भूमिका

प्रथम खण्ड

सम्बन्ध-भाष्य

पद-भाष्य

अब ‘केनेषितम्’ इत्यादि परब्रह्मविषयक उपनिषत् कहनी है इसलिये इस नवम अध्याय का[ १ ] आरम्भ किया जाता है । इससे पूर्व सम्पूर्ण कर्मों के प्रतिपादन की सम्यक्-रूप से समाप्ति की गयी है, तथा समस्त कर्मों के आश्रयभूत प्राण की उपासना एवं कर्म की अंगभूत सामोपासना का वर्णन किया गया है ।
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‘केनेषितम्’ इत्याद्योपनिषत् उपक्रमणिका परब्रह्मविषया वक्तव्या इति नवमस्याध्यायस्य आरम्भः । प्रागेतस्मात्कर्माणि अशेषतः परिसमापितानि, समस्तकर्माश्रयभूतस्य च प्राणस्योपासनान्युक्तानि, कर्माङ्गसामविषयाणि च ।

वाक्य-भाष्य

इससे पूर्व-ग्रन्थ में कर्मों के आश्रयभूत प्राणविज्ञान तथा अनेक प्रकार के कर्म का निरूपण समाप्त हुआ, जिनके विकल्प और समुच्चय के[ ३ ] अनुष्ठान से दक्षिण और उत्तर मार्गों द्वारा क्रमशः आवृत्ति (आवागमन) और अनावृत्ति (क्रममुक्ति) हुआ करती हैं । इसके आगे देवता-ज्ञान और कर्मों के समुच्चय का निष्कामभाव से अनुष्ठान करने से जिसने अपना चित्त शुद्ध कर लिया है, जिसका आत्मज्ञान का प्रतिबन्धकरूप दोष नष्ट हो गया है, जो द्वैतविषय में दोष देखने लगा है तथा सम्पूर्ण

[ १ ]: यह उपनिषद् सामवेदीय तलवकार शाखा का नवम अध्याय है ।

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समाप्तं कर्मात्मभूतप्राणविषयं उपक्रमणिका विज्ञानं कर्म चानेकप्रकारम्, ययोर्विकल्पसमुच्चयानुष्ठानाद्दक्षिणोत्तराभ्यां सृतिभ्यामावृत्त्यनावृत्ती भवतः । अत ऊर्ध्वं फलनिरपेक्षज्ञानकर्मसमुच्चयानुष्ठानात्कृतात्मसंस्कारस्योच्छिन्नात्मज्ञानप्रतिबन्धकस्य द्वैतविषयदोषदर्शिनो निर्ज्ञाताशेष

पद-भाष्य

उसके पश्चात् गायत्रसामविषयक विचार और शिष्यपरम्परारूप वंश के वर्णन में समाप्त होनेवाले कार्य का वर्णन किया गया है ।

ऊपर बतलाया हुआ यह सम्पूर्ण कर्म और ज्ञान सम्यक् प्रकार से सम्पादन किये जाने पर निष्काम मुमुक्षु की तो चित्तशुद्धि के कारण होते हैं तथा ज्ञानरहित सकाम साधक के केवल श्रौत और स्मार्त कर्म दक्षिण

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अनन्तरं च गायत्रसामविषयं दर्शनं वंशान्तमुक्तं कार्यम् ।

सर्वमेतद्यथोक्तं कर्म च ज्ञानं च सम्यगनुष्ठितं निष्कामस्य मुमुक्षोः सत्त्वशुद्ध्यर्थं भवति । सकामस्य तु ज्ञानरहितस्य केवलानि श्रौतानि स्मार्तानि च कर्माणि दक्षिण

वाक्य-भाष्य

बाह्य विषयों का तत्त्व जान लेने के कारण जो संसार के बीजस्वरूप अज्ञान का उच्छेद करना चाहता है, उस आत्मतत्त्व के जिज्ञासु को आत्मस्वरूप के तत्त्व का ज्ञान कराने के लिये ‘केनेषितम्’ आदि मन्त्र से यह (नवाँ) अध्याय आरम्भ किया जाता है । उस आत्मतत्त्वज्ञान से ही मृत्यु के कारणरूप अज्ञान का उच्छेद करना चाहिये, क्योंकि यह संसार अज्ञानमूलक ही है । आत्मतत्त्व अज्ञात है, इसलिये उसका ज्ञान प्राप्त करने के लिये आत्मविषयक जिज्ञासा उचित ही है ।

कर्मकाण्ड में आत्मतत्त्व का निरूपण नहीं किया गया; क्योंकि यह उसका विरोधी है । इस विशेषरूप से जाननेयोग्य आत्मतत्त्व का कर्मकाण्ड में विवेचन नहीं किया जाता ।

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बाह्यविषयत्वात्संसारबीजमज्ञानमुच्छिच्छित्सतः प्रत्यगात्मविषयजिज्ञासोः केनेषितमित्यात्मस्वरूपतत्त्वविज्ञानायायमध्याय आरभ्यते । तेन च मृत्युपदम् अज्ञानमुच्छेत्तव्यं तत्तन्त्रो हि संसारो यतः । अनधिगतत्वाद् आत्मनो युक्ता तदधिगमाय तद्विषया जिज्ञासा ।

कर्मविषये चानुक्तिः; ज्ञानकर्मविरोधः तद्विरोधित्वात् । अस्य विजिज्ञासितव्यस्य आत्मतत्त्वस्य कर्मविषयेऽवचनम् ।

पद-भाष्य

मार्ग की प्राप्ति और पुनरावर्तन के हेतु होते हैं । इनके सिवा अशास्त्रीय स्वच्छन्द वृत्ति से तो पशु से लेकर स्थावरपर्यन्त अधोगति ही होती है । ‘ये [स्वच्छन्द प्रवृत्तिवाले जीव उत्तरायण और दक्षिणायन] इन दोनों में से किसी मार्ग से नहीं जाते; वे निरन्तर आवर्तन करनेवाले क्षुद्र जीव होते हैं; उनका ‘जन्म लो और मरो’ यह तीसरा स्थान (मार्ग) है’
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मार्गप्रतिपत्तये पुनरावृत्तये च भवन्ति । स्वाभाविक्या त्वशास्त्रीयया प्रवृत्त्या पश्वादिस्थावरान्ता अधोगतिः स्यात् । ‘अथैतयोः पथोर्न कतरेण च न तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयग्ँ स्थानम्’ (छा० उ० ५ । १० । ८) इति श्रुतेः;

वाक्य-भाष्य

यदि कहो कि क्यों? तो उसका कारण यह है कि आत्मा का यथार्थ ज्ञान कर्म का विरोधी है क्योंकि जिसका ज्ञान कराना अभीष्ट है, वह आत्मा तो सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मस्वरूप ही है, जैसा कि, ‘तुम उसी को ब्रह्म जानो, जिस इस (देश-कालावच्छिन्न वस्तु)-की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है’ इस श्रुति से सिद्ध होता है । जो पुरुष स्वराज्य पर अभिषिक्त होकर ब्रह्मभाव को प्राप्त हो गया है वह किसी के भी सामने झुकने की इच्छा नहीं करता । अतः जिसने यह जान लिया है कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’ उससे कर्म नहीं कराया जा सकता । अपने आत्मा को आप्तकाम ब्रह्म माननेवाला पुरुष किसी भी प्रवृत्ति को प्रयोजनवती नहीं देखता और कोई भी प्रवृत्ति बिना प्रयोजन के हो नहीं सकती, अतः कर्म से
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कस्मादिति चेदात्मनो हि यथावद्विज्ञानं कर्मणा विरुध्यते । निरतिशयब्रह्मस्वरूपो ह्यात्मा विजिज्ञापयिषितः, ‘तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते’ (के० उ० १ । ४) इत्यादिश्रुतेः । न हि स्वाराज्येऽभिषिक्तो ब्रह्मत्वं गमितः कञ्चन नमितुमिच्छत्यतो ब्रह्मास्मीति सम्बुद्धो न कर्म कारयितुं शक्यते । न ह्यात्मानम् अवाप्तार्थं ब्रह्म मन्यमानः प्रवृत्तिं प्रयोजनवतीं पश्यति । न च निष्प्रयोजना प्रवृत्तिरतो विरुध्यत एव कर्मणा ज्ञानम् । अतः कर्म-

पद-भाष्य

इस श्रुति से और ‘तीन प्रसिद्ध प्रजाओं ने धर्मत्याग किया’ इस मन्त्रवर्ण से भी [यही बात सिद्ध होती है] ।

जो इस जन्म और पूर्व जन्म में किये हुए कर्मों के संस्कारविशेष से उद्भूत बाह्य एवं अनित्य साध्य-साधन के सम्बन्ध से विरक्त हो गया है उस विशुद्धचित्त निष्काम पुरुष को ही प्रत्यगात्मविषयक जिज्ञासा हो सकती है । यही बात ‘केनेषितम्’ इत्यादि प्रश्नोत्तररूपा श्रुति द्वारा दिखलायी जाती है । कठोपनिषद् में तो कहा है—

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‘प्रजा ह तिस्रोऽत्यायमीयुः’ (ऐ० आ० २ । १ । १ । ४) इति च मन्त्रवर्णात् ।

विशुद्धसत्त्वस्य तु निष्कामस्य ज्ञानाधिकारि- एव बाह्यादनित्यात् निरूपणम् साध्यसाधनसम्बन्धाद् इह कृतात्पूर्वकृताद्वा संस्कारविशेषोद्भवाद्विरक्तस्य प्रत्यगात्मविषया जिज्ञासा प्रवर्तते । तदेतद्वस्तु प्रश्नप्रतिवचनलक्षणया श्रुत्या प्रदर्श्यते ‘केनेषितम्’ इत्याद्यया । काठके चोक्तम्

वाक्य-भाष्य

ज्ञान का विरोध है ही । इसीलिये कर्मकाण्ड में आत्म-ज्ञान का उल्लेख नहीं है; अर्थात् जिज्ञासा किसी विज्ञानविशेष के सम्बन्ध में ही होती है ।

यदि कहो कि तब तो कर्म का आरम्भ ही न किया जाय तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि निष्काम कर्म पुरुष का संस्कार करनेवाला है ।

पूर्व०—यदि आत्मा के अज्ञान का कारण होने से आत्मज्ञान द्वारा कर्म का परित्याग कराना ही अभीष्ट है तो ‘कीचड़ को धोने की अपेक्षा तो उसे दूर से न छूना ही अच्छा है’ इस उक्ति के अनुसार कर्म का आरम्भ न

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विषयेऽनुक्तिः, विज्ञानविशेषविषया एव जिज्ञासा ।

कर्मानारम्भ इति चेन्न; निष्कामस्य संस्कारार्थत्वात् ।

यदि ह्यात्मविज्ञानेनात्माविद्याविषयत्वात्परितित्याजयिषितं कर्म ततः ‘प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम्’ (म० वन० २ । ४९) इत्यनारम्भ एव कर्मणः श्रेयान् ।

पद-भाष्य

‘स्वयम्भू परमात्मा ने इन्द्रियों को बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है; इसलिये इन्द्रियाँ बाहर की ओर ही देखती हैं, अन्तरात्मा को नहीं देखतीं; किसी-किसी बुद्धिमान् ने ही अमरत्व की इच्छा करते हुए अपनी इन्द्रियों को रोककर प्रत्यगात्मा का साक्षात्कार किया है’ इत्यादि । तथा अथर्ववेदीय (मुण्डक) उपनिषद् में भी कहा है— ‘ब्रह्मनिष्ठ पुरुष कर्म द्वारा प्राप्त होनेवाले लोकों की परीक्षा कर वैराग्य को प्राप्त हो जाय, क्योंकि कृत (कर्म) के
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‘पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्’ (क० उ० २ । १ । १) । इत्यादि ‘परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन ।’

वाक्य-भाष्य

करना ही उत्तम है; क्योंकि वह अल्प फलवाला और अधिक परिश्रमवाला है तथा आत्यन्तिक कल्याण तत्त्वविज्ञान से ही होता है ।

सिद्धान्ती—ठीक है, परंतु यह अविद्यामूलक कर्म ‘जो भोगों की कामना करता है’ तथा ‘इस प्रकार जो कामना करनेवाला है’ इत्यादि श्रुतियों के अनुसार सकाम पुरुष के लिये ही अल्पफलत्वादि दोषों से युक्त तथा बन्धनकारक है; निष्काम पुरुष के लिये नहीं । उसके लिये तो कर्म अपने निवर्तक (निष्पन्न करनेवाले) और आश्रयभूत प्राणों के विज्ञान के सहित संस्कार के ही कारण होते हैं ।

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अल्पफलत्वादायासबहुलत्वात् तत्त्वज्ञानादेव च श्रेयःप्राप्तेः; इति चेत् ।

सत्यम्; एतदविद्याविषयं चित्तशुद्ध्यै कर्माल्यफलत्वादि कर्मावश्यकं दोषवद्वन्धरूपं च प्राप्तज्ञानस्य तु तदनारम्भः सकामस्य ‘कामान् यः कामयते’ (मु० उ० ३ । २ । २) ‘इति नु कामयमानः’ इत्यादिश्रुतिभ्यः; न निष्कामस्य । तस्य तु संस्कारार्थान्येव कर्माणि भवन्ति तन्निवर्तकाश्रयप्राणविज्ञानसहितानि ।

पद-भाष्य

द्वारा अकृत (नित्यस्वरूप मोक्ष) प्राप्त नहीं हो सकता । उसका विशेष ज्ञान प्राप्त करने के लिये तो उस (जिज्ञासु)-को हाथ में समिधा लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के ही पास जाना चाहिये’ इत्यादि ।

केवल इस प्रकार से ही विरक्त पुरुष को प्रत्यगात्मविषयक विज्ञान के श्रवण, मनन और साक्षात्कार की क्षमता हो सकती है, और किसी तरह नहीं । इस प्रत्यगात्मा के ब्रह्मत्वविज्ञान से ही कामना और कर्म की प्रवृत्ति का कारण तथा संसार का बीजभूत अज्ञान पूर्णतया

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तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्’ (मु० उ० १ । २ । १२) इत्याद्याथर्वणे च ।

एवं हि विरक्तस्य प्रत्यगात्मनिवृत्ताज्ञानस्य विषयं विज्ञानं श्रोतुं कृतकृत्यता- मन्तुं विज्ञातुं च प्रदर्शनम् सामर्थ्यमुपपद्यते, नान्यथा । एतस्माच्च प्रत्यगात्मब्रह्मविज्ञानात्संसारबीजमज्ञानं कामकर्मप्रवृत्तिकारणमशेषतो

वाक्य-भाष्य

‘देवयाजी श्रेष्ठ हैं या आत्मयाजी’ इस प्रकार आरम्भ करके वाजसनेय श्रुति में कहा है कि आत्मयाजी अपने संस्कार के लिये ही यह समझकर कर्म करता है कि ‘इससे मेरे इस अंग का संस्कार होगा’ ‘यह शरीर महायज्ञ और यज्ञों द्वारा ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के योग्य किया जाता है ।’ ‘यज्ञ, दान और तप—ये विद्वानों को पवित्र करनेवाले ही हैं’ इत्यादि स्मृतियों से भी यही बात सिद्ध होती है ।

अकेला या कर्म के साथ मिला हुआ होने पर भी प्राणादि विज्ञान सकाम पुरुष के लिये तो प्राणत्व-प्राप्ति का ही कारण होता है, किंतु निष्काम पुरुष के

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‘देवयाजी श्रेयानात्मयाजी वा’ इत्युपक्रम्यात्मयाजी तु करोति ‘इदं मेऽनेनाङ्गं संस्क्रियते इति’ संस्कारार्थमेव कर्माणीति वाजसनेयके । ‘महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः’ (मनु० २ । २८) ‘यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्’ (गीता १८ । ५) इत्यादिस्मृतेश्च ।

प्राणादिविज्ञानं च केवलं कर्मसमुच्चितं वा सकामस्य प्राणात्मप्राप्त्यर्थमेव भवति । निष्कामस्य त्वात्मज्ञानप्रतिबन्धनिर्माष्ट्यै

पद-भाष्य

निवृत्त होता है; जैसा कि ‘उस अवस्था में एकत्व देखनेवाले पुरुष को क्या मोह और क्या शोक हो सकता है’ इत्यादि मन्त्रवर्ण तथा ‘आत्मज्ञानी शोक को पार कर जाता है’ ‘उस परावर को देख लेने पर उसकी हृदयग्रन्थि टूट जाती है, सारे संदेह नष्ट हो जाते हैं और समस्त कर्म क्षीण हो जाते हैं’ इत्यादि श्रुतियों से सिद्ध होता है ।

पूर्व०—यह बात तो कर्मसहित ज्ञान से भी सिद्ध हो सकती है न?

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निवर्तते, ‘तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः’ (ई० उ० ७) इति मन्त्रवर्णात्, ‘तरति शोकमात्मवित्’ (छा० उ० ७ । १ । ३) इति ‘भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥ ’ (मु० उ० २ । २ । ८) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च ।

कर्मसहितादपि ज्ञानादेतत् सिध्यतीति चेत्?

वाक्य-भाष्य

लिये वह दर्पण के मार्जन के समान आत्मज्ञान के प्रतिबन्धकों का निवर्तक होता है । हाँ, जिसे आत्मज्ञान प्राप्त हो गया है उसके लिये निष्प्रयोजन होने के कारण कर्म के आरम्भ की अपेक्षा नहीं है । जैसा कि ‘जीव कर्म से बँधता है और आत्मज्ञान से मुक्त हो जाता है, इसलिये पारदर्शी यतिजन कर्म नहीं करते’ ‘पूर्वकाल में कर्ममार्ग और संन्यास [दो मार्ग] थे उनमें संन्यास ही उत्कृष्ट था’ ‘किन्हीं ने त्याग से [अमरत्व प्राप्त किया]’ तथा ‘[इसके सिवा] और कोई मार्ग नहीं है’ इत्यादि श्रुतियों से भी सिद्ध होता है ।
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भवति; आदर्शनिर्मार्जनवत् ।

उत्पन्नात्मविद्यस्य त्वनारम्भो निरर्थकत्वात् ‘कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते । तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः ॥ ’ (महा० शा० २४२ । ७) इति । ‘क्रियापथश्चैव पुरस्तात्संन्यासश्च तयोः संन्यास एवात्यरेचयत्’ इति ‘त्यागेनैके०’ (कै० उ० १ । ३) ‘नान्यः पन्था विद्यते०’ (श्वे० उ० ३ । ८) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च ।

पद-भाष्य

सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि वाजसनेय (बृहदारण्यक) श्रुति में उस (कर्मसहित ज्ञान) को अन्य फल का कारण बतलाया है । ‘मुझे स्त्री प्राप्त हो’ इस प्रकार आरम्भ करके वाजसनेय श्रुति में ‘यह लोक पुत्र द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और किसी कर्म से नहीं; कर्म से पितृलोक मिलता है और विद्या (उपासना) से देवलोक’ इस प्रकार उसे आत्मा से भिन्न लोकत्रय का ही कारण बतलाया है ।
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न; वाजसनेयके तस्यान्यसमुच्चयवाद- कारणत्ववचनात् । खण्डनम् ‘जाया मे स्यात्’ (बृ० उ० १ । ४ । १७) इति प्रस्तुत्य ‘पुत्रेणायं लोको जय्यो नान्येन कर्मणा, कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोकः’ (बृ० उ० १ । ५ । १६) इत्यात्मनाऽन्यस्य लोकत्रयस्य कारणत्वमुक्तं वाजसनेयके ।

वाक्य-भाष्य

युक्ति से भी [कर्म ज्ञान के साक्षात् साधन नहीं हैं ।] कर्म तो चित्तशुद्धि के द्वारा ज्ञान के साधन हैं । अमृतत्व की प्राप्ति तो ज्ञान से ही होती है जैसा कि ‘[ज्ञान से] अमृतत्व ही प्राप्त कर लेता है’ ‘विद्या से अमृत को पा लेता है’ इत्यादि श्रुति-स्मृतियों से प्रमाणित होता है । जो मनुष्य नदी के पार पहुँच गया है वह अपने अभीष्ट स्थान पर जाने के लिये स्वतन्त्रता प्राप्त होने पर भी नौका को न छोड़े—ऐसा कभी नहीं होता ।

जो वस्तु स्वतः सिद्ध है उसे कोई भी पुरुष साधनों से सिद्ध नहीं करना चाहता । आत्मा भी स्वभावसिद्ध है; और इसीलिये वह प्राप्त करने की इच्छा

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न्यायाच्च; उपायभूतानि हि कर्माणि संस्कारद्वारेण ज्ञानस्य । ज्ञानेन त्वमृतत्वप्राप्तिः, ‘अमृतत्वं हि विन्दते’ (के० उ० २ । ४) ‘विद्यया विन्दतेऽमृतम्’ (के० उ० २ । ४) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यश्च । न हि नद्याः पारगो नावं न मुञ्चति यथेष्टदेशगमनं प्रति स्वातन्त्र्ये सति ।

न हि स्वभावसिद्धं वस्तु आत्मनः सिषाधयिषति साधनैः । अविकार्यत्वादि निरूपणम् स्वभावसिद्धश्चात्मा, तथा न आपिपयिषितः;

पद-भाष्य

वहाँ (उस बृहदारण्यकोपनिषद् में) ही संन्यास ग्रहण करने में यह हेतु बतलाया है—‘हम प्रजा को लेकर क्या करेंगे, जिन हमें कि यह आत्मलोक ही अभीष्ट है? ’ उस हेतु का अभिप्राय इस प्रकार है—‘मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक—इन तीन लोकों के साधन अनात्मलोकों की प्राप्ति के हेतुभूत प्रजा, कर्म और कर्मसहित ज्ञान से हमें क्या करना है; क्योंकि हमलोगों को जिन्हें कि स्वाभाविक, अजन्मा, अजर, अमर, अभय और जो कर्म से घटता-बढ़ता नहीं है वह नित्य-
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तत्रैव च पारिव्राज्यविधाने हेतुरुक्तः ‘किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः’ (बृ० उ० ४ । ४ । २२) इति । तत्रायं हेत्वर्थः— प्रजाकर्मतत्संयुक्तविद्याभिर्मनुष्यपितृदेवलोकत्रयसाधनैरनात्मलोकप्रतिपत्तिकारणैः किं करिष्यामः । न चास्माकं लोकत्रयमनित्यं साधनसाध्यमिष्टम्, येषामस्माकं स्वाभाविकोऽजोऽजरोऽमृतोऽभयो न वर्धते कर्मणा नो कनीयान्नित्यश्च

वाक्य-भाष्य

करनेयोग्य नहीं है, क्योंकि आत्मस्वरूप होने के कारण वह नित्यप्राप्त ही है । इसी प्रकार उसका विकार भी इष्ट नहीं है; क्योंकि आत्मा होने के साथ ही वह नित्य, अविकारी, अविषय तथा अमूर्त भी है ।

इसके सिवा श्रुति से ‘आत्मा कर्म से बढ़ता नहीं है’ इत्यादि और स्मृति से भी ‘यह आत्मा अविकार्य कहा जाता है’ इत्यादि कहा गया है । ‘शुद्ध और पापरहित’ इत्यादि श्रुतियों से [प्रकट होता है कि] आत्मा का संस्कार करना भी अभीष्ट नहीं है । इसके सिवा अपने से अभिन्न होने के कारण भी वह संस्कार्य नहीं है; क्योंकि संस्कार अन्य वस्तु के

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आत्मत्वे सति नित्याप्तत्वात् ।

नापि विचिकारयिषितः; आत्मत्वे सति नित्यत्वादविकारित्वादविषयत्वादमूर्तत्वाच्च ।

श्रुतेश्च ‘न वर्धते कर्मणा’ (बृ० उ० ४ । ४ । २३) इत्यादि । स्मृतेश्च ‘अविकार्योऽयमुच्यते’ (गीता २ । २५) इति । न च सञ्जिचीर्षितः ‘शुद्धमपापविद्धम्’ (ई० उ० ८) इत्यादि श्रुतिभ्यः; अनन्यत्वाच्च; अन्ये-

पद-भाष्य

लोक ही इष्ट है, साधन द्वारा प्राप्त होनेवाला अनित्य लोकत्रय तो इष्ट है नहीं । और वह (आत्मलोक) तो नित्य होने के कारण अविद्यानिवृत्ति के सिवा अन्य किसी भी साधन से प्राप्त होनेयोग्य है नहीं । अतः हमको आत्मा और ब्रह्म के एकत्वज्ञानपूर्वक सब प्रकार की एषणाओं का त्याग ही करना चाहिये ।’

इसके सिवा आत्मा और ब्रह्म के एकत्वज्ञान का कर्म के साथ-साथ होने में विरोध भी है । जिसमें [कर्ता-कर्मादि] कारक और [स्वर्गादि] फल का भेद स्वीकार किया गया है उस कर्म के साथ सम्पूर्ण भेददृष्टि से रहित ब्रह्म और आत्मा की एकता के ज्ञान का रहना संगत नहीं है, क्योंकि ब्रह्मज्ञान तो वस्तुप्रधान होने के कारण पुरुष (कर्ता) के अधीन नहीं है । अतः इस ‘केनेषितम्’ इत्यादि

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लोक इष्टः । स च नित्यत्वान्नाविद्यानिवृत्तिव्यतिरेकेणान्यसाधननिष्पाद्यः । तस्मात्प्रत्यगात्मब्रह्मविज्ञानपूर्वकः सर्वैषणासंन्यास एव कर्तव्य इति ।

कर्मसहभावित्वविरोधाच्च ज्ञानकर्मविरोध- प्रत्यगात्मब्रह्म- प्रदर्शनम् विज्ञानस्य । न ह्युपात्तकारकफलभेदविज्ञानेन कर्मणा प्रत्यस्तमितसर्वभेददर्शनस्य प्रत्यगात्मब्रह्मविषयस्य सहभावित्वम् उपपद्यते, वस्तुप्राधान्ये सति अपुरुषतन्त्रत्वाद्ब्रह्मविज्ञानस्य । तस्माद्दृष्टादृष्टेभ्यो बाह्यसाधन-

वाक्य-भाष्य

द्वारा अन्य का ही हुआ करता है । आत्मा से भिन्न कोई क्रिया भी नहीं है; और स्वयं आत्मा के योग से ही आत्मा के संस्कार की इच्छा कोई न करेगा । एक वस्तु का दूसरी वस्तु पर आधान करना अथवा एक वस्तु को दूसरी वस्तु का प्राप्त होना नित्य नहीं हो
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नान्यत्संस्क्रियते । न चात्मनोऽन्यभूता क्रिया अस्ति, न च स्वेनैवात्मना स्वमात्मानं सञ्जिचीर्षेत् । न च वस्त्वन्तराधानं नित्यप्राप्तिर्वा वस्त्वन्तरस्य

पद-भाष्य

श्रुति के द्वारा यह दृष्ट और अदृष्ट बाह्यसाधन एवं साध्यों से विरक्त हुए पुरुष की ही प्रत्यगात्मविषयक ब्रह्म-जिज्ञासा दिखलायी जाती है । शिष्य और आचार्य के प्रश्नोत्तररूप से यह कथन वस्तु का सुगमता से ज्ञान कराने में कारण है; क्योंकि यह विषय सूक्ष्म है । इसके सिवा केवल तर्क द्वारा इसकी अगम्यता भी दिखलायी गयी है ।

‘यह बुद्धि तर्क द्वारा प्राप्त होनेयोग्य नहीं है’ इस श्रुति से भी यही बात सिद्ध होती है । अतः ‘आचार्यवान् पुरुष [ब्रह्म को] जानता है’ ‘आचार्य से प्राप्त हुई विद्या ही उत्कृष्टता को प्राप्त होती है’

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साध्येभ्यो विरक्तस्य प्रत्यगात्मविषया ब्रह्मजिज्ञासेयम् ‘केनेषितम्’ इत्यादिश्रुत्या प्रदर्श्यते । शिष्याचार्यप्रश्नप्रतिवचनरूपेण कथनं तु सूक्ष्मवस्तुविषयत्वात् सुखप्रतिपत्तिकारणं भवति । केवलतर्कागम्यत्वं च दर्शितं भवति ।

‘नैषा तर्केण मतिरापनेया’ गुरूपसत्तिः (क० उ० १ । २ । ९) इति श्रुतेश्च । ‘आचार्यवान्पुरुषो वेद’ (छा० उ० ६ । १४ । २) ‘आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापदिति’

वाक्य-भाष्य

सकता* और मोक्ष की नित्यता ही इष्ट है । इसलिये जिसे आत्मज्ञान हो गया है उसके लिये कर्म का आरम्भ नहीं बन सकता । अतः जिसकी बाह्य बुद्धि निवृत्त हो गयी है उसे आत्मतत्त्व का ज्ञान कराने के लिये ‘केनेषितम्’ इत्यादि उपनिषद् आरम्भ की जाती है ।

[ * ]: अर्थात् आत्मा पर परमानन्दत्व आदि गुणों का आधान या उसका ब्रह्माण्डबाह्य ब्रह्म को प्राप्त होना नित्य नहीं हो सकता ।

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नित्या । नित्यत्वं चेष्टं मोक्षस्य । अत उत्पन्नविद्यस्य कर्मारम्भोऽनुपपन्नः, अतो व्यावृत्तबाह्यबुद्धेः, आत्मविज्ञानाय केनेषितमित्याद्यारम्भः ।

पद-भाष्य

‘उसे साष्टांग प्रणाम के द्वारा जानो’ इत्यादि श्रुति-स्मृति के नियमानुसार किसी शिष्य ने प्रत्यगात्मविषयक ज्ञान के सिवा कोई और शरण (आश्रय) न देखकर उस निर्भय, नित्य कल्याणमय अचल पद की इच्छा करते हुए किसी ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास विधिपूर्वक जाकर पूछा—यही बात [आगे की श्रुति से] कल्पित की जाती है—
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(छा० उ० ४ । ९ । ३) ‘तद्विद्धि प्रणिपातेन’ (गीता ४ । ३४) इत्यादिश्रुतिस्मृतिनियमाच्च कश्चिद् गुरुं ब्रह्मनिष्ठं विधिवदुपेत्य प्रत्यगात्मविषयादन्यत्र शरणम् अपश्यन्नभयं नित्यं शिवमचलम् इच्छन्पप्रच्छेति कल्प्यते—