खण्ड 4 - मन्त्र 5

अथाध्यात्मं यदेतद्गच्छतीव च मनोऽनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णं सङ्कल्पः ॥ ५ ॥

athādhyātmaṃ yadetadgacchatīva ca mano’nena caitadupasmaratyabhīkṣṇaṃ saṅkalpaḥ .. 5 ..


इसके अनन्तर अध्यात्म-उपासनाका उपदेश कहते हैं—यह मन जो जाता हुआ-सा कहा जाता है वह ब्रह्म है—इस प्रकार उपासना करनी चाहिये, क्योंकि इससे ही यह ब्रह्मका स्मरण करता है और निरन्तर संकल्प किया जाता है ॥ ५ ॥

पद-भाष्य

इसके पश्चात् अब अध्यात्म अर्थात् प्रत्यगात्मासम्बन्धी आदेश कहा जाता है । यह जो मन जाता हुआ-सा मालूम होता है, सो वह मानो ब्रह्मको ही विषय करता है । और साधक पुरुष इस मनसे जो ब्रह्मका बारम्बार उपस्मरण—समीपसे स्मरण करता है [वह उसका अध्यात्म आदेश है] ।
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अथ अनन्तरम् अध्यात्मं प्रत्यगात्मविषय आदेश उच्यते । यदेतद् गच्छतीव च मनः । एतद्ब्रह्म ढौकत इव विषयीकरोतीव । यच्च अनेन मनसा एतद्ब्रह्म उपस्मरति समीपतः स्मरति साधकः, अभीक्ष्णं भृशम् ।सङ्कल्पश्च-

वाक्य-भाष्य

अब आगे अध्यात्म—आत्मविषयक उपासना कही जाती है—इस प्रकार इस वाक्यमें ‘उच्यते’ यह क्रियापद शेष है । जो यह मन उपर्युक्त लक्षणोंवाले ब्रह्मके प्रति मानो जाता—प्राप्त होता अर्थात् विषय करता है [वह ब्रह्म है—इस प्रकार उपासना करनी चाहिये] । मन वस्तुतः ब्रह्मको विषय नहीं करता, क्योंकि ब्रह्म तो
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अथ अनन्तरमध्यात्ममात्मविषयमध्यात्ममुच्यत इति वाक्यशेषः । यदेतद्यथोक्तलक्षणं ब्रह्म गच्छतीव प्राप्नोतीव विषयीकरोतीवेत्यर्थः । न पुनर्विषयीकरोति

पद-भाष्य

मनका संकल्प भी ब्रह्मको ही विषय करनेवाला है । ब्रह्म मनरूप उपाधिवाला है; इसलिये मनकी संकल्प एवं स्मृति आदि प्रतीतियोंसे मानो विषय किया जाता हुआ ब्रह्म ही अभिव्यक्त होता है । अतः यह उस ब्रह्मका अध्यात्म आदेश है ।

विद्युत् और निमेषोन्मेषके समान ब्रह्म शीघ्र प्रकाशित होनेवाला है—यह अधिदैवत आदेश कहा गया और वह मनकी प्रतीतिके समकालमें अभिव्यक्त होनेवाला है—यह उसका अध्यात्म आदेश है । इस प्रकार उपदेश किया हुआ ब्रह्म मन्दबुद्धियोंकी समझमें आ जाता है—इसलिये यह [सोपाधिक]

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मनसो ब्रह्मविषयः । मनउपाधिकत्वाद्धि मनसः सङ्कल्पस्मृत्यादिप्रत्ययैरभिव्यज्यते ब्रह्म, विषयीक्रियमाणमिव । अतः स एष ब्रह्मणोऽध्यात्ममादेशः ।

विद्युन्निमेषणवदधिदैवतं द्रुतप्रकाशनधर्मि, अध्यात्मं च मनःप्रत्ययसमकालाभिव्यक्तिधर्मि—इत्येष आदेशः । एवमादिश्यमानं हि ब्रह्म मन्दबुद्धिगम्यं भवतीति

वाक्य-भाष्य

मनका अविषय है; इसलिये वह उसतक नहीं पहुँच सकता, जैसा कि पहले कह चुके हैं कि ‘जिससे मन मनन किया कहा जाता है ।’ अतः मनका भी मन होनेके कारण ‘गच्छतीव’ (मानो जाता है) ऐसा कहा गया है ।

अर्थात् ब्रह्मका स्वरूपभूत होनेके कारण मन उसके समीप रहता है । क्योंकि विद्वान् इस मनसे ही उस ब्रह्मका स्मरण करता है इसलिये [मन] ब्रह्मके समीप मानो जाता है, ऐसा

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मनसोऽविषयत्वाद्ब्रह्मणोऽतो मनो न गच्छति । येनाहुर्मनो मतमिति हि चोक्तम् । तु गच्छतीवेति मनसोऽपि मनस्त्वात् ।

आत्मभूतत्वाच्च ब्रह्मणस्तत्समीपे मनो वर्तत इति । उपस्मरत्यनेन मनसैव तद्ब्रह्म विद्वान्यस्मात्तस्माद्ब्रह्म गच्छतीवेत्युच्यते ।

पद-भाष्य

ब्रह्मका उपदेश है, क्योंकि मन्दबुद्धि पुरुषोंद्वारा निरुपाधिक ब्रह्मका ही ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता ॥ ५ ॥
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ब्रह्मण आदेशोपदेशः । न हि निरुपाधिकमेव ब्रह्म मन्दबुद्धिभिराकलयितुं शक्यम् ॥ ५ ॥

वन-संज्ञक ब्रह्मकी उपासनाका फल

। तथा
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किं च—