खण्ड 4 - मन्त्र 9

यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति ॥ ९ ॥

yo vā etāmevaṃ vedāpahatya pāpmānamanante svarge loke jyeye pratitiṣṭhati pratitiṣṭhati .. 9 ..


जो निश्चयपूर्वक इस उपनिषद्को इस प्रकार जानता है वह पापको क्षीण करके अनन्त और महान् स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है, प्रतिष्ठित होता है ॥ ९ ॥

पद-भाष्य

‘केनेषितम्’ इत्यादि वाक्यद्वारा कही हुई तथा ‘ब्रह्म ह देवेभ्यः’ आदि आख्यायिकाद्वारा स्तुत इस महाभागा और सम्पूर्ण विद्याओंकी आश्रयभूता ब्रह्मविद्याको जो पुरुष जानता है वह पापको छोड़कर अर्थात् अविद्या, कामना और कर्मरूप संसारके बीजको त्यागकर अनन्त—जिसका कोई पार नहीं है उस स्वर्गलोकमें अर्थात् सुखस्वरूप ब्रह्ममें, जो ज्येय—बड़ा अर्थात् सबसे महान् है उस अपने मुख्य आत्मामें स्थित हो जाता है । तात्पर्य यह है कि वह फिर संसारको प्राप्त नहीं होता । ‘अमृतत्वं हि विन्दते’ इस वाक्यद्वारा पहले ब्रह्मविद्याका फल कह भी दिया है, तो भी इस वाक्यद्वारा उसका अन्तमें फिर उपसंहार करते हैं । ‘अनन्त’ ऐसा विशेषण होनेके कारण ‘स्वर्गे लोके’ से देवलोक नहीं
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यो वै एतां ब्रह्मविद्याम् ‘केनेषितम्’ इत्यादिना यथोक्ताम् एवं महाभागाम् ‘ब्रह्म ह देवेभ्यः’ इत्यादिना स्तुतां सर्वविद्याप्रतिष्ठां वेद ‘अमृतत्वं हि विन्दते’ इत्युक्तमपि ब्रह्मविद्याफलमन्ते निगमयति— अपहत्य पाप्मानम् अविद्याकामकर्मलक्षणं संसारबीजं विधूय अनन्ते अपर्यन्ते स्वर्गे लोके सुखात्मके ब्रह्मण्यित्येतत् । अनन्ते इति विशेषणान्न त्रिविष्टपे अनन्तशब्द औपचारिकोऽपि स्याद् इत्यत आह—ज्येये इति ।

वाक्य-भाष्य

तप आदि अंगोंवाली और उन्हींपर प्रतिष्ठित इस ब्राह्मी उपनिषद्को, जो कि आत्मज्ञानकी हेतुभूत है, जो उसके आयतनके सहित इस प्रकार यथावत् जानता है—जो उसका अनुवर्तन यानी अनुष्ठान करता है उसके लिये यह फल बतलाया गया है । वह पापको क्षीण करके अर्थात् धर्म और अधर्मका क्षय करके जिसका अन्त न हो उस स्वर्गलोकमें अर्थात् दुःखरहित आनन्दप्राय और अनन्त—अपार अर्थात्
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तामेतां तप आद्यङ्गां तत्प्रतिष्ठां ब्राह्मीमुपनिषदं सायतनामात्मज्ञानहेतुभूतामेवं यथावद्यो वेद अनुवर्ततेऽनुतिष्ठति; तस्यैतत्फलम् आह—अपहत्य पाप्मानम् अपक्षीय धर्माधर्मावित्यर्थः अनन्तेऽपारेऽविद्यमानान्ते स्वर्गे लोके सुखप्राये निर्दुःखात्मनि ज्येये ज्यायसि सर्वमहत्तरे स्वात्मनि मुख्ये एव प्रतितिष्ठति । न पुनः संसारमापद्यत इत्यभिप्रायः ॥ ९ ॥

पद-भाष्य

इति चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥

केनोपनिषत्पदभाष्यम् सम्पूर्णम्

समझना चाहिये; क्योंकि उसमें भी उपचारसे ‘अनन्त’ शब्दकी प्रवृत्ति हो सकती है, इसलिये ‘ज्येये’ यह विशेषण दिया गया है ॥ ९ ॥

इति चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥

केनोपनिषद्वाक्यभाष्यम् सम्पूर्णम्

ज्येष्ठ—महान् यानी सबसे बड़े परब्रह्ममें प्रतिष्ठित हो जाता है । अर्थात् सम्पूर्ण वेदान्तवाक्योंसे वेद्य ब्रह्मको आत्मभावसे जानकर उसी ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥
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परे ब्रह्मणि ज्येये महति सर्वमहत्तरे प्रतितिष्ठति सर्ववेदान्तवेद्यं ब्रह्मात्मत्वेनावगम्य तदेव ब्रह्म प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ ९ ॥