athādhyātmaṃ yadetadgacchatīva ca mano’nena caitadupasmaratyabhīkṣṇaṃ saṅkalpaḥ .. 5 ..
पद-भाष्य
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वाक्य-भाष्य
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पद-भाष्य
मनका संकल्प भी ब्रह्मको ही विषय करनेवाला है । ब्रह्म मनरूप उपाधिवाला है; इसलिये मनकी संकल्प एवं स्मृति आदि प्रतीतियोंसे मानो विषय किया जाता हुआ ब्रह्म ही अभिव्यक्त होता है । अतः यह उस ब्रह्मका अध्यात्म आदेश है ।
विद्युत् और निमेषोन्मेषके समान ब्रह्म शीघ्र प्रकाशित होनेवाला है—यह अधिदैवत आदेश कहा गया और वह मनकी प्रतीतिके समकालमें अभिव्यक्त होनेवाला है—यह उसका अध्यात्म आदेश है । इस प्रकार उपदेश किया हुआ ब्रह्म मन्दबुद्धियोंकी समझमें आ जाता है—इसलिये यह [सोपाधिक]
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मनसो ब्रह्मविषयः । मनउपाधिकत्वाद्धि मनसः सङ्कल्पस्मृत्यादिप्रत्ययैरभिव्यज्यते ब्रह्म, विषयीक्रियमाणमिव । अतः स एष ब्रह्मणोऽध्यात्ममादेशः ।
विद्युन्निमेषणवदधिदैवतं द्रुतप्रकाशनधर्मि, अध्यात्मं च मनःप्रत्ययसमकालाभिव्यक्तिधर्मि—इत्येष आदेशः । एवमादिश्यमानं हि ब्रह्म मन्दबुद्धिगम्यं भवतीति
वाक्य-भाष्य
मनका अविषय है; इसलिये वह उसतक नहीं पहुँच सकता, जैसा कि पहले कह चुके हैं कि ‘जिससे मन मनन किया कहा जाता है ।’ अतः मनका भी मन होनेके कारण ‘गच्छतीव’ (मानो जाता है) ऐसा कहा गया है ।
अर्थात् ब्रह्मका स्वरूपभूत होनेके कारण मन उसके समीप रहता है । क्योंकि विद्वान् इस मनसे ही उस ब्रह्मका स्मरण करता है इसलिये [मन] ब्रह्मके समीप मानो जाता है, ऐसा
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मनसोऽविषयत्वाद्ब्रह्मणोऽतो मनो न गच्छति । येनाहुर्मनो मतमिति हि चोक्तम् । तु गच्छतीवेति मनसोऽपि मनस्त्वात् ।
आत्मभूतत्वाच्च ब्रह्मणस्तत्समीपे मनो वर्तत इति । उपस्मरत्यनेन मनसैव तद्ब्रह्म विद्वान्यस्मात्तस्माद्ब्रह्म गच्छतीवेत्युच्यते ।