आगम प्रकरण - कारिका 2

दक्षिणाक्षिमुखे विश्वो मनस्यन्तस्तु तैजसः ।
आकाशे च हृदि प्राज्ञस्त्रिधा देहे व्यवस्थितः ॥ २ ॥

dakṣiṇākṣimukhe viśvo manasyantastu taijasaḥ .
ākāśe ca hṛdi prājñastridhā dehe vyavasthitaḥ .. 2 ..


दक्षिणनेत्ररूप द्वार में विश्व रहता है, तैजस मन के भीतर रहता है, प्राज्ञ हृदयाकाश में उपलब्ध होता है । इस प्रकार यह [एक ही आत्मा] शरीर में तीन प्रकार से स्थित है ॥ २ ॥

दक्षिण नेत्र ही मुख (उपलब्धि का स्थान) है; उसी में प्रधानता से स्थूल पदार्थों के साक्षी विश्व का अनुभव होता है । “यह जो दक्षिण नेत्र में स्थित पुरुष है ‘इन्ध’ नाम से प्रसिद्ध है” इस श्रुति से भी यही प्रमाणित होता है । दीप्तिगुणविशिष्ट वैश्वानर को ‘इन्ध’ कहते हैं । आदित्यान्तर्गत वैराजसंज्ञक आत्मा और नेत्रों में स्थित साक्षी—ये दोनों एक ही हैं ।

शङ्का—हिरण्यगर्भ अन्य है तथा दक्षिण नेत्र में स्थित नेत्रेन्द्रिय का नियन्ता और साक्षी देह का स्वामी क्षेत्रज्ञ अन्य है । [उन दोनों की एकता कैसे हो सकती है? ]

समाधान—नहीं [ऐसी बात नहीं है], क्योंकि उनका स्वाभाविक भेद नहीं माना गया, क्योंकि “सम्पूर्ण भूतों में एक ही देव छिपा हुआ है” इस श्रुति से तथा “हे भारत! समस्त क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही जान” “[वह वस्तुतः] विभक्त न होकर भी विभक्त के समान स्थित है” इत्यादि स्मृतियों से भी [यही बात सिद्ध होती है] । सम्पूर्ण इन्द्रियों में समानरूप से स्थित होने पर भी दक्षिण नेत्र में उसकी उपलब्धि की स्पष्टता देखने से वहीं विश्व का विशेषरूप से निर्देश किया जाता है ।

दक्षिणनेत्रस्थित जीवात्मा रूप को देखकर फिर नेत्र मूँद मन में उसीका स्मरण करता हुआ वासनारूप से अभिव्यक्त उसी रूप का स्वप्न में उपलब्धि की तरह दर्शन करता है । जिस प्रकार इस अवस्था में होता है, ठीक वैसा ही स्वप्न में होता है । [इसलिये यह जाग्रत् में स्वप्न ही है] अतः मन के भीतर स्थित तैजस भी विश्व ही है ।

तथा स्मरणरूप व्यापार के निवृत्त हो जाने पर हृदयाकाश में स्थित प्राज्ञ मनोव्यापार का अभाव हो जाने के कारण एकीभूत और घनप्रज्ञ ही हो जाता है । दर्शन और स्मरण ही मन का स्फुरण हैं, उनका अभाव हो जाने पर जो जीव का हृदय के भीतर ही निर्विशेष प्राणरूप से स्थित होना है [वही जाग्रत् में सुषुप्ति है] । “प्राण ही इन सबको अपने में लीन कर लेता है” इस श्रुति से यही प्रमाणित होता है । मनःस्थित होने के कारण तैजस ही हिरण्यगर्भ है । “[सत्रह अवयववाला] लिङ्गरूप मन” “यह पुरुष मनोमय है” इत्यादि श्रुतियोंसे भी [तैजस और हिरण्यगर्भकी एकता सिद्ध होती है] ।

शङ्का—सुषुप्तिमें भी प्राण तो व्याकृत (विशेषभावापन्न) ही होता है तथा [‘प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्ते’ इस श्रुतिके अनुसार] इन्द्रियाँ भी प्राणरूप ही हो जाती हैं । फिर उसकी अव्याकृतता कैसे कही गयी?

समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि अव्याकृत पदार्थमें देशकालरूप विशेष भावका अभाव होता है । यद्यपि [जैसा कि स्वप्नावस्थामें होता है] प्राणका अभिमान रहते हुए तो उसकी व्याकृतता है ही तथापि सुषुप्तावस्थामें प्राणमें पिण्डपरिच्छिन्न विशेषका अभिमान [अर्थात् यह मेरे शरीरसे परिच्छिन्न प्राण है—ऐसा अभिमान] नहीं रहता; अतः परिच्छिन्नदेहाभिमानियोंके लिये भी उस समय वह अव्याकृत ही है ।

जिस प्रकार प्राणका लय [अर्थात् मृत्यु] होनेपर परिच्छिन्न देहाभिमानियोंका प्राण अव्याकृतरूपमें रहता है उसी प्रकार प्राणाभिमानियोंको भी प्राणकी अविशेषता प्राप्त होनेपर उसकी अव्याकृतता और प्रसव-बीजरूपता वैसी ही है । अतः [अव्याकृत और सुषुप्ति] इन दोनों अवस्थाओंका साक्षी भी अव्याकृत अवस्थामें रहनेवाला एक ही [चेतन आत्मा] है । परिच्छिन्न देहोंके अभिमानी और उनके साक्षियोंकी उसके साथ एकता है; अतः [प्राज्ञके लिये] ‘एकीभूतः प्रज्ञानघनः’ आदि पूर्वोक्त विशेषण उचित ही हैं; विशेषतः इसलिये भी, क्योंकि इसमें [अधिदैव अव्याकृत और अध्यात्म प्राज्ञकी एकतारूप] उपर्युक्त हेतु भी विद्यमान है ।

शङ्का—किन्तु अव्याकृत ‘प्राण’ शब्दवाच्य कैसे हुआ?

समाधान—“हे सोम्य! मन प्राणके ही अधीन है” इस श्रुतिके अनुसार ।

शङ्का—किन्तु वहाँ तो “सदेव सोम्य” इस श्रुतिके अनुसार प्रसङ्गप्राप्त सद्ब्रह्म ही ‘प्राण’ शब्दका वाच्य है ।

समाधान—वहाँ यह दोष नहीं हो सकता, क्योंकि [उस प्रसङ्गमें] सद्ब्रह्मकी बीजात्मकता स्वीकार की है । यद्यपि वहाँ ‘प्राण’ शब्दका वाच्य सद्ब्रह्म है तथापि जीवोंकी उत्पत्तिकी बीजात्मकताका त्याग न करते हुए ही उस सद्ब्रह्ममें प्राणशब्दत्व और ‘सत्’ शब्दका वाच्यत्व माना गया है । यदि वहाँ ‘सत्’ शब्दसे निर्बीजब्रह्म कहना इष्ट हो तो उसे “यह नहीं है, यह नहीं है” “जहाँसे वाणी लौट आती है” “वह विदितसे अन्य है और अविदितसे भी ऊपर है” इत्यादि प्रकारसे कहा जायगा, जैसा कि “वह न सत् कहा जाता है और न असत्” इस स्मृतिसे भी सिद्ध होता है ।

और यदि वहाँ [‘सत्’ शब्दसे] ब्रह्मका निर्बीजरूपसे ही निर्देश करना इष्ट हो तो सुषुप्ति और प्रलय (मरण) अवस्थामें सत् में लीन हुए पुरुषोंका फिर उठना [अर्थात् उत्पन्न होना] सम्भव नहीं होगा तथा मुक्त पुरुषोंके पुनः उत्पन्न होनेका प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा, क्योंकि [मुक्त और सत् में लीन हुए पुरुषोंमें] बीजत्वका अभाव समान ही है । तथा ज्ञानसे दग्ध होनेवाले बीजका अभाव होनेपर ज्ञानकी व्यर्थताका भी प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा । अतः सद्ब्रह्मकी सबीजता स्वीकार करके ही उसका प्राणरूपसे समस्त श्रुतियोंमें कारणरूपसे उल्लेख किया गया है ।

इसीलिए “वह पर अक्षरसे भी पर है” “वह बाह्य (कार्य) और अभ्यन्तर (कारण) के सहित [उनका अधिष्ठान होनेके कारण] अजन्मा है” “जहाँसे वाणी लौट आती है” “यह नहीं है, यह नहीं है” इत्यादि श्रुतियोंद्वारा शुद्ध ब्रह्मका निर्देश बीजवत्त्वका निरास करके ही किया गया है । उस ‘प्राज्ञ’ शब्दवाच्य जीवकी, देहादिसम्बन्ध तथा जाग्रत् आदि अवस्थासे रहित, उस पारमार्थिकी अबीजावस्थाका तुरीयरूपसे अलग वर्णन करेंगे । बीजावस्था भी जाग्रत् होनेपर ‘मुझे कुछ भी पता नहीं रहा’ ऐसी प्रतीति देखनेसे शरीरमें अनुभव होती ही है । इसीसे ‘वह देहमें तीन प्रकारसे स्थित है’ ऐसा कहा गया है ॥ २ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

दक्षिणमक्ष्येव मुखं तस्मिन् प्राधान्येन द्रष्टा स्थूलानां विश्वोऽनुभूयते । “इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः” (बृ० उ० ४ । २ । २) इति श्रुतेः । इन्धो दीप्तिगुणो वैश्वानरः । आदित्यान्तर्गतो वैराज आत्मा चक्षुषि च द्रष्टैकः ।

नन्वन्यो हिरण्यगर्भः क्षेत्रज्ञो दक्षिणेऽक्ष्ण्यक्ष्णोर्नियन्ता द्रष्टा चान्यो देहस्वामी ।

न, स्वतो भेदानभ्युपगमात् । “एको देवः सर्वभूतेषु गूढः” (श्वे० उ० ६ । ११) इति श्रुतेः । “क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत” (गीता १३ । २) “अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्” (गीता १३ । १६) इति स्मृतेः । सर्वेषु करणेष्वविशेषेऽपि दक्षिणाक्ष- ण्युपलब्धिपाटवदर्शनात्तत्र विशेषेण निर्देशो विश्वस्य ।

दक्षिणाक्षिगतो रूपं दृष्ट्वा निमीलिताक्षस्तदेव स्मरन्मनस्यन्तःस्वप्न इव तदेव वासनारूपाभिव्यक्तं पश्यति । यथात्र तथा स्वप्ने । अतो मनस्यन्तस्तु तैजसोऽपि विश्व एव ।

आकाशे च हृदि स्मरणाख्यव्यापारोपरमे प्राज्ञ एकीभूतो घनप्रज्ञ एव भवति; मनोव्यापाराभावात् । दर्शनस्मरणे एव हि मनःस्पन्दिते; तदभावे हृद्येवाविशेषेण प्राणात्मनावस्थानम् । “प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्ते” (छा० उ० ४ । ३ । ३) इति श्रुतेः । तैजसो हिरण्यगर्भो मनःस्थत्वात् । “लिङ्गं मनः” (बृ० उ० ४ । ४ । ६) “मनोमयोऽयं पुरुषः” (बृ० उ० ५ ।६ ।१) इत्यादिश्रुतिभ्यः ।

ननु व्याकृतः प्राणः सुषुप्ते । तदात्मकानि करणानि भवन्ति । कथमव्याकृतता?

नैष दोषः, अव्याकृतस्य देशसुषुप्तौ कालविशेषाभावात् । प्राणानाम् यद्यपि प्राणाभिमाने अव्याकृतत्वम् सति व्याकृततैव प्राणस्य तथापि पिण्डपरिच्छिन्नविशेषाभिमाननिरोधः प्राणे भवतीत्यव्याकृत एव प्राणः सुषुप्ते परिच्छिन्नाभिमानवताम् ।

यथा प्राणलये परिच्छिन्नाभिमानिनां प्राणोऽव्याकृतस्तथा प्राणाभिमानिनोऽप्यविशेषापत्ताव- व्याकृतता समाना प्रसवबीजात्मकत्वं च तदध्यक्षश्चैकोऽव्याकृतावस्थः । परिच्छिन्नाभिमानिनामध्यक्षाणां च तेनैकत्वमिति पूर्वोक्तं विशेषणमेकीभूतः प्रज्ञानघन इत्याद्युपपन्नम् । तस्मिन्नुक्तहेतुत्वाच्च ।

कथं प्राणशब्दत्वमव्याकृतस्य ।

“प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः” (छा० उ० ६ ।८ ।२) इति श्रुतेः ।

ननु तत्र “सदेव सोम्य” (छा० उ० ६ ।२ ।१) इति प्रकृतं सद्ब्रह्म प्राणशब्दवाच्यम् ।

नैष दोषः, बीजात्मकत्वाभ्युपगमात्सततः । यद्यपि बीजब्रह्मसद्ब्रह्म प्राणशब्दवाच्यं परत्वम् तत्र तथापि जीवप्रसवबीजात्मकत्वमपरित्यज्यैव प्राणशब्दत्वं सतः सच्छब्दवाच्यता च । यदि हि निर्बीजरूपं विवक्षितं ब्रह्माभविष्यत् “नेति नेति” (बृ० उ० ४ ।४ ।२२, ४ ।५ ।१५) “यतो वाचो निवर्तन्ते” (तै० उ० २ ।९) “अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितात्” (के० उ० १ ।३) इत्यवक्ष्यत् “न सत्तन्नासदुच्यते” (गीता १३ ।१२) इति स्मृतेः ।

निर्बीजतयैव चेत्सति लीनानां सुषुप्तप्रलययोः पुनरुत्थानानुपपत्तिः स्यात् । मुक्तानां च पुनरुत्पत्तिप्रसङ्गः, बीजाभावाविशेषात् । ज्ञानदाह्यबीजाभावे च ज्ञानानर्थक्यप्रसङ्गः । तस्मात्सबीजत्वाभ्युपगमेनैव सतः प्राणत्वव्यपदेशः सर्वश्रुतिषु च कारणत्वव्यपदेशः ।

अत एव “अक्षरात्परतः परः” (मु० उ० २ ।१ ।२) । “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” (मु० उ० २ ।१ ।२) ।


[ * ]: क्योंकि निर्बीज ब्रह्ममें लीन हुए मुक्तोंका पुनर्जन्म माना नहीं गया और यदि उस अवस्थामें भी पुनर्जन्म स्वीकार किया जाय तो मुक्तिसे भी पुनर्जन्म होना मानना पड़ेगा ।

संस्कृत भाष्य पढ़ें
“यतो वाचो निवर्तन्ते” (तै० उ० २ ।९) । “नेति नेति” (बृ० उ० ४ ।४ ।२२) इत्यादिना बीजवत्त्वापनयनेन व्यपदेशः । तामबीजावस्थां तस्यैव प्राज्ञशब्दवाच्यस्य तुरीयत्वेन देहादिसम्बन्धजाग्रदादिरहितां पारमार्थिकीं पृथग्वक्ष्यति । बीजावस्थापि न किञ्चिदवेदिषमित्युत्थितस्य प्रत्ययदर्शनाद्देहेऽनुभूयत एवेति त्रिधा देहे व्यवस्थित इत्युच्यते ॥ २ ॥