tasyaiṣa ādeśo yadetadvidyuto vyadyutadā 3 itīnnyamīmiṣadā 3 ityadhidaivatam .. 4 ..
पद-भाष्य
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वाक्य-भाष्य
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पद-भाष्य
का चमकना’ ऐसा अर्थ माना जाता है । ‘आ’ यह अव्यय उपमाके लिये है । अर्थात् बिजली चमकनेके समान [ऐसा तात्पर्य है] । जैसा कि ‘यथा सकृद्विद्युतम्’ इस अन्य श्रुतिसे भी देखा जाता है, क्योंकि ब्रह्म विद्युत्के समान ही अपनेको एक बार प्रकाशित करके देवताओंके सामनेसे तिरोभूत हो गया था ।
अथवा ‘विद्युतः’ इस पदके आगे ‘तेजः’ पदका अध्याहार करना चाहिये । ‘व्यद्युतत्’ का अर्थ है ‘प्रकाशित हुआ’ तथा ‘आ’ का अर्थ ‘समान’ है । अतः इसका अभिप्राय यह हुआ कि ‘जो बिजलीके तेजके समान एक बार प्रकाशित हुआ ।’
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मिति कल्प्यते । आ ३ इत्युपमार्थः । विद्युतो विद्योतनमिवेत्यर्थः, ‘यथा सकृद्विद्युतम्’ इति श्रुत्यन्तरे च दर्शनात् विद्युदिव हि सकृदात्मानं दर्शयित्वा तिरोभूतं ब्रह्म देवेभ्यः ।
अथवा विद्युतः ‘तेजः’ इत्यध्याहार्यम् । व्यद्युतद् विद्योतितवत् आ ३ इव । विद्युतस्तेजः सकृद्विद्योतितवदिवेत्यभिप्रायः । इतिशब्द आदेशप्रतिनिदेशार्थः—
वाक्य-भाष्य
पद-भाष्य
‘इति’ शब्द आदेशका संकेत करनेके लिये है अर्थात् ‘यह आदेश है’ ऐसा बतलानेके लिये है, और ‘इत्’ शब्द समुच्चयार्थक है ।
इसके सिवा एक दूसरा आदेश यह भी है । वह क्या है? [सुनो—] जिस प्रकार नेत्र निमेष करता है, उसी प्रकार उसने भी निमेष किया । यहाँ स्वार्थमें ‘णिच्’ प्रत्यय हुआ है । ‘आ’ उपमाके ही लिये है । इस प्रकार ‘नेत्रके विषयसे प्रकाशके छिप जानेके समान’ ऐसा अर्थ हुआ । इस तरह यह ब्रह्मकी अधिदैवत—देवताविषयक उपमा दिखलायी गयी ॥ ४ ॥
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इत्ययमादेश इति । इच्छब्दः समुच्चयार्थः ।
अयं चापरस्तस्यादेशः । कोऽसौ? न्यमीमिषद् यथा चक्षुः न्यमीमिषद् निमेषं कृतवत् । स्वार्थे णिच् । उपमार्थ एव आकारः । चक्षुषो विषयं प्रति प्रकाशतिरोभाव इव चेत्यर्थः । इति अधिदैवतं देवताविषयं ब्रह्मण उपमानदर्शनम् ॥ ४ ॥
वाक्य-भाष्य
बिजलीकी चमकके समान है’ इस प्रकार उपासना करनेयोग्य है । जैसा कि वाजसनेयक श्रुतिमें भी ‘यथा सकृद्विद्युतम्’ ऐसा कहा है ।
क्योंकि इन्द्रके समीप जानेके समय ब्रह्म इस प्रकार संकुचित हो गया था, मानो किसीने नेत्र मूँद लिये हों; अतः वह नेत्र मूँदनेके समान तिरोहित हुआ । इस प्रकार वह अधिदैवत ब्रह्मदर्शन है । जो दर्शन देवतासम्बन्धी होता है वह अधिदैवत कहलाता है । ‘इति’ और ‘इत्’ इन दोनों निपातोंका यहाँ कुछ अर्थ नहीं है ॥ ४ ॥
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व्यद्युतदिवेत्युपास्यम् । यथा सकृद्विद्युतमिति च वाजसनेयके ।
यस्माच्चेन्द्रोपसर्पणकालेन्यमीमिषत् । यथा कश्चिच्चक्षुर्निमेषणं कृतवानिति । इतीदित्यनर्थकौ निपातौ । निमिषितवदिव तिरोभूतम् । इति एवमधिदैवतं देवताया अधि यद्दर्शनमधिदैवतं तत् ॥ ४ ॥