवेत्यभिप्रायः । इतिशब्द आदेशप्रतिनिदेशार्थः—

वाक्य-भाष्य

पद-भाष्य

‘इति’ शब्द आदेशका संकेत करनेके लिये है अर्थात् ‘यह आदेश है’ ऐसा बतलानेके लिये है, और ‘इत्’ शब्द समुच्चयार्थक है ।

इसके सिवा एक दूसरा आदेश यह भी है । वह क्या है? [सुनो—] जिस प्रकार नेत्र निमेष करता है, उसी प्रकार उसने भी निमेष किया । यहाँ स्वार्थमें ‘णिच्’ प्रत्यय हुआ है । ‘आ’ उपमाके ही लिये है । इस प्रकार ‘नेत्रके विषयसे प्रकाशके छिप जानेके समान’ ऐसा अर्थ हुआ । इस तरह यह ब्रह्मकी अधिदैवत—देवताविषयक उपमा दिखलायी गयी ॥ ४ ॥

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इत्ययमादेश इति । इच्छब्दः समुच्चयार्थः ।

अयं चापरस्तस्यादेशः । कोऽसौ? न्यमीमिषद् यथा चक्षुः न्यमीमिषद् निमेषं कृतवत् । स्वार्थे णिच् । उपमार्थ एव आकारः । चक्षुषो विषयं प्रति प्रकाशतिरोभाव इव चेत्यर्थः । इति अधिदैवतं देवताविषयं ब्रह्मण उपमानदर्शनम् ॥ ४ ॥


वाक्य-भाष्य

बिजलीकी चमकके समान है’ इस प्रकार उपासना करनेयोग्य है । जैसा कि वाजसनेयक श्रुतिमें भी ‘यथा सकृद्विद्युतम्’ ऐसा कहा है ।

क्योंकि इन्द्रके समीप जानेके समय ब्रह्म इस प्रकार संकुचित हो गया था, मानो किसीने नेत्र मूँद लिये हों; अतः वह नेत्र मूँदनेके समान तिरोहित हुआ । इस प्रकार वह अधिदैवत ब्रह्मदर्शन है । जो दर्शन देवतासम्बन्धी होता है वह अधिदैवत कहलाता है । ‘इति’ और ‘इत्’ इन दोनों निपातोंका यहाँ कुछ अर्थ नहीं है ॥ ४ ॥

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व्यद्युतदिवेत्युपास्यम् । यथा सकृद्विद्युतमिति च वाजसनेयके ।

यस्माच्चेन्द्रोपसर्पणकालेन्यमीमिषत् । यथा कश्चिच्चक्षुर्निमेषणं कृतवानिति । इतीदित्यनर्थकौ निपातौ । निमिषितवदिव तिरोभूतम् । इति एवमधिदैवतं देवताया अधि यद्दर्शनमधिदैवतं तत् ॥ ४ ॥