त्रिषु धामसु यद्भोज्यं भोक्ता यश्च प्रकीर्तितः ।
वेदैतदुभयं यस्तु स भुञ्जानो न लिप्यते ॥ ५ ॥
वेदैतदुभयं यस्तु स भुञ्जानो न लिप्यते ॥ ५ ॥
triṣu dhāmasu yadbhojyaṃ bhoktā yaśca prakīrtitaḥ .
vedaitadubhayaṃ yastu sa bhuñjāno na lipyate .. 5 ..
[जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन] तीनों स्थानों में जो भोज्य और भोक्ता बतलाये गये हैं—इन दोनों को जो जानता है, वह [भोगों को] भोगते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता ॥ ५ ॥
जाग्रत् आदि तीन स्थानों में जो स्थूल, सूक्ष्म और आनन्दसंज्ञक तीन भेदों में बँटा हुआ एक ही भोज्य है और ‘वह मैं हूँ’ इस प्रकार एकरूपसे अनुसंधान किये जाने तथा द्रष्टृत्व में कोई विशेषता न होने के कारण विश्व, तैजस और प्राज्ञ नामक जो एक ही भोक्ता बतलाया गया है—इस प्रकार भोज्य और भोक्ता रूपसे अनेक प्रकार विभिन्न हुए इन दोनों (भोक्ता और भोज्य)-को जो जानता है वह भोगता हुआ भी लिप्त नहीं होता, क्योंकि समस्त भोज्य एक ही भोक्ता का भोग है । जैसे अग्नि अपने विषय काष्ठादि को जलाकर [न्यूनाधिक नहीं होता अपने स्वरूप में सदा समान रहता है] उसी प्रकार जिसका जो विषय होता है वह उस विषय के कारण ह्रास अथवा वृद्धि को प्राप्त नहीं होता ॥ ५ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
त्रिषु धामसु जाग्रदादिषु स्थूलप्रविविक्तानन्दाख्यं भोज्यमेकं त्रिधाभूतम् । यश्च विश्वतैजसप्राज्ञाख्यो भोक्तैकः सोऽहमित्येकत्वेन प्रतिसन्धानाद्द्रष्टृत्वाविशेषाच्च प्रकीर्तितः; यो वेदैतदुभयं भोज्यभोक्तृतयानेकधा भिन्नं स भुञ्जानो न लिप्यते; भोज्यस्य सर्वस्यैकस्य भोक्तुर्भोज्यत्वात् । न हि यस्य यो विषयः स तेन हीयते वर्धते वा; न ह्यग्निः स्वविषयं दग्ध्वा काष्ठादि तद्वत् ॥ ५ ॥