tasyai tapo damaḥ karmeti pratiṣṭhā vedāḥ sarvāṅgāni satyamāyatanam .. 8 ..
वाक्य-भाष्य
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पद-भाष्य
तुम्हारे सामने जिस ब्राह्मी उपनिषद्का वर्णन किया है उस पूर्वकथित उपनिषद्की प्राप्तिके उपायभूत तप आदि हैं । शरीर, इन्द्रिय और मनके समाधानका नाम तप है । दम उपशम (विषयोंसे निवृत्त होने)-को कहते हैं । और कर्म अग्निहोत्रादि हैं । इनके द्वारा संस्कारयुक्त हुए पुरुषोंको ही चित्तशुद्धिद्वारा तत्त्वज्ञानकी उत्पत्ति होती देखी गयी है । जिनका मनोमल निवृत्त नहीं हुआ है उन पुरुषोंको तो उपदेश दिया जानेपर भी ब्रह्मके विषयमें अज्ञान अथवा विपरीत ज्ञान होता देखा गया है, जैसे इन्द्र और विरोचन आदिको ।
अतः इस जन्ममें अथवा बीते हुए अनेकों जन्मोंमें जिनका चित्त तप आदिसे शुद्ध हो गया है उन्हें ही श्रुत्युक्त ज्ञान उत्पन्न होता है । ‘जिसकी भगवान्में अत्यन्त भक्ति है
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यामिमां ब्राह्मीमुपनिषदं तवाग्रेऽब्रूमेति तस्यै तस्या उक्ताया उपनिषदः प्राप्त्युपायभूतानि तपआदीनि । तपः कायेन्द्रियमनसां समाधानम् । दमः—उपशमः । कर्म अग्निहोत्रादि । एतैर्हि संस्कृतस्य सत्त्वशुद्धिद्वारा तत्त्वज्ञानोत्पत्तिर्दृष्टा । दृष्टा ह्यमृदितकल्मषस्योक्तेऽपि ब्रह्मण्यप्रतिपत्तिर्विपरीतप्रतिपत्तिश्च, यथेन्द्रविरोचनप्रभृतीनाम् ।
तस्मादिह वातीतेषु वा बहुषु जन्मान्तरेषु तप आदिभिः कृतसत्त्वशुद्धेर्ज्ञानं समुत्पद्यते यथाश्रुतम्; ‘यस्य देवे परा भक्तिर्यथा
वाक्य-भाष्य
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पद-भाष्य
और जैसी भगवान्में है वैसी ही गुरुमें भी है उस महात्माको ही ये पूर्वोक्त विषय प्रकाशित होते हैं’ इस मन्त्रवर्णसे तथा ‘पापकर्मोंके क्षीण होनेपर पुरुषोंको ज्ञान उत्पन्न होता है’ इस स्मृतिसे भी यही प्रमाणित होता है ।
[मूल मन्त्रमें] ‘इति’ शब्द [अन्य साधनोंका] उपलक्षणत्व प्रदर्शित करनेके लिये है । अर्थात् इसी प्रकार ज्ञानकी उत्पत्ति करनेवाले ‘अमानित्व अदम्भित्व’ आदि अन्य साधन भी प्रदर्शित हो जाते हैं । ‘प्रतिष्ठा’ चरणोंको कहते हैं अर्थात् ये चरणोंके समान इसके आधारभूत हैं । जिस प्रकार पुरुष अपने चरणोंपर स्थित होकर व्यापार करता है उसी प्रकार इन साधनोंके रहते हुए ही ब्रह्मविद्या स्थित और प्रवृत्त होती है । ऋक् आदि चार वेद और शिक्षा आदि छः अंग [भी प्रतिष्ठा] हैं । कर्म और ज्ञानके प्रकाशक होनेके कारण वेदोंको और उनकी रक्षाके कारणभूत होनेसे वेदांगोंको ब्रह्मविद्याकी प्रतिष्ठा कहा गया है ।
अथवा ‘प्रतिष्ठा’ शब्दकी चरणरूपसे कल्पना की गयी है; इसलिये वेद उस ब्रह्मविद्याके सिर आदि अन्य सम्पूर्ण अंग हैं । इस पक्षमें शिक्षा आदिका वेदका ग्रहण करनेसे ही ग्रहण किया समझ लेना चाहिये । क्योंकि अंगीके अधीन ही अंग होते हैं इसलिये अंगीके गृहीत होनेपर उसके अंग भी गृहीत हो ही जाते हैं ।
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देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः’ (श्वे० उ० ६ । २३) इति मन्त्रवर्णात् । ‘ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः’ (महा० शा० २०४ । ८) इति स्मृतेश्च ।
इति शब्दः उपलक्षणत्वप्रदर्शनार्थः । इति एवमाद्यन्यदपि ज्ञानोत्पत्तेरुपकारकम् ‘अमानित्वमदम्भित्वम्’ (गीता १३ । ७) इत्याद्युपदर्शितं भवति । प्रतिष्ठा पादौ पादाविवास्याः, तेषु हि सत्सु प्रतितिष्ठति ब्रह्मविद्या प्रवर्तते, पद्भ्यामिव पुरुषः । वेदाश्चत्वारः सर्वाणि चाङ्गानि शिक्षादीनि षट् कर्मज्ञानप्रकाशकत्वाद्वेदानां तद्रक्षणार्थत्वाद् अङ्गानां प्रतिष्ठात्वम् ।
अथवा प्रतिष्ठाशब्दस्य पादरूपकल्पनार्थत्वाद्वेदास्त्वितराणि सर्वाङ्गानि शिरआदीनि । अस्मिन् पक्षे शिक्षादीनां वेदग्रहणेनैव ग्रहणं कृतं प्रत्येत्तव्यम् । अङ्गिनि हि गृहीतेऽङ्गानि गृहीतानि एव भवन्ति, तदायत्तत्वादङ्गानाम् ।