खण्ड 4 - मन्त्र 6

तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाभि हैनग्ँ सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ॥ ६ ॥

taddha tadvanaṃ nāma tadvanamityupāsitavyaṃ sa ya etadevaṃ vedābhi hainag̐ sarvāṇi bhūtāni saṃvāñchanti .. 6 ..


वह यह ब्रह्म ही वन (सम्भजनीय) है । उसकी ‘वन’—इस नामसे उपासना करनी चाहिये । जो उसे इस प्रकार जानता है उसे सभी भूत अच्छी तरह चाहने लगते हैं ॥ ६ ॥

पद-भाष्य

वह ब्रह्म निश्चय ही ‘तद्वन’ नामवाला है । ‘तस्य वनं तद्वनम्’ [इस प्रकार यहाँ षष्ठीतत्पुरुष समास है] । अर्थात् यह उस प्राणिसमूहका प्रत्यगात्मस्वरूप होनेके कारण वन—वननीय अर्थात् भजनीय है । इसलिये इसका नाम ‘तद्वन’ है । क्योंकि ब्रह्म ‘तद्वन’ कहा जाता है । ब्रह्मद्वारा प्रेरित मनका ही बारम्बार संकल्प होता है । अतः तात्पर्य यह है कि स्मरण और संकल्प आदि लिंगोंसे मनकी अध्यात्म ब्रह्मस्वरूपसे उपासना करनी चाहिये ॥ ५ ॥
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तद् ब्रह्म ह किल तद्वनं नाम तस्य वनं तद्वनं तस्य प्राणिजातस्य प्रत्यगात्मभूतत्वाद्वनं वननीयं संभजनीयम् । अतस्तद्वनं नाम; प्रख्यातं ब्रह्म तद्वनमिति यतः,

वाक्य-भाष्य

अभीक्ष्णं पुनः पुनश्च सङ्कल्पो ब्रह्मप्रेषितस्य मनसः । अत उपस्मरणसङ्कल्पादिभिर्लिङ्गैर्ब्रह्ममनोऽध्यात्मभूतमुपास्यमित्यभिप्रायः ॥ ५ ॥

पद-भाष्य

इस नामसे प्रसिद्ध है, इसलिये उसकी ‘तद्वन’ इस गुणव्यंजक नामसे ही उपासना—चिन्तन करना चाहिये ।

इस नामसे की हुई उपासनाका फल बतलाते हैं—‘जो कोई इस पूर्वोक्त ब्रह्मको उपर्युक्त गुणोंसे युक्त जानता अर्थात् उपासना करता है, उस उपासकसे समस्त प्राणी इसी प्रकार अपने सम्पूर्ण अभीष्ट

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तस्मात् तद्वनमिति अनेनैव गुणाभिधानेन उपासितव्यं चिन्तनीयम् ।

अनेन नाम्नोपासनस्य फलमाह स यः कश्चिद् एतद् यथोक्तं ब्रह्म एवं यथोक्तगुणं वेद उपास्ते अभि ह एनम् उपासकं सर्वाणि

वाक्य-भाष्य

उस ब्रह्मकी अध्यात्म-उपासनामें गुणका विधान किया जाता है—

‘वह ब्रह्म तद्वन’ है, यानी ह ब्रह्म तत् अर्थात् परोक्ष और वन—अच्छी तरह भजन करनेयोग्य है । [वन धातुका अर्थ अच्छी प्रकार भजन करना है] तत् शब्द जिसका कर्मभूत है ऐसे वन धातुसे तद्वन शब्द सिद्ध होता है; अतः उसका ‘तद्वन’ नाम है । ब्रह्मका यह नाम गुणविशेषके कारण है । अतः इस गुणके कारण वह ‘वन है’ इस प्रकार उपासना करनेयोग्य है । वह जो कोई उपर्युक्त गुणके कारण पहले कहे हुए ‘वन’ इस नामसे इसके अभिधेय ब्रह्मको जानता अर्थात् उपासना करता है उसके लिये यह फल बतलाया जाता है । इस उपासककी सभी भूत इच्छा करते हैं

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तस्य चाध्यात्ममुपासने गुणो विधीयते—

तद्ध तद्वनम् तदेतद्ब्रह्म तच्च तद्वनं च तत्परोक्षं वनं सम्भजनीयम् । वनतेस्तत्कर्मणस्तस्मात्तद्वनं नाम । ब्रह्मणो गौणं हीदं नाम । तस्मादनेन गुणेन तद्वनमित्युपासितव्यम् । स यः कश्चिदेतद्यथोक्तमेवं यथोक्तेन गुणेन वनमित्यनेन नाम्नाभिधेयं ब्रह्म वेदोपास्ते तस्यैतत्फलमुच्यते । सर्वाणि भूतान्येनमुपासकमभिसंवाञ्छ-

पद-भाष्य

फलोंकी इच्छा यानी प्रार्थना करने लगते हैं, जैसे कि ब्रह्मसे ॥ ६ ॥
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भूतानि अभिसंवाञ्छन्ति ह प्रार्थयन्त एव यथा ब्रह्म ॥ ६ ॥

इस प्रकार उपदेश पाकर शिष्यने आचार्यसे कहा—
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एवमनुशिष्टः शिष्य आचार्यमुवाच—