upaniṣadaṃ bho brūhītyuktā ta upaniṣadbrāhmīṃ vāva ta upaniṣadamabrūmeti .. 7 ..
पद-भाष्य
हे भगवन्! जो चिन्तनीय उपनिषद् यानी रहस्य है वह मुझसे कहिये ।
शिष्यके ऐसा कहनेपर आचार्यने कहा—‘तुझसे उपनिषद् तो कह दी गयी ।’
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उपनिषदं रहस्यं यच्चिन्त्यं भो भगवन् ब्रूहि इति ।
एवमुक्तवति शिष्ये आहाचार्यः—उक्ता अभिहिता ते तव उपनिषत् ।
वाक्य-भाष्य
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वाक्य-भाष्य
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पद-भाष्य
वह उपनिषद् क्या है? सो बतलाते हैं—हमने तेरे प्रति ब्राह्मी— ब्रह्म यानी परमात्मसम्बन्धिनी उपनिषद् ही कही है, क्योंकि पूर्वकथित विज्ञान परमात्मसम्बन्धी ही था । ‘वाव’— निश्चय ही ‘ते उपनिषदमब्रूम’ इस वाक्यके द्वारा पहले कही हुई उपनिषद्को ही लक्ष्य करके ‘मैंने तुमसे परमात्मसम्बन्धिनी उपनिषद् ही कही है’ इस प्रकार[ * ] अगले ग्रन्थका विषय स्पष्ट करनेके लिये निश्चय करते हैं ।
यहाँ परमात्मविषयिणि उपनिषद्को सुन चुकनेवाले शिष्यका ‘उपनिषद् कहिये’ इस प्रकार प्रश्न करनेमें क्या अभिप्राय है? यदि उसने सुनी हुई बातके विषयमें ही पुनः प्रश्न किया है तो उसका पुनः कहना पिष्टपेषण (पिसे हुएको पीसने) के समान निरर्थक ही है । और यदि पहले कही हुई उपनिषद् असम्पूर्ण होती तो
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उपनिषत् । का पुनः सेत्याह ब्राह्मीं ब्रह्मणः परमात्मन इयं ब्राह्मी ताम् परमात्मविषयत्वादतीतविज्ञानस्य, वाव एव ते उपनिषदमब्रूमेति उक्तामेव परमात्मविषयामुपनिषदमब्रूमेत्यवधारयत्युत्तरार्थम् ।
परमात्मविषयामुपनिषदं श्रुतवत उपनिषदं भो ब्रूहीति पृच्छतः शिष्यस्य कोऽभिप्रायः? यदि तावच्छ्रुतस्यार्थस्य प्रश्नः कृतः, ततः पिष्टपेषणवत्पुनरुक्तोऽनर्थकः प्रश्नः स्यात् । अथ सावशेषोक्तोपनिषत्स्यात्, तत
वाक्य-भाष्य
आचार्य बोले—‘मैंने तुझसे उपनिषद् और आत्माकी उपासना कह दी’ । अब हम तुझे ब्राह्मी—ब्रह्मकी—
[ * ]: उपनिषद्के जिज्ञासु शिष्यसे आचार्य पूर्वमें ही उपनिषद्का कथन कर यह स्पष्ट करते हैं कि उत्तर ग्रन्थमें उपनिषद्का वर्णन नहीं है ।
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पद-भाष्य
‘इस लोकसे प्रयाण करनेके अनन्तर वे अमर हो जाते हैं’ इस प्रकार फल बतलाते हुए उसका उपसंहार करना उचित न होता । अतः पूर्वोक्त उपनिषद्के अवशिष्ट (कहनेसे बचे हुए) अंशके सम्बन्धमें प्रश्न करना भी अयुक्त ही है, क्योंकि उसमें कोई बात कहनेसे छोड़ी नहीं गयी । तो फिर प्रश्नकर्ताका क्या अभिप्राय हो सकता है? इसपर कहा जाता है—
पहले जो उपनिषद् कही गयी है उसके अवशेषरूपसे किन्हीं अन्य सहकारी साधनोंकी अपेक्षा है अथवा वह सर्वथा निरपेक्षा ही कही गयी है? यदि वह सापेक्षा है तो अपेक्षित विषयसम्बन्धिनी उपनिषद् कहिये और यदि उसे किसीकी अपेक्षा नहीं है तो पिप्पलादके समान[ * ] इससे पर और कुछ नहीं है—इस प्रकार निर्धारण कीजिये—
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स्तस्याः फलवचनेनोपसंहारो न युक्तः ‘प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति’ (के० उ० २ । ५) इति । तस्मादुक्तोपनिषच्छेषविषयोऽपि प्रश्नोऽनुपपन्न एव, अनवशेषितत्वात् । कस्तर्ह्यभिप्रायः प्रष्टुरित्युच्यते—
किं पूर्वोक्तोपनिषच्छेषतया तत्सहकारिसाधनान्तरापेक्षा, अथ निरपेक्षैव? सापेक्षा चेदपेक्षितविषयामुपनिषदं ब्रूहि । अथ निरपेक्षा चेदवधारय पिप्पलादवन्नातः परमस्तीत्येवमभिप्रायः ।
वाक्य-भाष्य
ब्राह्मण-जातिकी उपनिषद् सुनाते हैं । यह उपनिषद् आगे कही जायगी । अबतक ब्राह्मी उपनिषद् नहीं कही गयी, आत्मासम्बन्धिनी उपनिषद् ही कही गयी है । अतः ‘अब्रूम’ इस शब्दसे भूतकालका अभिप्राय नहीं है ॥ ७ ॥
[ * ]: देखिये प्रश्नोपनिषद् ६ । ७ ।
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पद-भाष्य
यह शिष्यके प्रश्नका अभिप्राय है । अतः आचार्यका ‘तुझसे उपनिषद् कह दी गयी’ यह अवधारणवाक्य ठीक ही है ।
शंका—यह अवधारणवाक्य नहीं हो सकता, क्योंकि ‘तस्यै तपो दमः’ इत्यादि आगामी वाक्यद्वारा कुछ और कहनेयोग्य बात कही गयी है ।
समाधान—ठीक है, आचार्यने एक दूसरे कथनीय विषयको तो कहा है; तथापि उसे पूर्वोक्त उपनिषद्के अवशेषरूप अथवा अन्य सहकारी साधनरूपसे नहीं कहा । बल्कि ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिके उपाय बतलानेके ही अभिप्रायसे कहा है, क्योंकि मन्त्रमें वेद और उनके अंगोंके साथ तप आदिका पाठ करके उनसे इनकी समानता प्रकट की गयी है; क्योंकि वेद और शिक्षादि वेदांग ब्रह्मविद्याके साक्षात् शेषभूत अथवा उसके सहकारी साधन नहीं हो सकते । [अतः इनके साथ पाठ होनेसे तप आदि भी विद्याके अंग या साधन सिद्ध नहीं होते]。
शंका—किन्तु [वेद-वेदांगोंके] साथ-साथ पढ़े हुए होनेपर भी तप आदिका भी सम्बन्धके अनुसार विभाग करके प्रयोग किया जा सकता है । अर्थात् जिस प्रकार सूक्तवाकरूप अनुमन्त्रण मन्त्रोंका उनके देवताओं के अनुसार विभाग किया जाता है[ * ] उसी प्रकार तप, दम, कर्म और सत्यादिको भी ब्रह्मविद्याका शेषभूत अथवा सहकारी साधन माना जा सकता है । वेद और उनके अंग अर्थके प्रकाशक होनेसे कर्म और आत्मज्ञानके साधन हैं—इस प्रकार अर्थके सम्बन्धकी उपपत्तिके सामर्थ्यसे उनका ऐसा विभाग उचित ही है । ऐसा मानें तो?
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ब्रह्मविद्याया
अशेषत्व-
प्रतिपादनम्
एतदुपपन्नमाचार्यस्यावधारणवचनम् ‘उक्ता त उपनिषत्’ इति ।
ननु नावधारणमिदम्, यतोऽन्यद्वक्तव्यमाह ‘तस्यै तपो दमः’ इत्यादि ।
सत्यम्, वक्तव्यमुच्यते आचार्येण तपःप्रभृतीनां न तूक्तोपनिषच्छेषतया तत्सहकारिसाधनान्तराभिप्रायेण वा; किं तु ब्रह्मविद्याप्राप्त्युपायाभिप्रायेण वेदैस्तदङ्गैश्च सहपाठेन समीकरणात्तपःप्रभृतीनाम् । न हि वेदानां शिक्षाद्यङ्गानां च साक्षाद्ब्रह्मविद्याशेषत्वं तत्सहकारिसाधनत्वं वा सम्भवति ।
सहपठितानामपि यथायोगं विभज्य विनियोगः स्यादिति चेत्; यथा सूक्तवाकानुमन्त्रणमन्त्राणां यथादैवतं विभागः; तथा तपोदमकर्मसत्यादीनामपि ब्रह्मविद्याशेषत्वं तत्सहकारिसाधनत्वं वेति कल्प्यते । वेदानां तदङ्गानां चार्थप्रकाशकत्वेन कर्मात्मज्ञानोपायत्वमित्येवं ह्ययं विभागो युज्यते अर्थसम्बन्धोपपत्तिसामर्थ्यादिति चेत् ।
पद-भाष्य
समाधान—युक्तसंगत न होनेके कारण ऐसा मानना ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा विभाग प्रस्तुत प्रसंगके अनुकूल नहीं है । सब प्रकारकी क्रिया कारक फल और भेदबुद्धिका तिरस्कार करनेवाली ब्रह्मविद्यामें किसी प्रकारके शेषकी अपेक्षा अथवा उचित सहकारी साधनका सम्बन्ध मानना ठीक नहीं है, क्योंकि ब्रह्मविद्या और उसका फल निःश्रेयस—ये सब प्रकारके विषयोंसे निवृत्त होकर प्रत्यगात्मारूप विषयमें स्थित होनेवाले हैं । [कहा भी है—] ‘मोक्षकी इच्छा करनेवाला पुरुष सर्वदा साधनसहित कर्मोंको त्याग दे । त्याग करनेसे ही त्यागीको अपने प्रत्यगात्मरूप परमपदका ज्ञान हो सकता है’ अतः कर्मको ज्ञानकी सहकारिता अथवा ज्ञानको कर्मका शेष होनेकी अपेक्षा सम्भव नहीं है । अतः सूक्तवाकरूप अनुमन्त्रणके समान इन तप आदिका भी सम्बन्धके अनुसार विभाग हो सकता है—ऐसा विचार मिथ्या ही है । अतः [शिष्यके उपर्युक्त] प्रश्नका जो उत्तर है वह [उपदेशकी समाप्तिका] अवधारण करनेके लिये है—ऐसा मानना ही ठीक है । अर्थात् अमरत्व-प्राप्तिके लिये किसी अन्य साधनकी अपेक्षासे रहित इतनी ही उपनिषद् कही गयी है ॥ ७ ॥
[ * ]: अग्निरिदं हविरजुषतावीवृधत महो ज्यायोऽवृत । अग्नीषोमाविदं हविरजुषेतामवीवधेतां महो ज्यायोऽक्राताम् ॥ इत्यादि सूक्तवाकसे ही समस्त यज्ञोंकी समाप्तिपर देवताओंका अनुमन्त्रण किया जाता है । यद्यपि इस सूक्तवाकमें बहुत-से देवताओंका निर्देश किया गया है, तो भी जिस यज्ञमें जिस देवताका आवाहन किया जाता है उसीके विसर्जनमें समर्थ होनेके कारण जिस प्रकार इस सूक्तवाकका विनियोग होता है उसी प्रकार तप आदिका भी विद्याके शेषरूपसे विनियोग हो जायगा ।
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पद-भाष्य