खण्ड 4 - मन्त्र 8

तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् ॥ ८ ॥

tasyai tapo damaḥ karmeti pratiṣṭhā vedāḥ sarvāṅgāni satyamāyatanam .. 8 ..


उस (ब्राह्मी उपनिषद्)-की तप, दम, कर्म तथा वेद और सम्पूर्ण वेदांग— ये प्रतिष्ठा हैं एवं सत्य आयतन है ॥ ८ ॥

वाक्य-भाष्य

उस आगे कही जानेवाली उपनिषद्की तप—ब्रह्मचर्यादि, दम— इन्द्रियनिग्रह तथा अग्निहोत्रादि कर्म— ये सब प्रतिष्ठा—आश्रय हैं । इनके होनेपर ही ब्राह्मी उपनिषद् प्रतिष्ठित हुआ करती है । चारों वेद तथा सम्पूर्ण वेदांग भी प्रतिष्ठा ही हैं । इस प्रकार [‘वेदाः सर्वाङ्गानि’ के आगे] ‘प्रतिष्ठा’ पदकी
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तस्या वक्ष्यमाणाया उपनिषदः तपो ब्रह्मचर्यादिदम उपशमः कर्म अग्निहोत्रादीत्येतानि प्रतिष्ठाश्रयः । एतेषु हि सत्सु ब्राह्मयुपनिषत् प्रतिष्ठिता भवति । वेदाश्चत्वारोऽङ्गानि च सर्वाणि । प्रतिष्ठेत्यनु-

पद-भाष्य

तुम्हारे सामने जिस ब्राह्मी उपनिषद्का वर्णन किया है उस पूर्वकथित उपनिषद्की प्राप्तिके उपायभूत तप आदि हैं । शरीर, इन्द्रिय और मनके समाधानका नाम तप है । दम उपशम (विषयोंसे निवृत्त होने)-को कहते हैं । और कर्म अग्निहोत्रादि हैं । इनके द्वारा संस्कारयुक्त हुए पुरुषोंको ही चित्तशुद्धिद्वारा तत्त्वज्ञानकी उत्पत्ति होती देखी गयी है । जिनका मनोमल निवृत्त नहीं हुआ है उन पुरुषोंको तो उपदेश दिया जानेपर भी ब्रह्मके विषयमें अज्ञान अथवा विपरीत ज्ञान होता देखा गया है, जैसे इन्द्र और विरोचन आदिको ।

अतः इस जन्ममें अथवा बीते हुए अनेकों जन्मोंमें जिनका चित्त तप आदिसे शुद्ध हो गया है उन्हें ही श्रुत्युक्त ज्ञान उत्पन्न होता है । ‘जिसकी भगवान्में अत्यन्त भक्ति है

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यामिमां ब्राह्मीमुपनिषदं तवाग्रेऽब्रूमेति तस्यै तस्या उक्ताया उपनिषदः प्राप्त्युपायभूतानि तपआदीनि । तपः कायेन्द्रियमनसां समाधानम् । दमः—उपशमः । कर्म अग्निहोत्रादि । एतैर्हि संस्कृतस्य सत्त्वशुद्धिद्वारा तत्त्वज्ञानोत्पत्तिर्दृष्टा । दृष्टा ह्यमृदितकल्मषस्योक्तेऽपि ब्रह्मण्यप्रतिपत्तिर्विपरीतप्रतिपत्तिश्च, यथेन्द्रविरोचनप्रभृतीनाम् ।

तस्मादिह वातीतेषु वा बहुषु जन्मान्तरेषु तप आदिभिः कृतसत्त्वशुद्धेर्ज्ञानं समुत्पद्यते यथाश्रुतम्; ‘यस्य देवे परा भक्तिर्यथा

वाक्य-भाष्य

अनुवृत्ति की जाती है । क्योंकि विद्या ब्रह्म (वेद)-के ही आश्रय रहनेवाली है । सत्य अर्थात् दूसरेको पीड़ा न पहुँचानेवाला यथार्थ वचन आयतन— निवासस्थान है, क्योंकि सत्यवान् पुरुषोंमें ही उपर्युक्त साधन आयतनके समान स्थित हैं ॥ ८ ॥
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वर्तते । ब्रह्माश्रया हि विद्या । सत्यं यथा भूतवचनमपीडाकरम् आयतनं निवासः सत्यवत्सु हि सर्वं यथोक्तमायतन इवावस्थितम् ॥ ८ ॥

पद-भाष्य

और जैसी भगवान्में है वैसी ही गुरुमें भी है उस महात्माको ही ये पूर्वोक्त विषय प्रकाशित होते हैं’ इस मन्त्रवर्णसे तथा ‘पापकर्मोंके क्षीण होनेपर पुरुषोंको ज्ञान उत्पन्न होता है’ इस स्मृतिसे भी यही प्रमाणित होता है ।

[मूल मन्त्रमें] ‘इति’ शब्द [अन्य साधनोंका] उपलक्षणत्व प्रदर्शित करनेके लिये है । अर्थात् इसी प्रकार ज्ञानकी उत्पत्ति करनेवाले ‘अमानित्व अदम्भित्व’ आदि अन्य साधन भी प्रदर्शित हो जाते हैं । ‘प्रतिष्ठा’ चरणोंको कहते हैं अर्थात् ये चरणोंके समान इसके आधारभूत हैं । जिस प्रकार पुरुष अपने चरणोंपर स्थित होकर व्यापार करता है उसी प्रकार इन साधनोंके रहते हुए ही ब्रह्मविद्या स्थित और प्रवृत्त होती है । ऋक् आदि चार वेद और शिक्षा आदि छः अंग [भी प्रतिष्ठा] हैं । कर्म और ज्ञानके प्रकाशक होनेके कारण वेदोंको और उनकी रक्षाके कारणभूत होनेसे वेदांगोंको ब्रह्मविद्याकी प्रतिष्ठा कहा गया है ।

अथवा ‘प्रतिष्ठा’ शब्दकी चरणरूपसे कल्पना की गयी है; इसलिये वेद उस ब्रह्मविद्याके सिर आदि अन्य सम्पूर्ण अंग हैं । इस पक्षमें शिक्षा आदिका वेदका ग्रहण करनेसे ही ग्रहण किया समझ लेना चाहिये । क्योंकि अंगीके अधीन ही अंग होते हैं इसलिये अंगीके गृहीत होनेपर उसके अंग भी गृहीत हो ही जाते हैं ।

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देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः’ (श्वे० उ० ६ । २३) इति मन्त्रवर्णात् । ‘ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः’ (महा० शा० २०४ । ८) इति स्मृतेश्च ।

इति शब्दः उपलक्षणत्वप्रदर्शनार्थः । इति एवमाद्यन्यदपि ज्ञानोत्पत्तेरुपकारकम् ‘अमानित्वमदम्भित्वम्’ (गीता १३ । ७) इत्याद्युपदर्शितं भवति । प्रतिष्ठा पादौ पादाविवास्याः, तेषु हि सत्सु प्रतितिष्ठति ब्रह्मविद्या प्रवर्तते, पद्भ्यामिव पुरुषः । वेदाश्चत्वारः सर्वाणि चाङ्गानि शिक्षादीनि षट् कर्मज्ञानप्रकाशकत्वाद्वेदानां तद्रक्षणार्थत्वाद् अङ्गानां प्रतिष्ठात्वम् ।

अथवा प्रतिष्ठाशब्दस्य पादरूपकल्पनार्थत्वाद्वेदास्त्वितराणि सर्वाङ्गानि शिरआदीनि । अस्मिन् पक्षे शिक्षादीनां वेदग्रहणेनैव ग्रहणं कृतं प्रत्येत्तव्यम् । अङ्गिनि हि गृहीतेऽङ्गानि गृहीतानि एव भवन्ति, तदायत्तत्वादङ्गानाम् ।

पद-भाष्य

सत्य आयतन है । जहाँ वह उपनिषद् स्थित होती है वही उसका आयतन है । वाणी, मन और शरीरकी अमायिकता यानी अकुटिलताका नाम ‘सत्य’ है । जो लोग अमायावी और साधु (शुद्धस्वभाव) होते हैं उन्हींमें ब्रह्मविद्या आश्रय लेती है, आसुरी प्रकृतिवाले मायावियोंमें नहीं, जैसा कि ‘जिनमें कुटिलता, मिथ्या और माया नहीं है’ इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है । अतः सत्य उसका आयतन है—ऐसी कल्पना की जाती है । तप आदिमें ही प्रतिष्ठारूपसे प्राप्त हुए सत्यको फिर आयतनरूपसे ग्रहण करना उसका अतिशय साधनत्व प्रदर्शित करनेके लिये है । ‘सहस्र अश्वमेध और सत्य तराजूमें रखे जानेपर सहस्र अश्वमेधोंकी अपेक्षा अकेला सत्य ही विशेष ठहरता है’ इस स्मृतिसे भी यही प्रमाणित होता है ॥ ८ ॥
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सत्यम् आयतनं यत्र तिष्ठत्युपनिषत् तदायतनम् । सत्यमिति अमायिता अकौटिल्यं वाङ्मनःकायानाम् । तेषु ह्याश्रयति विद्या ये अमायाविनः साधवः, नासुरप्रकृतिषु मायाविषु; ‘न येषु जिह्यमनृतं न माया च’ (प्र० उ० १ । १६) इति श्रुतेः । तस्मात्सत्यमायतनमिति कल्प्यते । तपआदिषु एव प्रतिष्ठात्वेन प्राप्तस्य सत्यस्य पुनरायतनत्वेन ग्रहणं साधनातिशयत्वज्ञापनार्थम् । ‘अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राच्च सत्यमेकं विशिष्यते’ (विष्णुस्मृ० ८) इति स्मृतेः ॥ ८ ॥