आगम प्रकरण - मङ्गलाचरण 1

प्रज्ञानांशुप्रतानैः स्थिरचरनिकरव्यापिभिर्व्याप्य लोकान् भुक्त्वा भोगान् स्थविष्ठान् पुनरपि धिषणोद्भासितान् कामजन्यान् ।
पीत्वा सर्वान् विशेषान् स्वपिति मधुरभुङ् मायया भोजयन्नो मायासंख्यातुरीयं परममृतमजं ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मि ॥ १ ॥

prajñānāṃśupratānaiḥ sthiracaranikaravyāpibhirvyāpya lokān bhuktvā bhogān sthaviṣṭhān punarapi dhiṣaṇodbhāsitān kāmajanyān .
pītvā sarvān viśeṣān svapiti madhurabhuṅ māyayā bhojayanno māyāsaṃkhyāturīyaṃ paramamṛtamajaṃ brahma yattannato’smi .. 1 ..


जो अपनी चराचरव्यापिनी ज्ञानरश्मियों के विस्तार से सम्पूर्ण लोकों को व्याप्त कर [जाग्रत्-अवस्था में] स्थूल विषयों का भोग करने के अनन्तर फिर [स्वप्नावस्था में] बुद्धि से प्रकाशित वासनाजनित सम्पूर्ण भोगों का पानकर माया से हम सब जीवों को भोग कराता हुआ [स्वयं] आनन्द का भोक्ता होकर शयन करता है तथा जो परम अमृत और अजन्मा ब्रह्म माया से ‘तुरीय’ (चौथी) संख्यावाला है, उसे हम नमस्कार करते हैं ॥ १ ॥